लखनऊ, (कुसुम भारती)। श्रेयस जब तक लैपटॉप पर अपना मनपसंद गेम नहीं खेल लेता, वह खाना नहीं खाता और पांच साल की मिष्टी तो मोबाइल लिए बिना सोती ही नहीं है। यह तो सिर्फ उदाहरण भर हैं, ऐसे हजारों बच्चे हैं जो मोबाइल एडिक्शन का शिकार हैं। वहीं, मनोचिकित्सकों का कहना है कि मोबाइल एडिक्शन एक गंभीर रोग है। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों के दिमाग पर पड़ रहा है। ऐसे मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसे देखते हुए दो महीने पूर्व केजीएमयू के मनोचिकित्सा विभाग में बाकायदा 'प्रॉब्लोमेटिक यूज ऑफ टेक्नोलॉजी क्लिनिकÓ की शुरुआत की गई है। 

मोबाइल या टेक्नोलॉजी एडिक्शन

केजीएमयू के मनोचिकित्सा विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ. आदर्श त्रिपाठी कहते हैं, मोबाइल या टेक्नोलॉजी एडिक्शन में स्मार्ट फोन, स्मार्ट वॉच, टैब, लैपटॉप आदि सभी शामिल हैं। यह समस्या केवल भारत की नहीं, बल्कि दुनिया के हर देश की है। वह कहते हैं, ऐसे कई सीवियर केस हमारे क्लिनिक में आए जिसमें इस लत के चलते बच्चे बुरी तरह तनावग्रस्त थे। कुछ दोस्त व परिवार से कट गए, कुछ तो ऐसे थे जो मोबाइल न देने पर पेरेंट्स पर हमला तक कर देते थे, पर इलाज के बाद अब वे ठीक हैं। रोज ओपीडी में पांच साल से लेकर 18 साल तक के पांच-छह केस मोबाइल एडिक्शन के आते हैं।

यू-ट्यूब और ऑनलाइन गेम पर बिता रहे समय

डॉ. त्रिपाठी कहते हैं, छोटे बच्चे ज्यादातर यू-ट्यूब पर और बड़े बच्चे ऑनलाइन गेम्स में अपना समय बिताते हैं। आजकल यूजर के लिए कंपनियां एंडलेस गेमिंग के कंटेंट डेवलप कर रही हैं। पैसे कमाने की होड़ में अट्रैक्टिव ऑनलाइन गेम्स डेवलप कर रही हैं जो एक लेवल पार करने के बाद दूसरा लेवल पार करने पर रिवार्ड प्वाइंट व अन्य लालच पैदा करती हैं। साथ ही गेम्स के जरिए सोशल कनेक्शन भी पैदा कर रहे हैं। गेम खेलते समय यूजर किसी दूसरे देश के यूजर से जुड़ जाता है। बावजूद इसके दोनों के बीच हेल्दी कनेक्शन नहीं होता है क्योंकि गेम का कांटेक्स ही हेल्दी नहीं होता है।

फ्रंटल लोब पर पड़ता है असर

वैज्ञानिक रिसर्च कहती है कि बच्चों के फ्रंटल लोब पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। फ्रंटल लोब मस्तिष्क का वह हिस्सा होता है, जो सही-गलत व व्यवहारिक निर्णय लेने में मदद करता है। पर, इस लत के चलते फ्रंटल लोब प्रभावित होता है जो बच्चों में सही व गलत का निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर बना रहा है। उनकी सोच, विचार व भावनाओं को प्रभावित करता है। इसीलिए अक्सर बच्चे एग्रेसिव होकर पेरेंट्स पर हमला तक कर देते हैं।

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

  • याददाश्त कमजोर होना।
  •  पढऩे-लिखने या एकाग्रता वाले कामों में ध्यान न लगा पाना।
  • दुखी रहना या चिड़चिड़ापन होना।
  • सिरदर्द, आंख का कमजोर होना।
  • 12 से 14 वर्ष तक के बच्चों में नर्व, स्पाइन और मसल्स की समस्याएं होना।
  • स्पॉन्डिलाइटिस, लंबर स्पॉन्डिलाइटिस, वजन बढऩा, ऊर्जा की कमी, थकान होना जैसी दिक्कतों का बढऩा।
  • लीड लगाकर मोबाइल पर गाने सुनना या गेम खेलने से कानों में सीटी जैसी आवाज होना।
  • जरा-जरा सी बात पर एग्रेसिव हो जाना, आपस में मारपीट, झगड़ करना।
  • एडिक्ट बच्चे में मोबाइल व इंटरनेट इस्तेमाल करने की निरंतर इच्छा का होना।
  • नशा या शराब जैसी लत की तरह मोबाइल न मिलने पर कष्ट महसूस होना, बेचैन रहना।
  • यदि बच्चा मोबाइल या इंटरनेट एडिक्ट है तो काउंसिलिंग के जरिए इलाज हो जाता है, मगर गंभीर अवस्था में दवाएं भी चलाई जाती हैं।

गैजेट हाईजीन की आदत अपनाएं

  • गैजेट हाईजीन का मतलब है जीवन में ऐसे नियमों का पालन करना जो आपको गैजेट से दूर रखें।
  •  नोटिफिकेशन बंद करके रखें। इंटरनेट यूजर समय सीमा निर्धारित करें।
  • यदि कोई 60 वर्ष का व्यक्ति सोशल मीडिया या विदेश में रहने वाले बच्चों से वीडियो कॉल पर बात करते हुए अपना समय दे रहा है तो कोई हर्ज नहीं, मगर बच्चों व किशोरों का समय देना गलत है।
  • बच्चों को मोबाइल व इंटरनेट एडिक्शन से बचाने के लिए सबसे पहले अभिभावक खुद को गैजेट से दूर रखने का प्रयास करें।
  • वैज्ञानिक रिसर्च कहती है कि पांच साल तक के बच्चों को कतई मोबाइल न दें, भले ही वह कितना जिद करे।
  • नियम बनाएं कि खाना खाते समय परिवार का कोई भी सदस्य गैजेट का इस्तेमाल नहीं करेगा।
  •  सोने से दो घंटे पहले और सुबह जागने के तुरंत बाद गैजेट का इस्तेमाल न करें।
  • बहुत जरूरी हो तभी बच्चों को गैजेट दें, मगर उसके कंटेंट का ध्यान भी रखें।

मनोवैज्ञानिक डॉ. सृष्टि श्रीवास्तव कहती हैं, वर्चुअल वल्र्ड में तो कनेक्शन स्ट्रांग होते जा रहे हैं, पर परिवार और समाजिक रिश्तों की मिठास कम होती जा रही है। हर घर का आज यही हाल है। स्मार्ट का मतलब है पूरी तरह इंटरनेट पर निर्भरता, फिर चाहे कोई जानकारी हो या कुछ और। लोग स्मार्ट गैजेट्स पर पूरी तरह निर्भर होते जा रहे हैं, खासकर बच्चे और यंग जेनरेशन। सोते-जागते हर समय फोन पर चिपके रहते हैं। पेरेंट्स को चाहिए कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के साथ ही बच्चों को क्रिएटिव बनाने पर जोर दें। हालांकि, आज के दौर में इंटरनेट से दूरी बनाना असंभव है, पर बच्चों और बड़ों को इनका इस्तेमाल संभलकर और सीमित तौर पर करना चाहिए।

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Posted By: Divyansh Rastogi

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