लखनऊ[संदीप पांडेय]।केजीएमयू के ई-हॉस्पिटल में कदम-कदम पर घपला है। यहां कुछ ही घंटों में लाखों पुरानी रसीदों को नई तारीख में तब्दील किया गया। वहीं, 24 घंटे में बनने वाली रसीदें पलक झपकते ही बना डाली गईं। यह कारनामा हम नहीं, कंप्यूटर से कटी रसीदों में दर्ज समय उजागर कर रहा है।

देशभर के 400 अस्पताल ई-हॉस्पिटल सुविधा से लैस हैं। वहीं यूपी के 42 अस्पताल एनआइसी के इस सॉफ्टवेयर की सेवा ले रहे हैं। मगर, केजीएमयू का ऑनलाइन सिस्टम धांधली की भेंट चढ़ गया। तकनीकी रूप से दक्ष सिंडीकेट कंप्यूटर प्रणाली में सेंध लगा रहा है। स्थिति यह है जहां नए वित्तीय वर्ष की तारीखों में पुराने वित्तीय वर्ष की रसीदें काट डाल लीं। वहीं नए वित्तीय वर्ष में भी 20 घंटे पुरानी रसीदें मरीजों को जारी कर खेल किया गया। वहीं अब एक और बड़ी धांधली उजागर हुई है। इसमें पांच अप्रैल को एक ही दिन में एक ही मिनट में करीब पांच हजार रसीदें मरीजों की काट दी गईं। वहीं केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. सुधीर कुमार सिंह व आइटी सेल इंचार्ज डॉ. संदीप भट्टाचार्य द्वारा 24 घंटे में हर रोज कुल पांच हजार रसीदें कटने का दावा किया गया। ऐसे में 60 सेंकेंड के अंतराल में पांच हजार रसीदें कैसे कट गईं, इस पर सवाल खड़ा होना लाजिमी है।

पलक झपकते कैसे कटी रसीदें: 48 वर्षीय कमलेश कुमार ने गठिया रोग में दिखाया। इनकी बीएमडी डेक्सा, स्पाइन, हिप, फोर ऑर्म की रसीद एक हजार रुपये की काटी गई। पांच अप्रैल को दोपहर 2:05 पर कटी रसीद की क्रमांक संख्या जीसीएएसएच-24370/201920 दर्ज है। वहीं इसी मरीज की पांच अप्रैल को ही पैथोलॉजी जांच की दूसरी रसीद काटी गई। इसकी क्रमांक संख्या जीसीएएसएच-29356/201920 है। यह रसीद पर समय 02:06 दर्ज है। ऐसे में सिर्फ 60 सेकेंड में 4,986 रसीद कैसे कट गईं। यह कहां गईं, इस पर सवाल उठना लाजिमी है। केजीएमयू के आईटी सेल के प्रभारी डॉ. संदीप भट्टाचार्य के मुताबिक संस्थान में लगभग सौ बिलिंग काउंटर हैं। एक पंजीकृत मरीज की बिलिंग करने में उसका बार कोड स्कैन करने, जांचों के नाम सेलेक्ट करने व इंटर कर रसीद काटने में कम से कम एक मिनट लगता है।

जांच टीम ने रिपोर्ट पर नहीं किए हस्ताक्षर 

केजीएमयू में रसीद कांड के घपले की जड़ें गहरी हैं। ऐसे में जांच सदस्य भी फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे हैं। रविवार को गठित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के सदस्य ने रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया है। ऐसे में आनन-फानन में की गई जांच ही सवालों के घेरे में आ गई।

ऐसे में केजीएमयू के प्रशासनिक अफसर, आइटी सेल व एनआइसी के अफसरों में हड़कंप मच गया। आनन-फानन छुट्टी के दिन कार्यालय खोल दिए गए। डेटा सेंटर व ई-अनुभाग के कर्मियों के अवकाश निरस्त कर उन्हें तलब कर लिया गया। यही नहीं, शासन के एक्शन से बचने के लिए तत्काल फैट फाइंडिंग कमेटी का गठन कर दिया गया। इसमें सॉफ्टवेयर संचालन करने वाली संस्था एनआइसी का एक सदस्य, केजीएमयू के आइटी सेल प्रभारी व एकेटीयू के एक प्रोफेसर को शामिल किया गया।

ऐसे में कमेटी में वह सदस्य भी शामिल था, जिसे खुद जांच के घेरे में होना चाहिए था। बावजूद, शाम को केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. सुधीर सिंह ने संस्थान के ऑफीशियल वाट्सएप ग्रुप पर फैक्ट फाइंडिंग की टेक्स्ट रिपोर्ट जारी की, जिसमें ‘बग’ की वजह से पुराने वित्तीय वर्ष की रसीदें कटने का हवाला दिया गया। मगर, सोमवार को जब फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठन करने के आदेश व रिपोर्ट संबंधी कागजों के बारे में जानकारी ली गई, तो पता चला कि जांच में शामिल एकेटीयू के प्रोफेसर ने रिपोर्ट पर हस्ताक्षर ही नहीं किया। ऐसे में रिपोर्ट में वायरस पर फोड़े गए ठिकरे पर सवाल गहरा गया है। 

प्रमुख सचिव ने किया जवाब-तलब: प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा रजनीश दुबे ने सोमवार को कुलसचिव व वित्त अधिकारी को तलब किया। वित्त अधिकारी मो. जमा के मुताबिक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी में जो तथ्य सामने आए वह प्रमुख सचिव को अवगत करा दिए गए।

तीन सदस्यीय कमेटी बनाई, बाहरी एजेंसी से जांच से इंकार: कुलपति प्रो. एमएलबी भट्ट के मुताबिक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की जांच रिपोर्ट पर एकेटीयू के प्रोफेसर ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। वहीं, अब मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया गया है। इसमें एकेटीयू के डॉ. मनीष गौड़, एनआइसी के वरिष्ठ तकनीकी निदेशक एके रावत व संस्थान के वित्त अधिकारी मो. जमा शामिल हैं। कमेटी तीन दिन में रिपोर्ट देगी। कुलपति ने बाहरी एजेंसी से जांच से इंकार कर दिया।

 

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Posted By: Divyansh Rastogi

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