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जागरण विमर्श- आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण बोले- जिसने हमें कुछ दिया है, उसे वह लौटाना ही सबसे बड़ा धर्म

Published: Fri, 09 Oct 2026 04:25 PM (GMT+05:30)

Jagran Vimarsh: आचार्य मिथिलेशनंदिनी ने कहा कि अनेक बड़े महापुरुषों के जीवन में आप देखेंगे, अपने समय में उन्होंने कोई बहुत महान कार्य किया।

श्री हनुमत निवास अयोध्या जी के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण

श्री हनुमत निवास अयोध्या जी के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण 

HighLights

  1. दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक नरेन्द्र मोहन की स्मृति में वर्चुअल गोष्ठी

  2. श्री हनुमत निवास अयोध्या जी के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने ''धर्म'' को किया रेखांकित

  3. दस अक्टूबर को दिया जाएगा नरेन्द्र मोहन स्मारक जागरण साहित्य सृजन सम्मान

जागरण संवाददाता, लखनऊ : जो सबको धारण करने वाली शक्ति है, जिसके द्वारा प्रत्येक अस्तित्वमान पदार्थ अपने अस्तित्व व चरित्र में बना रहता है, वह धर्म है। यानी धर्म वह है जो हम सबको धारण करता है। इस अर्थ में हम जब इस बात पर ध्यान देंगे तो केवल मानवीय अर्थों में नहीं, केवल मनुष्यों के लिए नहीं, अपितु जो अस्तित्वमान विश्व है, वह जिस शक्ति व जिस वैशिष्ट्य के द्वारा अपने अस्तित्व में रहता है और उससे उसका वह गुण, वैशिष्ट्य हट जाए तो वह अस्तित्व में ही न रहे, उस पदार्थ को धर्म कहा जाता है। यानी धर्मेण विधृताः प्रजाः। जिसने हमें कुछ दिया है, उसे वह लौटाना सबसे बड़ा धर्म है।

दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक नरेन्द्र मोहन की स्मृति में दस अक्टूबर को दिए जाने वाले जागरण साहित्य सृजन सम्मान से पूर्व शुक्रवार को वर्चुअल गोष्ठी में श्री हनुमत निवास अयोध्या जी के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने ''धर्म'' को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि धर्म की बड़ी व्यापक और सब पर लागू होने वाली परिभाषा है।

फिर यही धर्म जब व्यक्तिशः क्रमशः अलग-अलग लोगों के साथ जुड़ता है, तो वह मनुष्यों के साथ मानव धर्म होकर के, राष्ट्र के साथ राष्ट्र धर्म होकर के, छात्रों के साथ उनका छात्र धर्म होकर... जब हम उसके सापेक्ष धर्म की एक परिभाषा होती है। उन्होंने नरेन्द्र मोहन जी की स्मृति को याद करते हुए कहा, सैनिकों, शिक्षकों, चिकित्सकों और पत्रकारों का भी कोई धर्म है, पर इन सब पर समान रूप से प्रभावशाली कोई एक धर्म है तो वह है- मनुष्य धर्म।

अब जो भी वर्गीकरण हैं, वे प्रबंधन की सीमा में

आचार्य ने कहा, सूर्य को आत्मा कह कर, धरती को माता कह कर, विश्व-बंधुत्व की एक प्रतिज्ञा कर भारत ने अपनी धार्मिक दृष्टि को ही स्थापित किया है। अब जो भी वर्गीकरण हैं, वे प्रबंधन की सीमा में हैं। वस्तुतः भारत एक सार्वभौम धर्म की अवधारणा करता है, जिसमें ''विश्व कल्याण'' शब्द निहित है। हमारे यहां पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्षों की पूजा करने की कोई तिथि है, नदियों की पूजा करने की अवधारणा है। वह यह बताती है कि इस विराट ब्रह्मांड को हम एक सह-अस्तित्व में एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति के रूप में पहचानते हैं।

चांडाल को भी अपना गुरु कहते

आचार्य मिथिलेशनंदिनी ने धर्मशास्त्र के प्रमाण भगवत्पाद शंकराचार्य काशी का दृष्टांत देकर कहा कि वह केवल मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ नहीं करते, केवल गंगा और महादेव विश्वनाथ की स्तुति नहीं करते, बल्कि मार्ग में सामने पड़ने वाले एक चांडाल को भी अपना गुरु कह करके प्रणाम करते हैं और उसको भी कहते हैं कि यह मुझे शिक्षा देने के लिए ही, मुझे सिखाने के लिए मेरे सामने आया है।

जीव मात्र ईश्वर का अंश

तात्पर्य यह है कि जो हमारा हिंदू धर्म है, जिसको हम आधुनिकता में ‘हिंदू’ कह करके पहचानते हैं, पारंपरिक रूप से यह 'सनातन वैदिक धर्म' है, जो किसी प्रकार की हीनता को अस्वीकार करते हुए, जीव मात्र ईश्वर का अंश है, इसलिए यह उतना ही दिव्य है जितना ईश्वर। अवस्था भेद के कारण, कार्यकारण भेद के कारण, व्यक्ताव्यक्त के भेद के कारण इसमें कुछ न्यूनता और श्रेष्ठता दिखाई पड़ती है, वह तात्विक नहीं है। इसलिए दर्शन हमारे यहां दो शब्दों का व्यवहार करते हैं।

एक 'पारमार्थिक' सत्ता, एक 'व्यावहारिक' सत्ता

आचार्य मिथिलेशनंदिनी कहते हैं- एक ''पारमार्थिक'' सत्ता है, एक ''व्यावहारिक'' सत्ता है। जो पारमार्थिक है वह एक ही है। दूसरी बात, सबको एक ही परमात्मा से व्यक्त माना गया है, तो सबकी गति एक परमात्मा ही है। कोई भिन्न नहीं हो सकता। यह भी बड़ी गहरी दृष्टि है।

गंतव्य अनेक नहीं हो सकते

पुष्पदंत गंधर्व की जिस पंक्ति को स्वामी विवेकानंद ने अपने शिकागो के भाषण में उद्धृत किया- रुचीनां वैचित्र्याद्रुजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्तमसि पयसामर्णव इव॥ रुचियों के भेद से प्रस्थान भेद हो सकते हैं, रास्ते भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, पर गंतव्य अनेक नहीं हो सकते हैं, क्योंकि एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे। एक ही तत्व से सबकी अभिव्यक्ति हुई है और उसी अव्यक्त से सारा जगत व्यक्त होता है जड़-चेतन। तो इसलिए सबकी अंततः गति एक है, सबका केंद्र एक है, सबका मूल एक है।
आचार्य ने कहा कि धर्म की वास्तविक भूमिका हमारे जीवन में यह है कि परस्पर विरुद्ध हुए जगत को अविरुद्ध भाव से देखने और बरतने की योग्यता धर्म के द्वारा हमारे पास है। हम किसी को गाय और किसी को कुत्ते के रूप में पहचानते हुए व्यवहार में भेद करते हैं, पर इस व्यवहार के भेद के बावजूद तत्वतः दोनों में अभेद है, ऐसी निष्ठा हमारे भीतर बने, यह धर्म करता है। और इस रूप में ही धर्म को पहचाना जाना चाहिए।

धर्म न दूसर सत्य समाना

श्री रामचरितमानस में गोस्वामी जी ने- 'परहित सरिस धर्म नहिं भाई'' और 'धर्म न दूसर सत्य समाना' जैसी बातें कही हैं तो मानस के प्रकाश में जीवन के कठिन मोड़ पर मर्यादा और धर्म का पालन कैसे किया जाना चाहिए? इस पर आचार्य मिथिलेशनंदिनी ने कहा कि श्री रामचरितमानस में धर्म की गोस्वामी जी ने कोई अलग से व्याख्या नहीं की है। भारत की ज्ञान परंपरा में जो चीजें चली आ रही थीं, उनको ही प्रश्न के रूप में रख करके उनका उत्तर देते गए हैं वह। प्रायः वैदिक धर्म को ही आधार बनाया है उन्होंने।

बहुत महान कार्य 50-100 वर्षों के बाद हो सकता आलोचना विषय

आचार्य मिथिलेशनंदिनी ने कहा कि अनेक बड़े महापुरुषों के जीवन में आप देखेंगे, अपने समय में उन्होंने कोई बहुत महान कार्य किया। 50-100 वर्ष के बाद वह आलोचना का विषय बन गया या उसकी समीक्षा होने लग गई, क्योंकि वह परिस्थितिजन्य दबावों से किया गया कार्य था, उस काल में बहुत प्रासंगिक था।

मौलिक व्यवहार को निरस्त नहीं किया जा सकता

50-100 वर्ष के बाद उसकी प्रासंगिकता संदेह में चली जाती है, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपनी मौलिकता और अपने चरित्र के ही अनुरूप व्यवहार करता है, तो किसी काल में उसको नकारात्मक नहीं बनाया जा सकता, किसी काल में उस व्यवहार को निरस्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह मौलिक है। परिस्थितियां क्या करती हैं? वे हमें अपने स्वरूप से विस्मृत करा के अपने आसपास जो चीजें होती हैं... मैं सरल भाव से कहूं- सुख अथवा दुख के आवेग में हम सबसे पहले अपने को ही भूलते हैं, उन परिस्थितियों का चिंतन विशेष हो जाता है।

यदि ऐसा अभ्यास किया जा सके, जैसा श्रीराम करते हैं, जैसा श्री भरत करते हैं। भरत अपने ''भरत होने'' को प्रमाणित करते हैं। जो स्वभाव में स्थित है, किसी भी परिस्थिति में, जो अपने कर्तव्यों में प्रवृत्त होते हुए यह सुनिश्चित कर सकता है कि मैं यह हू्ं और मेरे करने के लिए यही उचित है, किसी काल में उसका किया हुआ अनर्थ नहीं हो सकता है। और जो परिस्थितियों के प्रभाव में आकर के प्रतिक्रिया में करता है, उसका कितना भी श्रेष्ठ कार्य क्यों न हो, वह कभी न कभी प्रश्नांकित हो सकता है।

उन्होंने कहा कि मैं समझता हूं धर्म का निर्धारण केवल व्यक्ति के कारण ही होगा। जब हम चलना प्रारंभ करते हैं, तो पहुंचना चाहे जहां हो, चलना हम वहां से प्रारंभ करते हैं जहां हम खड़े होते हैं। धर्म में जो प्रवृत्ति होने वाली है, वह असल में कर्ता की ही प्रवृत्ति होती है। इसलिए सबसे पहले यह पहचानना चाहिए कर्ता को कि मैं कौन हूं और मेरे लिए क्या विहित है।

आपके शरीर के स्वामी हैं माता-पिता

'जेन-जी' को किन आसान उदाहरणों से अपने पितरों के प्रति उदार भाव से जोड़ा जा सकता है? इस पर आचार्य ने एक छात्रा के प्रश्न के जिक्र करके बताया कि वह कहती थी कि हमारी कोख है, हम बच्चा रखना चाहते हैं कि नहीं, यह कोई हमें दूसरा कैसे बताएगा? तो मैंने उनको कहा कि थोड़ा सुनने में कठोर लग सकता है इसको- यह कब रियलाइज किया आपने कि आपकी कोख है? या यह शरीर आपका है, यह कैसे रियलाइज हुआ? किसी चीज का स्वामित्व पाने के लिए कोई प्रक्रिया होती है। इस शरीर के निर्माता माता-पिता हैं। उन्होंने जन्म दिया है, हमारा कोई आवेदन नहीं था, हम तो कान्शियस भी नहीं थे। और जन्म देकर के हमारे किसी भी कुछ भी लौटा देने के, किसी कमिटमेंट के बिना उन्होंने 18-20 वर्ष अपने जीवन का सर्वस्व लगाया है।

निर्माता सदैव स्वामी होता

एक दिन एक कैलेंडर चेंज होता है और आप कहते हैं 'हम वयस्क हो गए, इसलिए अब हमारा शरीर है, हमारी रुचि है'। यह कैसे हो सकता है? क्या उन्होंने आपको किसी दिन लिखकर दिया है? निर्माता सदैव स्वामी होता है, जब तक कि वह अपनी चीज या तो दान कर दे या तो बेच दे। एक हमारे बहुत आत्मीय परिवार की बच्चियों का विवाह था, तो उन्होंने कहा कि यह 'दान' क्या होता है, हम कन्याएं हैं, दान क्यों कराएंगी, हम कोई वस्तु हैं क्या? हमने कहा, आप सेल-डीड लिखवा सकती हैं। आप अपने माता-पिता की धरोहर हैं। आज आपके माता-पिता आपके शरीर को अपने दांपत्य में जाकर के संतानोत्पत्ति के लिए अनुमति दें, तो उनका स्वामित्व कैसे हटेगा? तरीका तो गोत्र परिवर्तन होगा...। वह एक लंबी चर्चा है, लेकिन गोत्र परिवर्तित हो जाएगा, उसके बाद आप पति के गोत्र या नाम का उपयोग करेंगी, उसके घर रहेंगी, गर्भाधान होगा, संतानोत्पत्ति होगी।

आचार्य मिथिलेशनंदिनी ने कहा कि एक पिता कैसे आपको अथराइज करेगा? दो ही मार्ग हैं- या तो वह बेच दे या तो वह दान कर दे। वह आपको फ्री करता है अपने पोषण के नियंत्रण से, अपने स्वामित्व से कि अब तुम अपने जीवन का अपने ढंग से उपयोग कर सकती हो, इसलिए दान करता है। स्वामित्व हटाने की कोई और पद्धति हो तो वह भी की जा सकती है।