पुदीना और अजवाइन से फेफड़े के कैंसर का होगा इलाज, लखनऊ के वैज्ञानिकों को मिली सफलता
लखनऊ के वैज्ञानिकों ने पुदीने और अजवाइन में फेफड़े के कैंसर से लड़ने वाला एक प्राकृतिक यौगिक 'कार्वीओल' खोजा है। ...और पढ़ें
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विज्ञानियों ने खोजी दीना और अजवाइन में फेफड़े के कैंसर से लड़ने की क्षमता।
HighLights
पुदीने-अजवाइन में मिला फेफड़े के कैंसर रोधी यौगिक।
'कार्वीओल' स्वस्थ कोशिकाओं को बिना नुकसान पहुंचाए कैंसर नष्ट करेगा।
कम साइड इफेक्ट वाली दवा बनने की उम्मीद, लगेंगे तीन-चार वर्ष।
मनीषा गोस्वामी, लखनऊ। कैंसर अनुसंधान के क्षेत्र में विज्ञानियों को बड़ी सफलता मिली है। सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय एवं सुगंध पौधा संस्थान (सीमैप) और सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के विज्ञानियों ने तीन वर्ष के लंबे शोध के बाद पुदीने और अजवाइन में फेफड़े के कैंसर को रोकने के यौगिक की खोज की है।
अध्ययन में पाया कि पुदीने की विशेष प्रजाति मेंथा स्पाइकेटा और अजवाइन की प्रजाति कारुम कार्वी (शिया जीरा) में पाया जाने वाला प्राकृतिक यौगिक कार्वीओल फेफड़ों के कैंसर (नान-स्माल सेल लंग कैंसर) को रोकने में बेहद असरदार है।
यह प्राकृतिक यौगिक स्वस्थ कोशिकाओं को बिना नुकसान पहुंचाए सिर्फ कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। यह शोध 19 अक्टूबर को जर्नल आफ मालिक्यूलर स्ट्रक्चर में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन का नेतृत्व करने वाली सीमैप की विज्ञानी डॉ. आभा मीना ने बताया कि वर्तमान में फेफड़ों के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी और अन्य थेरेपी अक्सर शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं। इससे मरीजों को काफी शारीरिक कष्ट और साइड इफेक्ट्स झेलने पड़ते हैं। पुदीना और अजवाइन की इस विशेष प्रजाति में साइड इफेक्ट्स न के बराबर रहते हैं।
कार्वीओल एक सक्रिय प्राकृतिक यौगिक है, जिससे भविष्य में फेफड़े के कैंसर की बिना गंभीर साइड इफेक्ट्स वाली दवाएं बनाई जा सकती हैं। अध्ययन में सीमैप के विज्ञानी अनुराग माथुर और सीएसआइआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान के विज्ञानी भी शामिल रहे।
ऐसे करता है काम
कार्वीओल एक सक्रिय प्राकृतिक मोनोटेर्पेनाइड यौगिक है जो मुख्य रूप से शरीर में मौजूद एलओएक्स-5 नामक हानिकारक एंजाइम को लक्षित करता है। यह एंजाइम कैंसर कोशिकाओं में सूजन और उनकी प्रगति को बढ़ावा देता है। कार्वीओल इस एंजाइम की गतिविधि को बाधित करके कैंसर कोशिकाओं की सिग्नलिंग को तोड़ देता है, जिससे वे बढ़ने या फैलने में असमर्थ हो जाती हैं और नष्ट होने लगती हैं।
बाजार में आने में तीन से चार वर्ष तक का लग सकता है समय
विज्ञानी डॉ. आभा मीना ने बताया कि यह शोध अभी नेटवर्क फार्माकोलाजी, इन विट्रो (प्रयोगशाला सेल लाइन्स) परीक्षण और मालिक्यूलर सिमुलेशन के चरण में सफल रहा है। प्रयोगशाला स्तर पर इसके परिणाम बेहद शानदार और सुरक्षित मिले हैं। इससे यह पता चल गया है कि इससे दवा बना सकते हैं। अब कोई भी दवा बनाने वाली कंपनियों और अनुसंधान दवा बना सकती है।
एक मानक दवा के रूप में बाजार में आने में अभी आगे के एनिमल माडल परीक्षण (जानवरों पर ट्रायल) और विभिन्न चरणों के क्लीनिकल ट्रायल्स से गुजरना होगा। इस पूरी प्रक्रिया और वैज्ञानिक औपचारिकताओं को पूरा होने में अभी तीन से चार वर्ष का समय लग सकता है।
