लखनऊ (दुर्गा शर्मा)। शिव हैं अधूरे गौरा प्यारी के बिना, गौरा हैं अधूरी त्रिपुरारी के बिना।

शंकर, शिव, भोले, उमापति, महादेव..। रौद्र भी वह हैं और आशुतोष (जल्दी प्रसन्न होने वाला) भी। जगतपिता के साथ संहारक भी हैं। नर और नारी दोनों हैं। कला प्रेमियों के नटराज और प्रेतों के लिए भूतभावन हैं। योगी, भावुक प्रेमी और गृहस्थ उनका हर रूप शिरोधार्य है। आस्था के अथाह कल्पना क्षेत्र में शिव के रूप अनेक हैं।

कहते हैं, हर रूप में सामूहिकता को समेटे देवाधिदेव भी पार्वती के बिना अधूरे हैं। दोनों के प्रेम रस से दुनिया सिंचित हो रही है। कला जगत पर भी दोनों की कृपा बरस रही है। शंकर-गौरा नाम की कस्तूरी से हर रचनात्मकता महक उठती है। फिर चाहे नृत्य हो गायन या कूची। महाशिवरात्रि के अवसर पर कला अनुरागियों ने कला क्षेत्र के आदि प्रवर्तक शिव-पार्वती के प्रति शब्दों के रूप में भावांजलि अर्पित की।

ऊर्जा का स्त्रोत हैं शिव-पार्वती

कथक नृत्यांगना डॉ. रूचि खरे कहती हैं, शिव और शक्ति नृत्य के आधार रूप में पूजनीय हैं। शिव से तांडव और पार्वती से लास्य का उद्भव माना गया है। कथक में गतें, ठुमरी व कवित्त इसी लास्य अंग से नाचे जाते हैं। शिव पुरुष और पार्वती प्रकृति रूप हैं। दोनों की ऊर्जा से संसार संचालित है। नृत्य की हर प्रस्तुति का मूल शिव स्तुति है। कथक में लच्छू महाराज की रचना दक्ष यज्ञ पर आधारित कवित्त अंग की प्रस्तुति खास रहती है।

संपूर्णता का नाम हैं शंकर-गौरा

लच्छू महाराज बैले सेंटर की निदेशक श्रृंगारमणि कुमकुम आदर्श कहती हैं, विपरीत होते हुए भी प्रेम की डोर शिव-पार्वती को बांधे है। दक्ष यज्ञ एकांगी नृत्य नाटिका सबको बहुत पसंद आती है। नृत्य नाटिका का एक प्रसंग खास है। कहती हैं, हिमालय पर बैठे भगवान शिव को जब सती के हवन कुंड में देह त्याग का पता चला तब शिव ने तांडव रूप धरा। जिससे धरती, आकाश और पाताल में उथल-पुथल होने लगा। तब भगवान विष्णु ने महादेव से प्रार्थना कि आप तो खुद इस जग के रखवाले हैं। क्रोध आपके ऊपर बिल्कुल नहीं सुहाता। जब-जब जन्म सती ने पाया तब-तब आप ही को अपनाया। जय-जय भोले, जय-जय शंकर..।

कंठ-कंठ में बसे नीलकंठ

35 वर्षो से अधिक शास्त्रीय संगीत गायन में अध्यापनरत आभा सक्सेना की संगीत पर आधारित दो किताबें नव्य संगीत प्रवीण और नव संगीत प्रवीण भाग-2 प्रकाशित हो चुकी हैं। विकास नगर में अपने घर पर ही 'संगीत साधना केंद्र' के जरिए बच्चों को संगीत से जोड़ने का काम कर रही हैं। स्मृति धवन, रिजा सिद्दीकी और मानव समेत इनके कई शिष्य राग यमन की बंदिश 'सदाशिव भज मन' और राग शंकरा और राग भैरव की उम्दा प्रस्तुति से कई मंचों पर अपनी गायिकी का हुनर दिखा चुके हैं। आभा कहती हैं, शिव के बिना हर कला शव है। लय और प्रलय शिव से ही है। शिव हमें लयबद्ध रहना सिखाते हैं।

कूची से निराकार को आकार

इंदिरा नगर निवासी तापस दास ने चित्रकला का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। फिर भी इनकी कूची किसी अनुभवी चित्रकार से कम नहीं है। बॉल पेन ड्राइंग और वॉटर कलर पेंटिंग का लाजवाब हुनर है। नौकरी की तलाश में सन् 1993 में कोलकाता से लखनऊ आ गए। पेट पालने की तमाम मुश्किलों के बीच भी अपने चित्रकारी के शौक को जिंदा रखा। तापस आजकल कूची से निराकार (शिव) को आकार देने में लगे हैं। कहते हैं, शिव का शांत रूप आकर्षित करता है। हर स्थिति में भोलेनाथ संयमित रहते हैं।

कुछ खास प्रस्तुतियां

शिव वंदना : वन्दे देवं उमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणम्..।

लच्छू महाराज जी ने परम्परागत कथक नृत्य में अनेक प्रयोग किए थे, जैसे-धातक थुंगा आमद को नाचते हुए उसमें राधा-कृष्ण छेड़छाड़ या गंगावतरण का भाव दिखाना। शिव महिमा मूल रहा।

अ‌र्द्धनारीश्वर : अ‌र्द्धशीश पर शशि उजियारा, अ‌र्द्धशीश गंगा की धारा। अ‌र्द्धभाल चंदन लपटाए, अ‌र्द्धभाल सिंदूर सुहाए। अ‌र्द्धभुजा पर डमरू बाजे, अ‌र्द्धभुजा पर कंगन साजे। अ‌र्द्धअंग है तांडव रूपा, अ‌र्द्धअंग है लास्य स्वरूपा..।

तांडु मुनि के नाम पर पड़ा तांडव

देवताओं के अनुरोध पर ब्रह्माजी ने ऋग्वेद से पाठ्य, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से संगीत और अथर्व वेद से रस को ग्रहण कर नाट्यवेद की रचना की। देवताओं ने ऋषियों के द्वारा इसका प्रदर्शन करवाने का आग्रह किया। तब ब्रह्मा ने भरत मुनि को इस नाट्य वेद की शिक्षा दी। ब्रह्माजी की आज्ञा से भरतमुनि ने अपनी मंडली के साथ कैलाश पर्वत पर जाकर शिव के सामने 'त्रिपुरदाह' नाम का नाटक प्रस्तुत किया। तब शंकर भगवान ने इस नाट्य प्रयोग में नृत्य की योजना करने का सुझाव दिया। अपने शिष्य तांडु मुनि को आदेश दिया कि वे भरत मुनि को नृत्य शिक्षा प्रदान करें। इस प्रकार तांडु के द्वारा सिखाए जाने के कारण ही शिवजी का प्रसिद्ध नृत्य 'तांडव' कहलाया।

आनंद तांडव है नटराज रूप

तांडव के सात भेद हैं, आनंद तांडव, संध्या तांडव, उमा तांडव, गौरी तांडव, कालिका तांडव, त्रिपुर तांडव, संहार तांडव। वहीं लास्य यौवत और छुरित दो प्रकार का होता है। शिव के आनंदित होकर नृत्य करते आनंद तांडव रूप को ही नटराज कहते हैं।

प्रेम, समर्पण और तप की अनूठी कहानी शिव विवाहोत्सव

करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े महाशिवरात्रि के पर्व से प्रेम समर्पण और तप की अनूठी कहानी जुड़ी है। यह एक जन्म की कहानी नहीं है। शिव विवाह पुरातन काल की सबसे आधुनिक शादी है। पिता दक्ष द्वारा अपने पति के अपमान पर देवी सती ने देह त्याग किया। सती ने पार्वती बनकर दोबारा पर्वत राज के घर जन्म लिया। शिव को फिर से पाने के लिए घोर तप किया। शिव पार्वती को अंगीकार करने को तैयार हुए।

पर भोले बाबा की अजब है बात,

चले संग लेकर के भूतों की बरात।

अड़भगी दूल्हे को देख मां मैना बेहाल,

पूछा गया कुल का तो नहीं था जवाब।

तब बोलीं मां पार्वती, शिव आप मुझे हर रूप में स्वीकार..।।

By Jagran