नगर डगर : लखनऊ [राजीव दीक्षित]। मंत्री तो वह पुराने हैं लेकिन इस बार जिम्मा मिला है गौ माता की देखभाल का। लिहाजा मंत्री जी-जान से बड़े क्षेत्रफल में गो-आश्रय स्थलों की स्थापना में जुट गए। भावातिरेक और उत्साह में उन्होंने इन आश्रय स्थलों को नाम दे दिया अभयारण्य। नाम बदलने को लेकर आए दिन होने वाले विवादों में भले ही नाम में क्या रखा है वाला जुमला दोहराने का रिवाज रहा हो लेकिन, नाम में बहुत कुछ रखा भी है। इसलिए जब मंत्री ने गो आश्रय स्थल को अभयारण्य का नाम दे दिया।

यह बड़े सरकार को खटक गया और उन्होंने मंत्री जी को इसमें संशोधन करने का निर्देश दिया, यह कहते हुए कि अभयारण्य की परिकल्पना जंगल में विचरण करने वाले पशु-पक्षियों के संदर्भ में की गई है। गो-आश्रय स्थलों को कान्हा उपवन का नाम दिया जाए। बड़े सरकार का मंतव्य मंत्री को समझ में आया। अब इस पर अमल हो रहा है।

कल्कि पीठाधीश्वर का राष्ट्रधर्म : उदयपुर की घटना को लेकर पंजे वाली पार्टी वैसे ही झंझावातों में घिरी है। ऊपर से कल्कि पीठाधीश्वर के ट्वीट ने उसकी मुसीबतें और बढ़ा दी हैं। पीठाधीश्वर ने उदयपुर की घटना को लेकर न सिर्फ स्थानीय पुलिस-प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि मरुभूमि की सरकार के इकबाल पर भी सवाल उठाए। लिहाजा हाल ही में पार्टी के प्रवक्ता का दायित्व संभालने वाले वरिष्ठ नेता को ट्वीट कर उन्हें यह बताना पड़ा कि उन्होंने लक्ष्मण रेखा लांघी है।

पीठाधीश्वर कहां ठहरने वाले। उन्होंने भी पलट कर ट्वीट के जरिये जवाब दिया कि बेरहमी और बर्बरता से कत्ल किये गए व्यक्ति के लिए आवाज उठाना राष्ट्रधर्म है, प्रभु और राष्ट्रधर्म का निर्वहन करने से किसी को रोकने की चेष्टा राष्ट्रदोह है। पीठाधीश्वर पहले भी पार्टी को आईना दिखा चुके हैं लेकिन इस बार चर्चा है कि राष्ट्रधर्म की लाठी टेक कर कहीं यह दूसरा दरवाजा खटखटाने का उपक्रम तो नहीं है।

मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए : बिल्ली दूध ही नहीं पी गई, उसने रास्ता भी देख लिया है। पूर्वांचल और रुहेलखंड के दो बड़े किले ढहने के बाद साइकिल सवारों के खेमे की फिजां कुछ ऐसी ही आशंका से तारी है। वहीं दुर्जेय समझे जाने वाले पूरब और पश्चिम के किलों को फतह कर कमल दल वाले बल्लियों उछल रहे हैं। यह बात और है कि कमल दल इस जीत से संतुष्ट नहीं है।

अगले चुनावी महासंग्राम के लिए पार्टी अब उन चौदह सीटों को जीतने के लिए व्यूहरचना में जुट गई है जो अब भी विपक्ष के कब्जे में हैं। परफेक्शन के साथ होम वर्क करने वाले कमल दल ने इन चौदह सीटों के लिए चार केंद्रीय मंत्रियों को काम पर लगा दिया है। पार्टी जानती है कि तीसरी बार दिल्ली का दरबार सजाने में एक बार फिर उप्र की बड़ी भूमिका होगी। सोच यही है कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए।

अभियान तो ठीक लेकिन नुमाइश का तरीका नहीं : सिंगल यूज प्लास्टिक के खिलाफ मुहिम छेड़ने की बातें मंचों से करने वाले हाकिम आखिरकार इस अभियान को साकार करने के लिए राजधानी की सड़कों पर उतर ही गए। मंत्री और अधिकारी अलग-अलग टोलियों में बंटकर सड़क और पार्कों में पड़ीं पालीथीन बटोरने में जुट गए। इतने में हल्ला हुआ कि चीफ साहब भी आ रहे हैं। लिहाजा नगर निगम के दस्ते ने उनके आगमन के संभावित रूट पर सड़क के किनारे पालीथीन डालना शुरू कर दिया।

पहले तो राहगीरों को माजरा समझ में नहीं आया। तब तक किसी ने कहा कि यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि चीफ साहब को सड़क के किनारे ही पालीथीन मिल जाएं और उन्हें उठाते हुए उनकी तस्वीर कैमरों में कैद हो जाए। यह बात और है कि चीफ साहब किसी और रास्ते से आए लेकिन तब तक राहगीर समझ चुके थे कि अभियान तो ठीक है लेकिन उसकी नुमाइश का तरीका नहीं।

Edited By: Umesh Tiwari