लखनऊ (जेएनएन)। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से रिक्त हुई गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट पर बुआ-बबुआ के कमाल ने भाजपा को निढाल कर दिया। गोरखपुर में भाजपा के उपेंद्र दत्त शुक्ल को सपा के प्रवीण निषाद ने 21881 मत और फूलपुर में भाजपा के कौशलेंद्र पटेल को सपा के नागेंद्र पटेल ने 59460 मतों से हरा दिया। मतदाताओं को सपा और बसपा का साथ पसंद आया। इस चुनाव परिणाम से सत्ताधारी भाजपा को करारा झटका लगा है।


गोरखपुर संसदीय सीट पर 1991 से लगातार भाजपा की जी के रिकार्ड को समाजवादी पार्टी ने ध्वस्त कर दिया है, जबकि फूलपुर में भी भाजपा को 2014 में मिली पहली जीत का स्वाद कड़वा कर दिया। खाता खोलने के बावजूद भाजपा फूलपुर में पांच वर्ष का अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और बीच उपचुनाव में बाजी उसके हाथ से निकलकर सपा के पास चली गई। गोरखपुर में 1989, 1991 और 1996 में महंत अवेद्यनाथ और 1998 से 2014 तक योगी आदित्यनाथ को कोई चुनौती नहीं मिल सकी। पिछले लोकसभा चुनाव में योगी तीन लाख 12 हजार मतों से जीते थे

लेकिन, जब उनकी सर्वाधिक कठिन परीक्षा थी तब भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। योगी के मुख्यमंत्री बनने के करीब एक वर्ष बाद उनकी ही छोड़ी सीट पर आये चुनाव परिणाम ने तस्वीर बदलकर रख दी। अमूमन भाजपा की देशव्यापी जीत के आंकड़ों से विपक्ष की बोलती बंद करने वाले योगी के लिए इस हार पर कहने को कुछ खास नहीं है। दरअसल, सरकार के एक वर्ष के कामकाज का मूल्यांकन उनके ही मतदाताओं ने किया है। वरना पहले के चुनावों में सबकी एकजुटता के बावजूद योगी की जीत का अंतर सपा-बसपा और कांग्रेस के मतों से ज्यादा होता था।

केशव भी नहीं बचा सके अपनी छोड़ी सीट
फूलपुर में तो कभी भाजपा जीती नहीं। वर्ष 2014 की मोदी लहर में केशव प्रसाद मौर्य ने भाजपा का खाता खोला था। तीन लाख से अधिक मतों से उनकी जीत सपा, बसपा और कांग्रेस पर भारी थी। वहां अब सपा उम्मीदवार की जीत ने भाजपा की उपलब्धि में पलीता लगा दिया। केशव प्रसाद मौर्य के लिए यह चुनाव भी किसी परीक्षा से कम नहीं था। पर, उनके परीक्षा में फेल होने की कई वजहों में कौशलेंद्र पटेल की महिला विरोधी छवि भी एक वजह बनी। कौशलेंद्र के खिलाफ उनकी पहली पत्नी ने ही विरोध का बिगुल बजा दिया था। गौर करें तो 2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में केशव की अगुवाई में लड़ा गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बाद प्रचंड बहुमत हासिल करने का श्रेय उन्हें भी मिला। केशव अपनी छोड़ी सीट बचा नहीं सके तो सबसे पहले समीक्षा की कसौटी पर वही हैं। इसके बाद सरकार की लोकप्रियता और संगठन की सक्रियता पर भी अंगुली उठ रही है।

25 साल पहले एक हुए थे दोनों
उप्र में 1993 में सपा-बसपा ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा और सरकार बनाई थी। उसके 25 साल बाद 2018 में दोनों दल एकजुट हुए हैं, हालांकि अभी कोई औपचारिक गठबंधन नहीं हुआ है। 1993 की एकता गेस्टहाउस कांड के बाद अदावत में तब्दील हो गई थी।

सत्ताधारी भाजपा को करारा झटका 

नतीजे आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से रिक्त गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट पर उपचुनाव में भाजपा चित हो गई। इस चुनाव परिणाम से सत्ताधारी भाजपा को करारा झटका लगा है। गोरखपुर संसदीय सीट पर 1991 से लगातार भाजपा की जीत के रिकार्ड को समाजवादी पार्टी ने ध्वस्त कर दिया है, जबकि फूलपुर में भी भाजपा को 2014 में मिली पहली जीत का स्वाद कड़वा कर दिया। खाता खोलने के बावजूद भाजपा फूलपुर में पांच वर्ष का अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और बीच उपचुनाव में बाजी उसके हाथ से निकलकर सपा के पास चली गई।

Great victory. Congratulations to Mayawati Ji and @yadavakhilesh Ji for #UPByPolls The beginning of the end has started


 

चुनाव परिणाम ने तस्वीर बदली

गोरखपुर में 1989, 1991 और 1996 में महंत अवेद्यनाथ और 1998 से 2014 तक योगी आदित्यनाथ को कोई चुनौती नहीं मिल सकी। पिछले लोकसभा चुनाव में योगी तीन लाख 12 हजार मतों से जीते थे लेकिन, जब उनकी सर्वाधिक कठिन परीक्षा थी तब भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। योगी के मुख्यमंत्री बनने के करीब एक वर्ष बाद उनकी ही छोड़ी सीट पर आये चुनाव परिणाम ने तस्वीर बदलकर रख दी। अमूमन भाजपा की देशव्यापी जीत के आंकड़ों से विपक्ष की बोलती बंद करने वाले योगी के लिए इस हार पर कहने को कुछ खास नहीं है। दरअसल, सरकार के एक वर्ष के कामकाज का मूल्यांकन उनके ही मतदाताओं ने किया है। वरना पहले के चुनावों में सबकी एकजुटता के बावजूद योगी की जीत का अंतर सपा-बसपा और कांग्रेस के मतों से ज्यादा होता था।

फूलपुर में वर्ष 2014 की मोदी लहर में केशव प्रसाद मौर्य ने पहली बार भाजपा का खाता खोला था। तीन लाख से अधिक मतों से उनकी जीत सपा, बसपा और कांग्रेस पर भारी थी। वहां अब सपा उम्मीदवार की जीत ने भाजपा की उपलब्धि में पलीता लगा दिया। केशव प्रसाद मौर्य के लिए यह चुनाव भी किसी परीक्षा से कम नहीं था। पर, उनके परीक्षा में फेल होने की कई वजहों में कौशलेंद्र पटेल की महिला विरोधी छवि भी एक वजह बनी। कौशलेंद्र के खिलाफ उनकी पहली पत्नी ने ही विरोध का बिगुल बजा दिया था। गौर करें तो 2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में केशव की अगुवाई में लड़ा गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बाद प्रचंड बहुमत हासिल करने का श्रेय उन्हें भी मिला। केशव अपनी छोड़ी सीट बचा नहीं सके तो सबसे पहले समीक्षा की कसौटी पर वही हैं। इसके बाद सरकार की लोकप्रियता और संगठन की सक्रियता पर भी अंगुली उठ रही है। 

 

By Nawal Mishra