लखनऊ[रूमा सिन्हा]। देश भर में हो रही भूजल की बेलगाम लूट से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) सख्त नाराज है। निरंकुश भूजल दोहन के दो मामलों की सुनवाई करते हुए बीती 28-29 अगस्त को दिए गए आदेश में एनजीटी ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) को जमकर लताड़ लगाई है। कहा कि प्राधिकरण देश में भूजल के अंधाधुंध दोहन पर अंकुश लगाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अनुपालन कराने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। भूजल संकट को आपातकालीन स्थिति करार देते हुए कोर्ट ने कहा है कि इस मामले में वैधानिक व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के 1996 के आदेश को ध्यान में रख कर पर्यावरण एक्ट 1986 के प्रावधानों के अनुसार की जाए। एनजीटी ने यह भी कहा कि जिन्होंने बीते वर्षों में भूजल का जमकर दोहन किया है उनसे क्षतिपूर्ति के लिए वसूली की भी व्यवस्था की जाए। प्राधिकरण के लापवाह रवैये से नाराज एनजीटी ने भारत सरकार के तीन केंद्रीय मंत्रालयों (जल संसाधन, पर्यावरण एवं कृषि) को जिम्मेदारी सौंपते हुए एक माह के भीतर पूरे देश में भूजल दोहन के नियंत्रण व संरक्षण के लिए प्रभावी नीतिगत ढांचा तैयार करने के आदेश दिए हैं। दरअसल, मामला लखनऊ सहित नोएडा, गाजियाबाद, आगरा, मुरादाबाद सहित देश भर में हो रहे भूगर्भ जल के अनधिकृत व बेहिसाब दोहन से जुड़ा है। बताते चलें कि कि एनजीटी इस संबंध में केंद्रीय भूमिजल प्राधिकरण को लगातार आदेश देता रहा है। लखनऊ, मुरादाबाद, आगरा, गाजियाबाद के होटलों द्वारा किए जा रहे बेहिसाब भूजल दोहन पर दायर शैलेश सिंह की याचिका तथा उद्योगों, बिल्डर्स, मिनरल वाटर बॉटलिंग इकाइयों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जा रहे दोहन के संबंध में विक्रांत तोंगड़ की याचिका पर एनजीटी में छह वर्षों से लगातार सुनवाई चल रही है। इस सिलसिले में वर्ष 2013 से ट्रिब्यूनल द्वारा कई आदेश जारी किए गए हैं। कोर्ट के अनुसार इन आदशों का अनुपालन करने में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने जबर्दस्त लापरवाही बरती है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने जो जिम्मेदारियां दी थीं उनका भी जमकर उल्लंघन किया। इसलिए है नाराजगी:

केंद्रीय भूमिजल प्राधिकरण के उच्च पदस्थ अधिकारियों की कार्यशैली पर प्रश्न उठाते हुए एनजीटी ने कहा कि प्राधिकरण को पूरे देश में अंधाधुंध बो¨रगों को विनियमित करने, भूजल दोहन को नियंत्रित करने तथा भूजल की सुरक्षा व संरक्षण के लिए एक रेगुलेटरी संस्था का जिम्मा सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 1996 में सौंपा गया था। लेकिन आज तक भूजल नियंत्रण व नियमन के लिए प्राधिकरण द्वारा एक सही, ठोस नियामक ढांचा नहीं बनाया जा सका। प्राधिकरण की नाकामी का आलम यह है कि देश भर में मात्र 162 इलाकों को ही नोटीफाई किया गया, जबकि केवल उत्तर प्रदेश में 172 अतिदोहित व क्रिटिकल क्षेत्र चिंहित हैं। बावजूद इसके प्राधिकरण केवल गाजियाबाद को ही नोटीफाई कर सका है। बताते चलें कि देश में 1071 अतिदोहित, 217 क्रिटिकल व 697 सेमीक्रिटिकल क्षेत्र वर्गीकृत किए गए हैं। प्राधिकरण की विफलता का यह स्पष्ट प्रमाण है। गौरतलब है कि इस संबंध में जो गाइड लाइन बनाई गई है उसे भी ठीक से लागू नहीं किया गया। आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ यही इलाके नहीं, भूजल पर बढ़ती निर्भरता के कारण बड़ी संख्या में देश के अनेक प्रमुख शहरों में गिरता भूजल स्तर गंभीर समस्या बन गया है। जिसका असर जलापूर्ति की तमाम योजनाओं पर पड़ रहा है।

Posted By: Jagran

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