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सपनों के बोझ तले... हांफता लखनऊ: 15 सालों में 28 से 60 लाख के पार आबादी, संभालने में सिस्टम फेल

Published: Wed, 24 Jun 2026 11:44 AM (IST)

लखनऊ पर बढ़ती आबादी और अनियोजित विकास का भारी बोझ है, जिससे शहर की व्यवस्थाएं चरमरा रही हैं। हालिया अग्निकांड ...और पढ़ें

ये तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई है।

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अम्बिका वाजपेयी, लखनऊ। एक तुलनात्मक आंकड़ा देखिए, माथा ठनक जाएगा। वर्ष 2011 की जनगणना में लखनऊ की आबादी करीब 28 लाख थी, जो आज 2026 में अनुमानित तौर पर 60 लाख के पार पहुंच चुकी है।

वहीं, राजधानी से सटे बाराबंकी जनपद की आबादी तब 32 लाख थी, जिसमें इन 15 सालों में मात्र सात लाख की वृद्धि हुई। बाराबंकी लगभग 4,402 वर्ग किमी में बसा है तो लखनऊ का क्षेत्रफल 2,528 वर्ग किमी है।

अंतर साफ है - लखनऊ पर जनसंख्या का बोझ बेतहाशा बढ़ा, लेकिन क्या हमारा सिस्टम इस बोझ को सहने के लिए तैयार था? जवाब है - कतई नहीं। बीते सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड में 15 युवाओं को जान गंवानी पड़ी।

दुखद और आंखें खोलने वाला सच यह है कि इनमें से आठ युवा लखनऊ के मूल निवासी नहीं थे। वे यहां बेहतर भविष्य की तलाश में आए थे। नगरी से महानगर बनने की होड़ में दौड़ रहे लखनऊ का एक पहलू अगर अच्छे कोचिंग संस्थान, चमचमाते अस्पताल और मल्टीनेशनल कंपनियां हैं, तो दूसरा काला पहलू इस शहर को सिर्फ बाजार बना देने की अंधी व्यवस्था है।

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लखनऊ के सरकारी और निजी अस्पतालों की केवल ओपीडी का ही आंकड़ा ले लें तो यहां प्रतिदिन 40 हजार मरीज इलाज की आस में आते हैं। एक अनुमान के मुताबिक लखनऊ में पंजीकृत 226 के अलावा लगभग डेढ़ से दो हजार कोचिंग संस्थान हैं, जिनमें लगभग सवा लाख बच्चे पढ़ रहे हैं।

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हजारों युवा अपने सपनों का हाईवे पकड़ने के लिए कोचिंग की तंग और असुरक्षित गलियों में दौड़ लगा रहे हैं, तो आजीविका की आस में हजारों झुग्गियां गगनचुंबी अपार्टमेंट्स की छांव में अवैध रूप से पनप रही हैं। पिछले महीने झुग्गी बस्ती में लगी आग में जिन मासूमों की जान गई, वे भी बाराबंकी के थे।

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फुटपाथों पर काबिज ठेले-खोमचे और रफ्तार भरते ई-रिक्शा-टेंपो बताते हैं कि पूरे पड़ोसी जिलों के रोजगार की दौड़ लखनऊ आकर थमती तो है, लेकिन यहां की बदइंतजामी उन्हें लील जाती है। एक अदद आइएएस अफसर से लेकर मध्यमवर्गीय परिवार का सपना होता है कि ‘एक घर लखनऊ में हो’, लेकिन इस चाहत ने लखनऊ के संसाधनों का दम निकाल दिया है।

अवैध निर्माण, बिना पार्किंग के भवन और बिना एनओसी के दड़बेनुमा स्कूल, कोचिंग और ट्रेनिंग संस्थान आखिर इसी सिस्टम की नाकामी की उपज हैं जो हर मौत पर जाति पूछता है अथवा मुआवजा तय करता है।

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अनियोजित विकास ने लखनऊ को कंक्रीट का जंगल तो बना दिया गया, लेकिन इसे जीने लायक शहर बनाए रखने की नीयत शायद हमारे नीति-नियंताओं के पास नहीं है।

लापरवाही, शून्य नियोजन और आंखें मूंदकर बढ़ावा दिए गए अतिक्रमण ने आज नवाबों के शहर को समस्याओं का टापू बना दिया है। लाक्षागृह बनते भवन, सड़कों पर रेंगता ट्रैफिक, अस्पतालों के बाहर दम तोड़ती व्यवस्थाएं और रेंगते ई-रिक्शे चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि लखनऊ अब हांफ रहा है।

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