लखनऊ में आज भी दिखते हैं अंग्रेजी हुकूमत के निशान, हैवलक-हीवेट और लाटूश रोड के रूप में मौजूद है ब्रिटिश इतिहास
आजादी के दशकों बाद भी लखनऊ की सड़कों, संस्थानों और बैंक खातों पर अंग्रेजी शासन की छाप बरकरार है। कैंपवेल ...और पढ़ें

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HighLights
लखनऊ की कई सड़कें आज भी ब्रिटिश शासकों के नाम पर।
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी भी अंग्रेजी नाम से है।
चिड़ियाघर के बैंक खाते में प्रिंस ऑफ वेल्स नाम बरकरार।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। 1875 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में ईस्ट इंडिया कंपनी के दुर्दांत सेनानायकों में कालिन कैंपवेल भी था, लेकिन आज भी ठाकुरगंज-हरदोई मार्ग आज भी कैंपवेल रोड के नाम से जाना जाता है। दिवंगत इतिहासकार योगेश प्रवीन ने भी अपनी किताब में कालिन कैंपवेल को दुर्दांत व अत्याचारी अंग्रेजी शासक बताया था।
केवल कैंपवेल रोड ही नहीं, हैवलक रोड, हीवेट रोड, लाटूश रोड भी अंग्रेजी शासकों के नाम पर हैं। सरकारें अंग्रेजी हुकूमत की इन पहचानों को मिटा नहीं पाई। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय भी अंग्रेजी शासक के नाम से है। उसकी पत्नी क्वीनमेरी के नाम पर विश्वविद्यालय का स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग है।
गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुए लंबा अरसा बीत गया है, लेकिन आज भी शहर की सड़कों पर अंग्रेजी शासन की छाप दिखती है। नगर निगम इन मार्गों को अब तक किसी क्रांतिकारी का नाम नहीं दे सका है।
सेनानायक क्लाइड के नाम से जाना जाता है सिकंदरबाग चौराहा
सिकंदरबाग चौराहे का बिजली उपकेंद्र भी अंग्रेजी हुकूमत के सेनानायक क्लाइड के नाम से जाता है। सर हारकोर्ट बटलर भी अंग्रेजी शासन में गर्वनर था, और उसका नाम आज भी बटलर पैलेस कालोनी के नाम से जीवित है।
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नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान का बैंक खाता आज भी अंग्रेज शासक के नाम पर ही है, चिड़ियाघर का नाम प्रिंस आफ वेल्स जुलोजिकल्स गार्डेन से बदलकर नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान तो कर दिया गया था, लेकिन बैंक आफ इंडिया और स्टेट बैंक का खाता प्रिंस आफ वेल्स ट्रस्ट के नाम से संचालित हो रहा है। गेट के बोर्ड पर भी नाम बदल गया, लेकिन बैंक खाते से नाम नहीं हट सका।
वर्ष 1921 में प्रिंस आफ वेल्स के स्वागत में तत्कालीन राजाओं, तालुकेदारों और नवाबों ने प्राणि उद्यान की स्थापना की थी। प्राणि उद्यान का नाम प्रिंस आफ वेल्स जुलोजिकल्स गार्डेन देते हुए उसी नाम से ट्रस्ट बना दिया गया था। वर्ष 2001 तक प्राणि उद्यान पूरी तरह से प्रिंस आफ वेल्स जुलोजिकल्स गार्डेन के नाम से अपनी पहचान रखता था।
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वह शिलापट भी लगा था, जिस पर प्रिंस आफ वेल्स का नाम लिखा था। वर्ष 2001 में प्रदेश सरकार ने चिड़ियाघर के ऊपर लंबे समय से लगी अंग्रेजी हुकूमत की पहचान को मिटा दिया था। प्रिंस आफ वेल्स जुलोजिकल्स गार्डेन का बोर्ड हट गया था। सरकार से मिलने वाली अनुदान राशि भी अंग्रेजी शासक वाले खाते में जमा होती है।
