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लखनऊ यून‍िवर्स‍िटी ने छात्रा पर दबाव बनाने वाले शिक्षक डॉ. परमजीत सिंह को कि‍या सस्‍पेंड, ऑड‍ियो हुआ था वायरल

Published: Tue, 19 May 2026 04:22 PM (GMT+05:30)

लखनऊ विश्वविद्यालय ने जंतु विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. परमजीत सिंह को छात्रा के साथ अशोभनीय व्यवहार, पेपर लीक ...और पढ़ें

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HighLights

  1. डॉ. परमजीत सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय से निलंबित।

  2. छात्रा के लिए पेपर लीक, यौन शोषण का आरोप।

  3. अनुशासन समिति की रिपोर्ट पर हुई कार्रवाई।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. परमजीत सिंह को निलंबित कर दिया गया है। शिक्षक पर छात्रा के लिए पेपर आउट करने, अशोभनीय बातचीत और उस पर दबाव बनाने सहित गंभीत आरोप लगे थे।

मंगलवार को कुलपति प्रोफेसर जे.पी. सैनी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यपरिषद की आपातकालीन बैठक में तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय अनुशासन समिति की अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। कार्यपरिषद ने रिपोर्ट के निष्कर्षों को अत्यंत गंभीर मानते हुए आरोपित शिक्षक डा. परमजीत सिंह को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने की संस्तुति पर अपनी आधिकारिक मुहर लगा दी है।

अनुशासन समिति की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार शिक्षक के विरुद्ध कई आरोप प्रथम दृष्ट्या सही पाए गए। इसमें परीक्षा प्रश्न-पत्र लीक करने का प्रलोभन देकर छात्रा के यौन शोषण का प्रयास एवं शिक्षक आचरण नियमावली का उल्लंघन, गोपनीय परीक्षा सूचना (प्रश्न-पत्र लीक) साझा करने की बात करना एवं आइसीसी के समक्ष इसकी आधिकारिक स्वीकारोक्ति, अनैतिक एवं अमर्यादित कृत्य से विश्वविद्यालय की साख, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं अकादमिक निष्ठा को गंभीर क्षति, और विशाखा गाइडलाइंस एवं यूजीसी विनियम 2015 के अंतर्गत कार्यस्थल पर गंभीर यौन व मानसिक उत्पीड़न और अशोभनीय कदाचार शामिल है।

अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर तत्काल निलंबन की कार्रवाई के साथ ही आरोपित शिक्षक के खिलाफ आरोप-पत्र भी स्वीकृत कर जारी किया गया है। इस आदेश के तहत निलंबित शिक्षक डा. परमजीत सिंह को आरोप-पत्र निर्गत होने की तिथि से 15 दिनों के भीतर अपना लिखित स्पष्टीकरण, सफाई और प्रतिवाद साक्ष्यों के साथ अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना होगा। अपना यह स्पष्टीकरण कुलसचिव के माध्यम से जांच समिति के अध्यक्ष को संबोधित करते हुए जमा करना होगा।

यदि आरोपित शिक्षक इस निर्धारित 15 दिनों की समय-सीमा के भीतर अपना संतोषजनक उत्तर प्रस्तुत करने में विफल रहते हैं, तो विश्वविद्यालय प्रशासन इसे उनकी मूक स्वीकारोक्ति मानते हुए नियमानुसार उनकी सेवा-समाप्ति जैसी कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने हेतु पूर्णतः स्वतंत्र होगा।