आदरणीय प्रधानाचार्या मैम,

मेरे मन में हमेशा एक सवाल उठता रहता है कि लड़कियां लड़कों से आगे क्यों नहीं जा सकतीं। क्यों माता-पिता व समाज यह समझता है कि बेटियां बेटों के मुकाबले कम होती हैं। बेटियां जब घर से बाहर जाती हैं और लौटने में दस मिनट की भी देर हो जाती है तो माता-पिता उससे ढेरों सवाल करते हैं। वहीं, बेटा घर से चाहे जितनी देर भी बाहर रहे उसे कोई नहीं टोकता। क्या लड़कियों को वह हक नहीं मिलना चाहिए जो लड़कों को मिलता है। आखिर फिर यह क्यों कहा जाता है कि बेटी तो लक्ष्मी का स्वरूप होती है।आज लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों को टक्कर दे रही हैं। यही नहीं, कई क्षेत्रों में तो लड़कियां लड़कों से अच्छा परफॉर्म कर रही हैं। बावजूद इसके लोग लड़कियों के साथ वह व्यवहार नहीं करते, जैसा लड़कों के साथ करते हैं। मेरे मन को यह बातें हमेशा ही कचोटती रहती हैं, लेकिन मैं किसी से यह कह नहीं पाती हूं।

आज बड़ी कोशिश कर मैं आपसे यह बातें साझा करते हुए पूछना चाहती हूं कि आखिर यह फर्क क्यों? क्या यह संभव नहीं कि माता-पिता बेटियों पर शक न करें और उन्हें बेटों की तरह अवसर उपलब्ध कराएं। देखा गया है कि माता-पिता की देखरेख बेटियां ज्यादा अच्छी तरह करती हैं। यही नहीं, जब परिवार को सपोर्ट करना हो तो भी उसमें भी बेटियां आगे रहती हैं। साफ है कि माता-पिता हों या परिवार, जो देखरेखबेटी कर सकती है, वह बेटे कभी नहीं करते। ऐसे में माता-पिता को बेटी को हर वह मौके देकर समर्थ बनाना चाहिए, जो वह बेटों को देते हैं।

आपकी आज्ञाकारी शिष्या

हुदा फातिमा [राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, विकास नगर, कक्षा-आठ]

 

शिक्षाविद नीलिमा कुमार ने बताया कि बेटियां मां-बाप की अधिक लाडली होती हैं। यही वजह है कि वह उनकी चिंता भी अधिक करते हैं। बेटियां इसे कतई ऐसा न समङों कि माता-पिता केवल उन्हें ही टोकते हैं। यदि वह आपसे सवाल-जवाब करते हैं तो उसे यह न समङों कि वह टोकाटाकी कर रहे हैं। आज लड़कियां केवल आगे ही नहीं बढ़ रही हैं, बल्कि शोहरत की बुलंदियां छू रही हैं। माता-पिता भी उन्हें पुत्र के समान ही हर संभव मौके देने में पीछे नहीं हटते। लड़कियां डॉक्टर, इंजीनियर, मैनेजमेंट ही नहीं, पुलिस व सेना तक में परचम लहरा रही हैं, लेकिन बेटा हो या बेटी उन्हें आजादी देने का यह मतलब नहीं कि अभिभावक उनसे कोई सवाल ही नहीं कर सकते। बच्चों को इसे अपने स्वाभिमान पर बिल्कुल नहीं लेना चाहिए। वह बच्चों के भले के लिए ही कुछ अंकुश रखते हैं। वजह यह है कि जब तक बच्चे इतना मेच्योर नहीं हो जाते कि वह उचित-अनुचित में अंतर कर सकें, पेरेंट्स को उन्हें संभालना पड़ता है।

माता-पिता का साथ बच्चों को नई ऊंचाइयों को छूने में मददगार साबित होता है। अक्सर किशोरावस्था में बच्चे भ्रमित हो जाते हैं। मां-बाप उन्हें सही राह दिखाने का काम करते हैं। इसलिए अभिभावक यदि कोई सलाह देते हैं या पूछताछ करते हैं तो उसे अन्यथा न लें और न ही आवेश में आएं। मां-बाप आपको कभी नहीं टोकते, लेकिन यह माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वह आपको सही-गलत की पहचान कराएं, जिससे आप जिम्मेदार बन सकें और जीवन में सफलता की सीढ़ियां तय करते हुए सुनहरा भविष्य बना सकें।

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