लड़कियां शिक्षित तो हो जाती हैं, लेकिन जब उन्हें पढ़ाई के लिए बाहर भेजने की बात होती है तो घर वाले उन्हें चहारदीवारी में कैद रखने में ही शान समझते हैं। ग्रामीण परिवेश को समझने वाली एक महिला ने ऐसी युवतियों को एकत्र कर न केवल तकनीकी शिक्षा देने का निर्णय किया, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने लायक भी बना दिया, वह भी निशुल्क। बात हो रही है लखनऊ की शालिनी सिंह की।

कृष्णानगर के भगवती विहार की रहने वाली शालिनी सिंह ने वर्ष 2003 में स्नातक किया और फिर वर्ष 2005 में एमए और वर्ष 2006 में एमएसडब्ल्यू करने के बाद समाज के लिए कुछ अलग करने की ठानी। जिंदगी में एक नया मोड़ आया और उनकी विकास सिंह से मुलाकात हुई, मुलाकात शादी के रिश्ते में बदल गई। नई जिंदगी के साथ वह सपनों को मंजिल तक पहुंचाने की मुहिम में जुड़ीं रहीं।

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ग्रामीण युवतियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की पहल की। पहले खुद ब्यूटीशियन, सिलाई-कढ़ाई, फैशन डिजाइनिंग, कुकरी, ब्रेकरी के साथ ही मसाला उद्योग, पैकिंग, हवन सामग्री व धूप और क्वायल बनाने की ट्रेनिंग ली। इसके बाद उन्होंने अन्य युवकों और युवतियों को ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी। ट्रेनिंग के साथ आत्मनिभर्रता की मुहिम ऐसी बढ़ी की एक दशक से अधिक समय में हजारों युवतियों और युवाओं को उन्होंने आत्म निर्भर बना दिया।

बीकेटी से शुरू किया अभियान

ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी और आर्थिक स्थिति कमजोर है। जानकारी के अभाव में युवाओं का भविष्य अंधकार में रहता है। शालिनी ने वर्ष 2006 में ग्रामीण युवाओं और युवतियों को एकत्र कर बीकेटी में ही समूह में ट्रेनिंग देनी शुरू की थी। शालिनी ने बताया कि लड़कों के मुकाबले लड़कियों में ट्रेनिंग लेने के प्रति ज्यादा उत्साह दिखा। फिर क्या था, उन्होंने अपनी मुहिम को ग्रामीण परिवेश में रहने वाली युवतियों को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाने की ओर मोड़ दिया। सिटीजन डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के नाम से संस्था बनाई और फिर अपनी मुहिम में जुट गईं।

कमाई के साथ बदल गई जिंदगी

खिलौने बनाने की ट्रेनिंग लेने वाली ऐशबाग की सलमा और परवीन ने बताया कि आर्थिक तंगी की वजह से दो जून की रोटी बमुश्किल से मिल पाती थी। पिताजी जो कमाते थे, उससे घर चलाना मुश्किल हो रहा था। तभी उनकी मुलाकात शालिनी सिंह से हुई तो उन्होंने खिलौने बनाने की ट्रेनिंग के लिए मुझे अपने केंद्र बुलाया। छह महीने की ट्रेनिंग के बाद अब दो बहनें मिलकर 10 से 15 हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी कर रही हैं।

मुश्किल था लोगों को समझाना

किसी को प्रशिक्षण के लिए तैयार करना और वह भी फ्री। यह काम फीस लेकर ट्रेनिंग देने से कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। शालिनी सिंह के साथ भी यही हुआ। उन्होंने बताया कि जब बीकेटी में ट्रेनिंग शुरू की तो लोग कहने लगे कि "मेडम" आईं हैं, अपनी नौकरी करेंगी और फिर चलीं जाएंगी। ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह बिना पैसे की कोई ट्रेनिंग दें।

समाज को समझाने की चुनौतियों के बीच जब तीन दर्जन से अधिक युवतियों को ट्रेनिंग देकर उन्हें नौकरी दिलाई तो ग्रामीणों ने न केवल अपनी सोच बदली, बल्कि मदद करने के लिए भी आगे आने लगे। कोई ट्रेनिंग की जगह देने को तैयार हो गया तो कोई उनके लिए नाश्ते का इंतजाम करने की गुजारिश करने लगा, लेकिन शालिनी ने किसी से कोई मदद नहीं ली। पति का साथ और परिवार का आशीर्वाद ऐसा मिला कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

युवाओं को दिया रोजगार

वर्ष 2006 से शुरू हुई शालिनी सिंह की मुहिम अब तक लगातार जारी है। उन्होंने कंप्यूटर से लेकर सिलाई-कढ़ाई और लघु उद्योग तक की ट्रेनिंग देकर हजारों युवाओं और युवतियों को रोजगार से जोड़ा है। कोई ब्यूटी पार्लर खोले हुए है तो कोई कॉल सेंटर में नौकरी कर रहा है। किसी की अपनी दुकान है, तो कोई अगरबत्ती बनाकर खुद को सबल बना रहा है। डिजाइनिंग की ट्रेनिंग करने वाली कई लड़कियां तो दिल्ली और नोएडा में नौकरी रही हैं। कुछ तो होटल मैनेजर हैं।

संसाधन मिले तो बने बात

शालिनी कहती हैं कि सरकारी योजनाओं का लाभ मिले तो उनकी मुहिम में और तेजी आ जाए। उनका कहना है कि नगर निगम की ओर से संचालित कान्हा उपवन में गाय के गोबर से शव दहन के लिए लट्ठा बनाने की ट्रेनिंग उन्होंने 60 महिलाओं को दी।

नगर निगम और जिला नगरीय विकास अभिकरण के सहयोग से शुरू हुई इस मुहिम में उस समय ब्रेक लग गया जब आर्थिक मदद का आश्वासन मिला, लेकिन मदद नहीं मिली। लाखों रुपये की मशीन बंद पड़ी है। अब घर में ही महिलाओं को जोड़कर गाय के गोबर से उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग दे रही हैं।

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By Nandlal Sharma