[अम्बिका  वाजपेयी]। पिछले दिनों वेब मॉल के पास साइकिल रैली निकाली गई, पार्टी तो आप समझ ही गए होंगे। नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने के साथ यह भी ध्यान रखना था कि अपनी साइकिल अगली पंक्ति में रहे, ताकि फोटो फ्रेम में आ सकें। पहली लाइन में तमाम लोग ऐसे थे, जिनके घर में वाकई साइकिल नहीं होगी। एसयूवी से उतरे और पहले से तैयार खड़े कार्यकर्ता की साइकिल पर चार पैडल मारकर निकल लिए। एक नेताजी को फोटो भी खिंचानी थी और साइकिल की चिंता भी थी, क्योंकि साइकिल उनके बेटे की थी। जैसे-तैसे पुल की चढ़ाई तक पहुंचे और नजरें किसी को खोजने लगीं। पीछे उनका बेटा अपने दोस्त के साथ साइकिल की सवारी करता चला आ रहा था। उसको अपनी साइकिल पकड़ाते हुए हिदायत दी कि सीधे घर जाना। पूछने पर बोले, भैयाजी तो अभी फॉच्र्यूनर से बैठकर निकल लेंगे, वरना हमको ही घर तक पैडल मारना पड़ता।

लौटकर यहीं आना है

मशहूर शेर है... जब जरूरत थी चमन को तो लहू हमने दिया, अब बहार आई तो कहते हैं तेरा काम नहीं। आजकल एक पार्टी के कार्यकर्ता इसी मनोदशा से गुजर रहे हैं। जब चुनाव था तो नेताजी सुबह से शाम तक सिर आंखों पर बिठाए रहते थे। कार्यकर्ताओं ने अपना पेट्रोल और पैसा फूंककर झंडा बुलंद किया। मेहनत फलीभूत हुई और नेताजी विजय तिलक लगाकर ओहदेदार हो गए। इसके बाद तो जो सर आंखों पर बिठाए जाते थे, आंखों से दूर किए जाने लगे। एक कार्यकर्ता ने दर्द बयां करते हुए कहा कि अब कौन सुनता है, चुनाव में फिर दिखेंगे। पिछले सप्ताह एक बड़े नेताजी का जन्मदिन था। कार्यकर्ता जन्मदिन के लिए फोन मिलाने लगे तो सचिव से लेकर नेताजी तक का फोन बंद था। मन मसोसकर कार्यकर्ता ने सत्ता से बाहर रहने के दौरान नेताजी के साथ अपनी मुस्कराती फोटो देखकर कहा, आना तो हमारे ही पास है।

हमको आगे नहीं बढऩा

काफी दिन तक शहर में एक पार्टी की कमान संभालने वाले नेताजी को तोहफा मिला तो उन्हें सूबे के फलक पर सक्रिय होने को कहा गया। उनकी जगह दूसरे नेता को शहर की कमान सौंपी गई। इसके बाद भी पूर्व अध्यक्ष साहब का मोह पुराने पद से नहीं छूट रहा। पिछले दिनों शहर में वह कई जगहों पर कंबल वितरण करने पहुंच गए। इसके बाद उनको खबर मिली कि भैया सीतापुर से लौट रहे हैं तो वहां रास्ते में एक जगह कंबल वितरण करने पहुंच गए। इसके बाद किसी गांव में मतदाता पुनरीक्षण अभियान चल रहा था तो वहां भी वह वोटरों को जागरूक करने पहुंच गए। येन-केन प्रकारेण वह जिले में ही अपनी सक्रियता बरकरार रखे हुए हैं। उनकी सक्रियता से नए वाले अध्यक्ष भी हैरान हैं। कुछ कार्यकर्ता तो चुटकी लेते फिर रहे हैं कि इनको पार्टी प्रदेश स्तर पर सक्रिय होने को कह रही है और यह जनाब मानो ठानकर ही बैठे हैं-हमें आगे नहीं बढऩा।

नाते हैं नातों का क्या

यह फेसबुक भी अजब है। पुरानी यादों के पन्ने पलटकर कहता है कि मेमोरी शेयर कीजिए। साइकिल वाली पार्टी के एक जिलास्तरीय नेताजी ऐसी ही याद पोस्ट करके फंस गए। याद कीजिए एक साल पहले भैया की पार्टी ने बुआ से हाथ मिलाया तो लाल-नीली टोपी एक हो गईं। संयोग है कि बुआ के साथ ही भाभी का जन्मदिन भी पड़ता है। बबुआ यानी भैया भी बुआ के लिए केक और शॉल लेकर गए। खैर दोनों पार्टियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दोनों का जन्मदिन धूमधाम से मनाया। वही एक साल पहले की पोस्ट नेताजी ने फेसबुक पर शेयर कर दी, जिसमें बुआ और भाभी की फोटो साथ में लगाकर बधाई दी गई थी। किसी ने गठबंधन टूटने की याद दिलाई तो पोस्ट डिलीट कर दी गई, लेकिन तब तक तमाम कमेंट आ गए कि राजनीतिक कलाइयों पर राखी नहीं टिकती तो केक और शॉल की क्या बिसात। ये सियासी नाते हैं, नातों का क्या।

 

Posted By: Divyansh Rastogi

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