संदीप पांडेय, जागरण संवाददाता

बेहतर इलाज के लिए दिल्ली भागने का दौर अब नहीं रहा, लखनऊ में न केवल अब बेहतर इलाज मौजूद है, बल्कि इसकी धाक सरहद पार तक जमी है। जनरलहॉस्पिटल से लेकर सुपर स्पेशिएलिटी इंस्टीट्यूट तक की पूरी चेन मौजूद है। सरकारी से लेकर निजी क्षेत्र तक के संस्थान दिनोंदिन अपनी सेवाओं को अपग्रेड करने में जुटे हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, अफगानिस्तान और नेपाल जैसे देशों के मरीज बेहतर इलाज के लिए लखनऊ का रुख कर रहे हैं।

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केजीएमयू, एसजीपीजीआइ और लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के सुपर स्पेशिएलिटी ट्रीटमेंट ने शहर को विशेष पहचान दी है, जहां न्यूरो, गैस्ट्रो, यूरो और हार्ट सर्जरी के अलावा इंडोक्राइन, आंको सर्जरी, पीडियाट्रिक सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी विभागों में पिछले चार-पांच वर्षों से लगातार विदेशी मरीजों की संख्या में इजाफा रहा है। कहना गलत न होगा कि शहर में मेडिकल टूरिज्म का दौर शुरू हो चुका है।

विदेशी मरीजों का आंकड़ा दो हजार के पार

केजीएमयू के सीएमएस डॉ. एसएन शंखवार के मुताबिक संस्थान में गत वर्ष करीब 1200 मरीज नेपाल से आए थे। बांग्लादेश से 40 से 50 मरीज और श्रीलंका से दो मरीज इलाज के लिए आए। लिंब सेंटर में भी पाकिस्तान से लेकर अन्य देशों के मरीजों को कृत्रिम अंग लगाए गए। श्रीलंका के मरीजों की केजीएमयू के डॉक्टर द्वारा विकसित एक्स ट्रॉफी ब्लैडर तकनीक से सर्जरी हुई।

 

एसजीपीजीआइ के सीएमएस डॉ. अमित अग्रवाल के मुताबिक नेपाल से 300 के करीब मरीज आए, जबकि बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के भी करीब 30 मरीज इलाज कराने संस्थान आ चुके हैं। लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में निदेशक डॉ. दीपक मालवीय के मुताबिक गत वर्ष नेपाल से करीब 500 मरीज आए। ये सभी आंको सर्जरी, मेडिकल आंकोलॉजी, न्यूरो सर्जरी और कार्डियोलॉजी में दिखाने आए थे।

इसलिए है इन संस्थानों पर नाज

दुनिया में कायम जॉर्जियंस का रुतबा वर्ष 1905 में स्थापित केजीएमयू का विश्वभर में रुतबा है और यहां के डॉक्टर दुनियाभर में जॉर्जिंयस के नाम से जाने जाते हैं। ये 4500 बेड की क्षमता वाला एशिया का सबसे बड़ा हॉस्पिटल है। करीब 70 विभाग संचालित हैं, वहीं 200 वेंटिलेटर की क्षमता रखने वाला ये देश का इकलौता संस्थान है। हर वर्ष 600 कृत्रिम अंग और 10 हजार सहायक उपकरण बनाने वाला लिंब सेंटर प्रोडक्शन और डिलीवरी में देश के संस्थानों में टॉप पर है।

किडनी ट्रांसप्लांट में अव्वल

एसजीपीजीआइ की स्थापना 1973 में हुई थी। इस संस्थान ने वर्ष भर में 122 से अधिक किडनी ट्रांसप्लांट कर रिकॉर्ड कायम किया। मां के पेट में पल रहे बच्चों का इंटरवेंशन तकनीक के जरिए इलाज कर जटिल और जन्मजात बीमारियों से मुक्ति दिलाने में भी संस्थान सफलता हासिल की। लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान ने 10 वर्ष में ही किडनी ट्रांसप्लांट शुरू कर इतिहास रच दिया। वहीं आंको सर्जरी, रेडिएशन आंकोलॉजी और मेडिकल आंकोलॉजी विभाग शुरू कर प्रदेश के कैंसर रोगियों के लिए संपूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराई गई है। सरकारी क्षेत्र में मेडिकल अंकोलॉजी की सुविधा देने वाला यह राज्य का इकलौता संस्थान है। 

शहर में 108 सरकारी अस्पताल

शहर में केजीएमयू, एसजीपीजीआइ, लोहिया आयुर्विज्ञान सुपर स्पेशिएलिटी संस्थान हैं। वहीं 52 अर्बन पीएचसी, आठ अर्बन सीएचसी मौजूद हैं। महिला अस्पतालों में डफरिन, क्वीनमेरी, झलकारी बाई, मातृ-शिशु रेफरल हॉस्पिटल शामिल हैं। साथ ही बलरामपुर, सिविल, लोकबंधु राजनारायण, आरएलबी, लोहिया और ठाकुरगंज जिला चिकित्सालय भी हैं। आयुष विधा में भी शहर में आयुर्वेद की 16 डिस्पेंसरी और चार बेड के मिनी अस्पताल हैं। होम्योपैथ की 11 व यूनानी की एक डिस्पेंसरी है। आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथ का एक-एक मेडिकल कॉलेज भी है।

निजी क्षेत्र में 750 निजी अस्पताल
राजधानी का निजी हेल्थ सेक्टर भी काफी मजबूत है। शहर में एलोपैथ की जहां 1200 क्लीनिक संचालित हैं, वहीं आयुष की भी एक हजार क्लीनिक खुली हैं। इसके अलावा करीब 785 रजिस्टर्ड हॉस्पिटल विभिन्न इलाकों में स्थापित हैं। दो डीम्ड यूनीवर्सिटी व मेडिकल कॉलेज भी संचालित हैं। 

'कायाकल्प' से स्वच्छता की दौड़

केंद्र सरकार की कायाकल्प अवार्ड योजना से अस्पतालों में स्वच्छता की दौड़ शुरू हुई है। वर्ष 2017-18 में शहर के लोहिया अस्पताल ने स्वच्छता में 88.2 रैंक हासिल कर प्रदेश में दूसरा स्थान हासिल किया। इसके लिए 20 लाख रुपए इनाम मिला। साथ ही आरएलबी की स्वच्छता रैंकिंग 81.2, सिविल अस्पताल की 79.8, लोकबंधु की 76.8, बलरामपुर की 73.4, बीआरडी की 68.4 और ठाकुरगंज अस्पताल ने स्वच्छता में 64.4 अंक हासिल किए।

महंगाई पर जेनेरिक दवाओं का मरहम

केजीएमयू में सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिए अमृत फार्मेसी खोली गई है। वहीं लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान और एसजीपीजीआइ में एचआरएफ सिस्टम से सीधे कंपनियों से खरीदारी कर 40 से 50 फीसद तक सस्ती दवाएं मरीजों को उपलब्ध कराई जा रही हैं। इसके अलावा प्राइवेट सेक्टर में 34 प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र खोले गए हैं।

इन केंद्रों पर 600 किस्म की दवाएं और 154 सर्जिकल सामान के उपलब्धता के दावे किए जा रहे हैं। यह सभी बाजार दर से 70 से 80 फीसद तक सस्ते हैं।उधर, सरकारी जिला अस्पतालों में 1200 किस्म की दवा और सर्जिकल सामान मरीजों को मुफ्त मिल रहे हैं, जबकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 162 दवाएं निश्शुल्क दी जा रही हैं। निजी क्षेत्र में 2400 मेडिकल स्टोर और 1800 थोक दवा दुकानें संचालित हैं।

चार हजार तक की जांचें मुफ्त

शहर के सीएचसी-पीएचसी पर पैथोलॉजी की सामान्य जांच की सुविधा उपलब्ध है। वहीं अस्पतालों में पैथोलॉजी और बायोकेमिस्ट्रिी की मुफ्त जांचें की जाती हैं। इसके अलावा यूपी हेल्थ सिस्टम स्ट्रेंथनिंग प्रोजेक्ट (यूपीएचएसएसपी) द्वारा बलरामपुर, डफरिन, सिविल, झलकारी, आरएलबी, लोकबंधु अस्पताल में नोडल सेंटर खोले गए हैं। इन पर हार्मोन प्रोफाइल, बायोप्सी, ट्यूमर मार्कर, कैंसर स्क्रीनिंग, फ्लोसाइटोमेटरी, इम्यूनोप्रोफाइल, हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस, प्रोटीन इलेक्ट्रोफोरेसिस, हीमोफीलिया समेत 150 से अधिक जांचों की सुविधा है।

बीएलएस-थ्री लैब हो अपग्रेड, लेवल फोर की जरूरत

शहर के केजीएमयू, पीजीआई और लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में पैथोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, इम्युनोलॉजी, सेरोलॉजी, हिस्टोपैथोलॉजी, साइटोलॉजी और साइटो जेनेटिक जांचों की व्यवस्था है। वहीं बायोसेफ्टी लेवल थ्री (बीएसएल-थ्री) लैब केजीएमयू और पीजीआइ में ही हैं। ऐसे में यहां स्वाइन फ्लू की जांच तो आसानी से हो जाती है, मगर जीका वायरस और निपाह वायरस जांच के लिए सेफ्टी किट और लैब को अपग्रेड करने की जरूरत है। इसके अलावा लोहिया संस्थान और प्राइवेट में बीएसल-थ्री लैब नहीं है। शहर में करीब 685 पैथोलॉजी रजिस्टर्ड हैं।

अभी जवां हैं उम्मीदें

- निर्माणाधीन एक हजार बेड का कैंसर इंस्टीट्यूट।

- लोहिया संस्थान का न्यू कैंपस में प्रस्तावित 500 बेड का हॉस्पिटल।

- सरोजनीनगर में बन रहा 50 बेड का आयुर्वेद अस्पताल।

- चौक के झवाईं टोला में 50 बेड का प्रस्तावित यूनानी अस्पताल।

- जानकीपुरम में प्रस्तावित ट्रामा सेंटर।

सुधार की यह है आस

- सस्ती दवा के लिए सीएचसी व जिला अस्पतालों में जल्द जन औषधि केंद्र खुलें।

- प्राइवेट सेक्टर में भी शहर में करीब एक हजार जेनेरिक स्टोर खोलने की जरूरत।

- लेवल थ्री लैब को अपग्रेड किया जाए, अभी खतरनाक वायरस की जांच के लिए एनआइवी पुणे ही विकल्प है।

- अधिकतर निजी पैथोलॉजी पर डॉक्टर के बजाए टेक्नीशियन रिपोर्टिंग कर रहे हैं, इस पर सख्ती से लगाम लगे और मानकों का पालन कराया जाए।

- प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए क्लीनिकल इस्टेब्लिसमेंट एक्ट लागू हो। मानकों के विपरीत चल रहे अस्पतालों पर कार्रवाई हो।

- अपग्रेड किए गए आधा दर्जन सरकारी अस्पतालों में वार्ड और नए बीएमसी जल्द शुरू किए जाएं ताकि बेडों की समस्या दूर हो सके।

By Nandlal Sharma