लखनऊ (जेएनएन)। शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र ने दैनिक जागरण संवादी के दूसरे दिन का पहला ही सत्र अपने नाम कर लिया। भारतेंदु नाट्य अकादमी में जागरण संवादी के दूसरे दिन का पहला सत्र संगीत का छूटता सिरा में परिचर्चा में पंडित छन्नूलाल ने सभी को बांध लिया। 

पंडित छन्नूलाल मिश्र ठुमरी के लब्धप्रतिष्ठ गायक हैं। किराना घराना और बनारस गायकी के मुख्य गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र को खयाल, ठुमरी, भजन, दादरा, कजरी और चैती के लिए जाना जाता है।  

संगीत का छूटता सिरा में परिचर्चा में पंडित छन्नूलाल के साथ यतींद्र मिश्र व सुनंदा शर्मा थे। इसमें पंडित जी ने शुरुआत में विलंबित ठुमरी . . ना ही परे मो का चैन गाकर समा बांधा। इसके बाद कहा कि ठुमरी में अब साहित्य नहीं दिखता है।

उन्होंने कहा कि अब तो ठुमकते हुए बोलों का उपयोग हो तो वह है ठुमरी। उन्होंने कहा कि ठुमरी दो प्रकार की है गत भाव और भाव नृत्य। पंडित जी ने कहा कि ठुमरी में मधुरता जरूरी है। अब तो पब्लिक को जो अच्छा लगे उसको गाना चाहिए। संगीत का सिरा आज इसलिए छूट रहा क्योंकि आजकल शिष्यों में धैर्य नहीं। थोड़ा गाकर खुद बड़ा समझने लगते हैं। जिनके पास समय नहीं वह खुद को कलाकार नहीं कलाबाज कहें। मोक्ष नहीं धन प्राप्ति का साधन बन रहा संगीत। 

सुनंदा शर्मा ने कहा कि इस तरह की चर्चा बहुत जरूरी है, जब मैं बच्ची थी तब गिरिजा देवी ने मुझे सुना था। तब से नौ साल तक मैं बनारस में ही रही। पुरानी चीजों को कंडेम करना का चलन है। लेकिन वेदमंत्र समझ न भी आये तो साउंड समझ आती है। बनारसी बंदिशों में फारसी शब्द। अप्पा जी ने बताया कि जो पुराने संगीतकार थे वो बनारस में अप्रूव होने के बाद ही प्रतिष्ठित होता था।

सुनंदा ने कहा कि ठुमरी तो 10-11 तरह की है पर दादरा मे नजाकत। पहले दो घण्टे का अलाप था। अब कुछ नही रहा। काशी में सिर्फ ठुमरी ही नहीं है। यहां अनेक गायन विधाएं हैं वर्तमान दौर में प्यास कम, नाम की चाहत ज्यादा। ठुमरी का रिदमिक फार्म दादरा। बनारस के दादरा में भाव पक्ष बहुत प्रबल। सुनंदा ने सुनाई कजरी : कहनवा मानव हो राधा रानी. . . निशि अंधियारी कारी बिजुरी चमके रुमझुम बरसत पानी। कहनवा मानो . .। . . . बैरन घर न जा मोरे सैंया। हाथ जोड़ तो से विनती करूं परूं तोरे पैंया। . . .गंगा रेती पे बंगला छवा दे मोरे राजा आवे लहर जमुनी की . . . सुनंदा जी ने मुग्ध कर दिया। इसी पर बना है गाना ढूढो ढूंढो रे साजना मोरे कान का बाला . . .।

पद्मभूषण छन्नू लाल मिश्र के साथ उनकी सह सुनंदा शर्मा ने आज के पहले सत्र को पहला सत्र गिरिजा देवी की स्मृति में समर्पित किया। पंडित छन्नूलाल मिश्र जी ने अप्पा जी की आत्मा को प्रणाम करके सत्र शुरू किया। पंडित छन्नूलाल मिश्र ने कहा कि अब तो लोग बहुत समझदार हो गए हैं। अब जो पब्लिक को अच्छा लगे वो गायें। 

उनके साथ पधारीं सुनंदा शर्मा ने कहा कि काशी में सिर्फ ठुमरी ही नहीं है। यहां अनेक गायन विधाएं हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में प्यास कम, नाम की चाहत ज्यादा है। पहले दो घण्टे का अलाप था। अब कुछ नही रहा। यह भी जरूरी है। 

 

Posted By: Dharmendra Pandey

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस