शहर में अस्पतालों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। सरकारी से लेकर निजी क्षेत्र तक में बड़े-बड़े अस्पताल खुले हैं, लेकिन अब नए अस्पताल खोलने के बजाए गुणवत्तापरक इलाज पर फोकस करना होगा। इसके लिए मानव संसाधन से लेकर उपकरणों तक का प्रबंध करना होगा।

ये मानना है, चिकित्सा क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार डॉ. बीसी राय अवार्डी डॉ. राजेंद्र प्रसाद का। डॉक्टर प्रसाद को फॉदर ऑफ पल्मोनरी मेडिसिन इन यूपी भी कहा जाता है। उन्होंने टीबी रोग और उसके निदान पर शहर के चिकित्सकों को फेफड़े की तमाम बीमारियों पर अध्ययन करने की दिशा दी।

उनका शैक्षणिक कार्यक्रम 68 वर्ष की उम्र में भी अनवरत जारी है। एक एक्सपर्ट के तौर पर वह शहर में चेस्ट इंस्टीट्यूट का अभाव महसूस करते हैं। फिलहाल उनकी प्राथमिकता में नए अस्पताल खोलने के बजाए मरीजों को गुणवत्ता परक जांच और इलाज मुहैया कराना है।

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 1984 में केजीएमयू (तब केजीएमसी) में लेक्चरर के पद पर ज्वॉइन किया। सरकार ने वर्ष 2011 में सैफई आयुर्विज्ञान संस्थान का निदेशक बनाया और नवंबर 2012 में पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट दिल्ली के डायरेक्टर बनाए गए। वर्ष 2015 में सेवानिवृत्ति के बाद निजी मेडिकल यूनिवर्सिटी में सेवाएं शुरू कीं।

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वहीं क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम के लिए बनी टॉस्क फोर्स के यूपी चेयरमैन और नेशनल टॉस्क फोर्स इनवॉल्वमेंट ऑफ मेडिकल कॉलेज के वाइस प्रेसिडेंट भी रहे। उन्हें डॉ. बीसी राय अवॉर्ड, यूपी सरकार का विज्ञान गौरव अवार्ड, लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड इंडियन एसोसिएशन ऑफ ब्रांकोलॉजी फॉर द डेवलपिंग ऑफ ब्रांकोस्कोप समेत 45 पुरस्कार भी प्रदान किए गए।

शहर की स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के लिए अपने सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली की तर्ज पर शहर में एक चेस्ट इंस्टीट्यूट बने, क्योंकि बढ़ते प्रदूषण के चलते फेफड़े संबंधी रोगी बढ़ रहे हैं। सरकार अस्पतालों की संख्या बढ़ाने के बजाए गुणवत्ता परक जांच की सुविधा उपलब्ध कराए, ताकि मरीजों का सटीक इलाज हो सके।

उन्होंने कहा कि अस्पतालों में टेक्नीशियन और पैरामेडिकल स्टाफ को समय-समय पर नई मशीनों के संचालन और आधुनिक इलाज के लिए प्रशिक्षण दिया जाए। साथ ही पैथोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट को भी ट्रेनिंग देकर अपडेट किया जाए। सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का बजट बढ़ाए और इमरजेंसी सेवाओं को भी अपग्रेड करे।

ये हैं डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की उपलब्धियां
- वर्ष 1986 में विभाग में यूपी का पहला फाइबर ऑप्टिकल ब्रांकोस्कोप स्थापित किया।
- जापान में प्रशिक्षण प्राप्त कर विभाग में 1992 में लंग कैंसर यूनिट खोली।
- वर्ष 1996 में राज्य का पहला डॉट्स सेंटर खोला फिर टीबी रोग नियंत्रण पर काम शुरू किया।
- वर्ष 2000 में केजीएमयू में यूपी का पहला वीडियो ब्रांकोस्कोप लगाया। यह फेफड़े की बीमारी की गहन जांच व छात्रों के अध्ययन में मील का पत्थर साबित हुआ। 
- वर्ष 2005 में विभाग का नाम चेस्ट एंड टीबी से बदलवाकर डिपार्टमेंट ऑफ पल्मोनरी मेडिसिन करवाया।
- वर्ष 2007 में केजीएमयू में प्रदेश की पहली स्लीप एप्निया लैब की स्थापना की।

डॉक्टर प्रसाद ने कहा कि अस्पतालों में मानक के अनुरूप डॉक्टर और स्टाफ की नियुक्ति किए जाए। निजी अस्पतालों में मानक पूरा करने के कड़े नियम लागू हों। साथ ही डॉक्टर मॉरल और एथिकल वैल्यूज को समझें। ताकि मरीजों के विश्वास को बहाल करें।

- डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद
(फॉदर ऑफ पल्मोनरी मेडिसिन इन यूपी कहे जाने वाले डॉ. प्रसाद को चिकित्सा क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार डॉ. बीसी राय अवार्डी से सम्मानित किया जा चुका है)

By Nandlal Sharma