लखनऊ, जेएनएन। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के बाद अब बहुजन समाज पार्टी ने भी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि एनडीए की राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को बसपा वोट करेगी। उन्होंने विभिन्न दलों द्वारा बसपा को भाजपा की 'बी' टीम कहे जाने पर भी जवाब दिया।

पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि इन्हीं विपक्षी पार्टियों ने बसपा को भाजपा की बी टीम बताकर झूठा प्रचार किया। माहौल बनाकर विधानसभा चुनाव में हमारी पार्टी का भारी नुकसान ही नहीं किया है, बल्कि एक विशेष समुदाय को बसपा के खिलाफ व सपा के पक्ष में इतना ज्यादा गुमराह किया कि सपा तो हारी ही हारी, अंत में भाजपा यहां दोबारा से सत्ता में आ गई।

मायावती ने कहा कि इस आत्मघाती रवैये के बाद भी विपक्षी दलों का बसपा विरोधी जातिवादी रवैया बरकरार है। बसपा किसी भी गठबंधन व पार्टी की पिछलग्गू नहीं है और न ही दूसरी पार्टियों की तरह बड़े-बड़े पूंजीपतियों व धन्नासेठों की गुलामी करने वाली पार्टी है। उन्होंने कहा कि बसपा बिना किसी हिचक, दबाव व डर के पूरे तौर से खुलकर फैसला लेती है, चाहे उसका कितना भी भारी नुकसान क्यों न उठाना पड़े और उठाया भी है।

बता दें कि अनुसूचित जनजातीय समुदाय की महिला को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का भाजपा का दांव उत्तर प्रदेश में भी कारगर साबित हो रहा है। राजग प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू के खिलाफ यहां विपक्षी एकजुटता नहीं बन पाई और बसपा प्रमुख मायावती ने मुर्मू को समर्थन की घोषणा कर दी है। साथ में तर्क दिया है कि उनका निर्णय आदिवासी, कर्मठ और योग्य महिला को राष्ट्रपति बनाने के लिए है।

वह न तो राजग के साथ हैं और न ही विपक्ष के खिलाफ। मायावती के इस तर्क को उस आरोप से बचने की ढाल भी माना जा रहा है, जिसमें उन्हें अन्य विपक्षी दल भाजपा की 'बी पार्टी' बताते हैं। मायावती ने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए यह जरूर कहा कि विपक्षी दल एक संयुक्त उम्मीदवार तय करने के लिए अपनी मनमानी बैठकें करते रहे हैं और बसपा को अलग-थलग रखा है।

मायावती ने कहा कि बसपा राष्ट्रपति चुनाव में अपना फैसला खुद लेने के लिए स्वतंत्र है। हमारी पार्टी ने आदिवासी समाज को अपने आंदोलन का खास हिस्सा मानते हुए द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद के लिए अपना समर्थन देने का फैसला लिया है। यह अतिमहत्वपूर्ण निर्णय न भाजपा व एनडीए के पक्ष में और न ही यूपीए के विरोध में लिया है।

अपनी पार्टी व मूवमेंट को विशेष ध्यान में रखकर ही एक आदिवासी समाज की योग्य व कर्मठ महिला को देश का राष्ट्रपति बनाने के लिए निर्णय है। हालांकि, वह कितना स्वतंत्र होकर व बिना किसी दबाव के काम कर पाएंगी, यह समय ही बताएगा। इसके साथ ही मायावती ने विपक्ष को भी आड़े हाथों लिया। कहा कि विपक्षी दल एक संयुक्त उम्मीदवार तय करने के लिए अपनी मनमानी बैठकें करते रहे हैं और इन्होंने उस प्रक्रिया से बसपा को अलग-थलग रखा है। यह सब इनकी जातिवादी मानसिकता नहीं तो और क्या है?

उन्होंने कहा कि बसपा जनहित के लगभग हर खास मामले में भाजपा के खिलाफ विपक्ष का हमेशा से सहयोग करती रही है, लेकिन पहले बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 15 जून को विपक्षी पार्टियों की बैठक में मनमाने ढंग से केवल चुनिंदा पार्टियों को ही बुलाया।

फिर उसके बाद शरद पवार ने भी 21 जून को इसी प्रकार की बैठक में बसपा को नहीं बुलाया। यह इनके जातिवादी इरादों को स्पष्ट करता है। ऐसे में राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी एकता का प्रयास गंभीर न होकर केवल एक दिखावा ही ज्यादा लगता है, जिसका अंजाम भी सभी को मालूम है।

Edited By: Umesh Tiwari