लखनऊ, [जितेंद्र उपाध्याय]। भूमिगत जल में पाई जाने वाली फ्लोराइड की मात्रा बढ़ रही है तो कई इलाकों में निर्धारित मात्रा से कम फ्लोराइड चिंता का विषय है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डा.नरेंद्र कुमार व उनकी टीम ने लखनऊ के आठ ब्लॉकों में फ्लोराइड की मात्रा का परीक्षण किया तो कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

सभी ब्लॉकों में जमीन के अंदर 100 से 120 फीट गहरे गड्ढे से निकाले गए पानी के 190 नमूने लिए गए। कुल नमूनों की जांच में 82.11 फीसद में निर्धारित सीमा के अंदर फ्लोराइड पाया गया और 17.89 फीसद में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 2011 में निर्धारित सीमा 1.5 मिलीग्राम प्रतिलीटर मात्रा से अधिक फ्लोराइड पाया गया। सरोजनीनगर ब्लॉक के बिस्मिल्लाह नगर में निर्धारित 1.5 मिलीग्राम प्रतिलीटर के स्थान पर फ्लोराइड की मात्रा 6.85 मिलीग्राम प्रतिलीटर पाई गई जो सबसे अधिक है। मोहनलालगंज के गोपालखेड़ा में निर्धारित 1.5 मिलीग्राम प्रतिलीटर के स्थान पर सबसे कम 0.42 मिलीग्राम प्रतिलीटर फ्लोराइड की मात्रा पाई कई जो सभी ब्लॉकों में सबसे कम है। अध्ययन में यह भी बात सामने आई है कि काकोरी, सरोजनीनगर, चिनहट व मोहनलालगंज ब्लॉक में अत्यधिक फ्लोराइड दूषित है। गोसाईगंज का भूमिगत जल की दूषित प्रतिशत काफी कम है। बख्शी का तालाब, मलिहाबाद और माल में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित मानक से कम है।

क्या पड़ेगा प्रभाव

फ्लोराइड की मात्रा मानक से कम या ज्यादा होने पर मानव के शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। शोधकर्ता डा.नरेंद्र कुमार ने बताया कि फ्लोराइड के असंतुलन से दांत व हड्डियों में कमजोरी के साथ ही पाचनतंत्र पर प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिक शोध में मानसिक मंदता का कारण भी इसकी अंसतुलित मात्रा को बताया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 0.5 से 1.5 मिलीग्राम प्रतिलीटर फ्लोराइड की मात्रा हड्डियों की मजबूती में सहायक होता है। असंतुलन को दुरुस्त करने के लिए औद्योगिक कचरे युक्त जल को भूमि में जाने से रोकना होगा और उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक उर्वरकों का प्रयोग करना होगा। 

Edited By: Anurag Gupta