लखनऊ, जेएनएन। अम्मा, मम्मी, माता, मां..ये शब्द सुनकर तन में स्नेहिल स्पर्श का आनंद और मन में ममता का भाव जाग्रत हो जाता है। मां तो होती ही ऐसी है..। वह खुद तपिश सहती है, पर आंचल की छांव में लाडले को रखती है। वैसे अपने बच्चे के लिए हर मां आदर्श होती है, लेकिन समाज में ऐसी कई माताएं हैं जिनके लिए हर जरूरतमंद बच्चे उनके अपने बच्चे जैसे हैं। वही परवरिश, पोषण और प्यार, वैसी ही डांट-फटकार। किसी मां ने गरीब बच्चों को शिक्षित कर उनके भविष्य को संवारने का बीड़ा उठाया है तो किसी ने अनाथ बच्चों की परवरिश में अपना जीवन लगा दिया है। मदर्स डे पर ऐसी ही कुछ माताओं के योगदान पर जागरण सिटी की रिपोर्ट..

 

मुझे नहीं चाहिए दुनिया

बस ममता का आंचल मिल जाए

जो अपने-पराये का अंतर नहीं करता

जिसके साये तले डर नहीं लगता

मैं कहीं भी रहूं, रहमत साथ चलती है

मां की दुआओं की दुनिया

हमेशा आबाद रहती है

दुनियावी तपिश से राहत देती

ममत्व की छांव..।।

कटोरे की जगह थमाई किताब

आशियाना निवासी समाज सेविका सीमा मिश्र सात वर्षो से गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रहीं हैं। एक बार वह मंदिर गई थीं, वहां कुछ बच्चों को भीख मांगते देखकर उनको समझाया कि भीख मांगना बुरी बात है। फिर जब पढ़ने के लिए पूछा, तो वे झट से तैयार हो गए। उसके बाद हर शाम को उसी मंदिर में बच्चों को पढ़ाने लगी। जब पढ़ाई के प्रति उनकी ललक बढ़ी तो, उनका एडमीशन स्कूल में करा दिया। एक बच्ची फीस न होने के कारण शिक्षा से वंचित थी। सीमा के सहयोग से आज वह एमबीए कर चुकी है।

बच्चों को नृत्य का तोहफा

इंदिरानगर निवासी स्नेहलता सिंह अपने बच्चों के साथ गरीब बच्चों को नृत्य सिखाती हैं। उन्होंने 14 साल पहले एक कार्यक्रम में बच्चों को डांस करते देखा था, उसमें स्लम एरिया के भी कई बच्चे प्रतिभाग कर रहे थे, पर वे बेहतर परफार्म नहीं कर पा रहे थे। उसके बाद से ही उन्होंने अपने तकरोही खड़कपुर के ऐसे बच्चों को निश्शुल्क डांस सिखाना शुरू किया। कई बच्चे डांस के कार्यक्रम में प्रतिभाग भी कर चुके हैं। पढ़ाई के साथ डांस करने से उनका शारीरिक विकास भी होता है। वह बच्चों को योगा भी कराती हैं।

..बस ऐसी ही होती है मां

अधिवक्ता व सेल्फ डिफेंस ट्रेनर डॉ. ज्योत्सना सिंह चार वर्ष की थीं, जब उनकी मां का स्वर्गवास हो गया था। उस वक्त उनकी चाची लली सिंह ने तीन भाई-बहनों की परवरिश का जिम्मा लिया। उनकी कोई संतान नहीं थी, मगर ममता व प्यार इतना कि जन्म देने वाली मां की कमी महसूस ही नहीं होने दी। ज्योत्सना सबसे छोटी थी, इसलिए उनकी दुलारी बिटिया भी थी। भाई-बहनों की परवरिश से लेकर शादी-ब्याह तक उन्होंने कराया। यह सच, है कि मां केवल मां होती हैं, जो केवल प्रेम और ममता लुटाना जानती हैं। बच्चा किसका है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

फैला रहीं शिक्षा का उजियारा

मंजरी उपाध्याय ने अपनी सहायिका सोनी की बेटी की शिक्षा का दायित्व स्वयं के ऊपर लेने की सोची। सोच तो अच्छी थी, पर बात पैसों की थी, कहते हैं कि जहां चाह, वहां राह। ऊहापोह में ही उनके पास पीएफ के पुराने पैसे आ गए और सोनी की बिटिया साक्षी का एडमिशन मार्च 2017 में अथर्वा अकादेमी, विजयंत खंड में करा दिया। तब यह यात्र एक बच्चे से शुरू हुई थी और अब मंजरी अपनी संस्था जिजीविषा सोसायटी के माध्यम से बेसिक शिक्षा के तीन विद्यालयों को गोद लेकर वहां के बच्चों को शिक्षा व अन्य कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर भाग लेने के लिए प्रेरित करती हैं। मंजरी के इस प्रयास को विद्यालयों की शिक्षिकाओं का भी भरपूर समर्थन, प्रोत्साहन व सहयोग मिल रहा है।

मां न सही, लेकिन मां से कम भी नहीं

मां न सही, लेकिन मां से कम भी नहीं हैं माया हंसा। मोतीनगर के लीलावती मुंशी बालगृह की अधीक्षिका के तौर पर तीन दशक से काम कर रहीं माया का सारा संसार बच्चों में ही समाया हुआ है। 50 से अधिक बच्चों की इकलौती मां का हर रंग उनके अंदर समा चुका है। सुबह प्यार दिखाने वाली मां के रूप में नजर आती हैं तो शाम को शिक्षिका के रूप में बच्चों को पढ़ाती दिखती हैं। उनका कहना है कि जब तक जीवन रहेगा, इन्हीं बच्चों की मां ही बनी रहूंगी। कभी-कभी बच्चों की शैतानियों से परेशान होती हूं, लेकिन जब कोई बच्चा पालने में मिलता है तो बस फिर मेरी परेशानी मानों खत्म हो जाती है। भगवान को शुक्रिया कहती हूं कि उन्होंने मुङो एक और बच्चा दे दिया।

शिक्षिका के रूप में दिखती हैं मां

पारिवारिक रिश्तों से इतर एक ऐसी मां हैं जो अपनों बच्चों के साथ ही गरीब युवतियों की प्यारी मां बन गई हैं। हम बात कर रहे हैं डॉ.वंदना मिश्र की। बालिकाओं की शिक्षा को लेकर संघर्ष उनकी पहचान बन गई है। राजधानी समेत प्रदेश की दो हजार से अधिक बालिकाओं की मां बनीं वंदना उनको मां की तरह डांटती भी हैं तो प्यार भी वह सगी मां से कम नहीं करतीं। शिक्षिका के रूप में यह मां सख्त हो जाती है, बावजूद इसके मां से दूर कोई जाने को तैयार नहीं होता। डॉ.वंदना ने इस कार्य जीवन का हिस्सा ही बना लिया है। अब वह केयर इंडिया से जुड़कर प्रदेश के हर जिले में बालिकाओं का शिक्षित करने के अभियान में जुड़ी हैं।

जगती आंखों संग गुजरती रात

यूपी बोर्ड, इंटर परीक्षा में लखनऊ में टॉप करने वाली अंकिता कुमारी अपनी मां पुष्पा देवी को गर्व से होम मेकर कहती हैं। बेटी का बोर्ड एग्जाम मां के लिए भी किसी परीक्षा से कम नहीं था। परीक्षा के दिनों में बेटी के साथ ही देर रात तक जगतीं। बीच-बीच में चाय, कॉफी और दूध लातीं। कभी-कभी तो बेटी के पास ही रखी स्टडी टेबल पर बैठे-बैठे ही रात गुजार देतीं। सुबह बेटी के उठने से पहले ही सारा काम कर चुकी होतीं।

मां के टाइम टेबल ने दिलाई सफलता

यूपी बोर्ड (इंटर) में लखनऊ में दूसरा स्थान पाने वाले अतिथि कुमार की मां साधना हर कदम बेटे का साथ देतीं। बड़े बेटे अक्षय कुमार ने भी टॉप किया था, वह अब बीटेक कर रहा है। अतिथि भी अब इंजीनियरिंग की पढ़ाई करेंगे। मां साधना ने बताया कि बच्चों के पढ़ाई, खेलने, टीवी देखने का समय निर्धारित कर दिया था। बच्चों के सोने के बाद सोतीं और उनके उठने से पहले उठ जातीं।

मां की सीख, बेटी की सफलता

राधिका ने आइसीएसई में 99.40 प्रतिशत अंक हासिल किए। राधिका की मां रुपाली श्रीवास्तव शिक्षिका हैं। 2018 में पति की कैंसर से मृत्यु के बाद इन्होंने अलीगंज में एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। रुपाली बताती हैं, बेटी राधिका 15 साल की थी जब पिता का साया उसके सिर से उठ गया। तब उसने बोला था कि मैं पिता का नाम रोशन करना चाहती हूं। वो जहां भी रहें मुझ पर गर्व करें। इसके लिए उसने बोर्ड परीक्षा के लिए खूब मेहनत करना शुरू किया। मुङो डर लगता था कि कहीं बेटी तनावग्रस्त न हो जाए। तब मैं उससे कहती थी, जितना अच्छे से कर सको उतना ही करो। परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर उसने अपनी बात को साबित किया और पूरे परिवार को गर्व का मौका दिया। रुपाली बेटी को डॉक्टर बनते देखना चाहती हैं।

मां की बातें, बेटी के लिए सबक

आइएससी में 99.75 प्रतिशत अंक हासिल करने वाली वेदांशी तिवारी की मां मृदुला तिवारी गृहिणी हैं। वह कहती हैं, परीक्षा के दौरान मैं हमेशा उसे मोटिवेट करती। उससे कहती, टीवी और इंटरनेट तो कहीं नहीं जाएगा। बोर्ड परीक्षा बार-बार नहीं आती। सफलता हमेशा साथ रहती है। बेटी इन बातों को बहुत अच्छे से समझती। वह देर रात तक पढ़ाई करती थी तो मैं और वेदांशी के पापा उसके पास रहते थे।

 

पढ़ाई के प्रति हमेशा सजग

आइएससी टॉपर कशिश गुप्ता की मां रितु गुप्ता कहती हैं, टाइम टेबल बनाकर उसे पढ़ाई के प्रति हमेशा सजग रखती थी। फिर भले ही घर में कोई फंक्शन क्यों न हो, पढ़ाई के वक्त सिर्फ पढ़ाई ही होती थी। न केवल बेटी, बल्कि बेटे कुशाग्र की भी नर्सरी से कक्षा आठ तक पढ़ाई के प्रति हमेशा संजीदा रही। हां, बेटी को हर बात की छूट दी, मगर नियमों में रहकर। बोर्ड परीक्षा के दौरान उसकी खाने-पीने से लेकर हर छोटी-छोटी बात का पूरा ख्याल रखा। मैंने भी एमबीए किया है, मगर उनकी बेहतर परवरिश के लिए नौकरी नहीं की।

 

बेटी की पढ़ाई के लिए छोड़ दी जॉब

आइएससी टॉपर नेहल शर्मा अपनी सफलता का श्रेय मां गीतांजली को देती हैं। बेटी की परवरिश के लिए गीतांजलि ने द्धफीचर एडीटर की जॉब भी छोड़ दी। हालांकि, बाद में मैंने यूएसए की एक मैगजीन के लिए कॉलम लिखना शुरू कर दिया था। शुरू से उसकी आदत रात में पढ़ने की रही है, इसलिए मैं भी उसके साथ रात में जागती हूं। परीक्षा के दिनों में जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

 

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