मम्मी-पापा

अगर चिट्ठी लिखने का आइडिया न मिला होता तो ये बातें न जाने कब तक मेरे दिल में दबी रहतीं। इस अहसास से ही मन हल्का लगने लगा है कि मैं वो बातें आपसे कहने जा रहा हूं, जिन्हें कहने की मेरी हिम्मत नहीं थी। ‘लिखना जरूरी है’ मुहिम ने मुङो बल दिया और मैं अपनी बात आप तक पहुंचाने की सोच सका।

मम्मी-पापा, आप दोनों से मुङो बेहद प्यार है। मेरी जिंदगी का सबसे ज्यादा वक्त आपके साथ ही बीतता है। मैं कोई भी काम आप दोनों की राय लेकर ही करता हूं। मेरी गलतियों पर आप बिगड़ते भी हैं और अनुशासन में रहने के लिए कहते हैं लेकिन, कभी-कभी आपका अनुशासन मुङो पीड़ा भी देता है। जब बाहर बच्चों को खेलने के लिए जाते हुए देखता हूं तो मुझ पर लगाई गई बंदिश मुङो अच्छी नहीं लगती है। मुङो घर से बाहर खेलने जाना अच्छा लगता है। अक्सर आपकी बेवजह की नाराजगी मुङो डिस्टर्ब कर देती है। मैं आप दोनों को खूब प्यार करता हूं लेकिन, आपका दबाव मुङो परेशान कर देता है।

आपका अक्सर ये कहना कि मोबाइल से दूर रहो, टीवी मत देखो, गेम मत खेलो, पढ़ाई की ओर ज्यादा ध्यान दो.. ठीक नहीं लगता। हर वक्त चहारदीवारी में रहते-रहते मैं ऊब जाता हूं। घर में दीदी और भइया से आप कुछ नहीं कहते लेकिन, हर वक्त छोटी से छोटी बात पर आपकी गाइड लाइन उन्हें भी परेशान कर देती है। हम जानते हैं कि आप हमारे भले के लिए ये बातें कहते हैं लेकिन, जरा सोचिए स्कूल से आने के बाद हर वक्त घर की चहारदीवारी में रहना हमें भी अच्छा नहीं लगता है। मानता हूं कि मैं छोटा हूं इसलिए मेरी ओर आपका ज्यादा फोकस रहता है। आप मुङो प्यार करते हैं। शायद इसी वजह से आप मुङो घर से बाहर नहीं जाने देते हैं लेकिन, हर वक्त की बंदिश मुङो परेशान कर देती है। मेरे साथ आप दोस्त के रूप में नहीं रहते हैं। मोबाइल से खेलूं तो डांट पड़ती है और टीवी देखूं तो भी। बाहर खेलने जाने नहीं दिया जाता है। ऐसे में सिर्फ पढ़ाई ही पढ़ाई से मन ऊबता है। ऐसा नहीं है कि मैं पढ़ाई नहीं करता। पढ़ाई में मैं आगे रहता हूं। टीचर भी मुङो पसंद करती हैं। मैं जो भी पढ़ाई करता हूं वह भी अपने आप से। आप मुङो पढ़ाई को लेकर समय नहीं देते हैं। आपसे बताई गईं बातें मेरे लिए अनमोल हैं। जैसे अन्य बच्चे अपने पापा-मम्मी के साथ बाहर घूमने जाते हैं वैसे मेरी भी अपेक्षा है कि मुङो भी बाहर घूमने का मौका मिले।

आपका बेटा

प्रखर द्विवेदी [कक्षा-आठ, क्राइस्ट चर्च कॉलेज]

आउटडोर गेम जरूरी

मानसिक रोग विभाग केजीएमयू के डॉ आदर्श त्रिपाठी ने बताया कि बच्चों को इंडोर की जगह आउटडोर गेम के लिए प्रोत्साहित करें। कम से कम शनिवार और रविवार को उनकी आउटडोर एक्टीविटी अवश्य कराएं। पार्क में उन्हें उनका पसंदीदा खेल खेलने के लिए भेजें। इससे बच्चों में ऐसे हार्मोन रिलीज होते हैं, जो तनाव का खात्मा करते हैं।

गैजेट, इंटरनेट, इंडोरगेम से बच्चों की जीवनशैली बोङिाल हो रही है। इसके दोषी अभिभावक ही हैं। ऐसे में बच्चे के हार्मोनल पर्वितन भी आ रहे हैं। उनकी आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है। चिड़चिड़ापन हावी हो रहा है। ऐसे में आउटडोर गेम के लिए बच्चों को पार्क भेजें। यहां वो प्रकृति से जुड़ सकेंगे। पार्क में खेलने से उनका शारीरिक और मानसिक विकास होगा। उनकी सोशल कनेक्टिविटी बढ़ेगी। ग्रुप में खेलने से नियमों का पालन करने की क्षमता विकसित होगी। मसल्स डेवलप होंगे। शरीर में रक्त प्रवाह सुचारु होगा और याददाश्त बेहतर रहेगी। इसके साथ ही अभिभावक बच्चों को बिहेवरल थेरेपी दें। इसमें मां-पिता से उनकी नजदीकी बढ़ेगी। उनसे उनके दोस्त, क्लास और कोचिंग आदि के संबंध में बातें करें।

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Posted By: Anurag Gupta

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