लखनऊ (मुहम्मद हैदर)। लखनऊ को खूबसूरत इमारतों के शहर का खिताब यू हीं नहीं मिला। इसके पीछे जिन शख्सियतों की सोच थी उनमें से एक थे अवध के नवाब सआदत अली खां। कैसरबाग से लेकर दिलकुशा कोठी तक लगभग सभी खूबसूरत इमारतें इन्हीं की बनवाई हुई हैं, लेकिन आज उनके नाम से बने मकबरे की भी सुध लेने वाला कोई नहीं है। परिवर्तन चौक पर बना यह ऐतिहासिक मकबरा अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। एक ओर जहां ऐतिहासिक इमारत का गुंबद खोखला हो चुका है, तो वहीं मुख्य इमारत में पड़ी दरारें पड़ती जा रही है।

कई बार मरम्मत होने के बाद भी यह ऐतिहासिक संरक्षित इमारत अब भी बदहाली की मार ङोल रही है। रखरखाव न होने से इस बेमिसाल इमारत का रंग उड़ गया है। अवध के बादशाह गाजीउद्दीन हैदर ने 1814-1827 के बीच अपने पिता सआदत अली खां के नाम पर इस इमारत का निर्माण कराया था। यहां नबाव की कब्रगाह भी है। जिसके बगल में सआदत अली खां की बेगम खुर्शीदजादी का मकबरा है।

करीब दो सौ वर्ष पुरानी यह इमारत जर्जर होती जा रही है। इमारत का गुंबद अंदर से बिलकुल जर्जर हो चुका है, जहां से लखौरियां दिख रहीं हैं। छत व दीवारों पर की गई नक्काशी भी मिट चुकी है। सीढ़ियों के कई पत्थर निकल चुके हैं, फर्श भी धंस गई है। इमारत के बाहरी हिस्से की हालत भी दयनीय है। कई बुर्जियां गिर चुकी हैं। यहां तक कि संरक्षित इमारत का बोर्ड भी धुंधला हो चुका है। 

मकबरे के तहखाने में नवाब की कब्र
मकबरे के तहखाने में उत्तर-दक्षिण दिशा में नवाब की कब्रगाह बनी है। लखौरी ईंटों से बनी इस बेमिसाल इमारत के मुख्य कक्ष में दो व बाहर की ओर एक आयताकार बरामदे हैं। प्रत्येक कोने पर स्तंभ युक्त छतरी है, जिसके ऊपर गुंबद है। मुख्य गुंबद खरबूजे के आकार का है, तो फर्श में शतरंज के बोर्ड की तरह काले व सफेद रंग के पत्थर लगे हैं। जो अब धूमिल हो चुके हैं। नवाब सआदत अली खां की कब्र मकबरे के तहखाने में बनी है।

नहीं सुधरी कदम रसूल की सूरत

पहले स्वतंत्रता संग्राम में इमामबाड़े में बना कदम रसूल कभी भारतीय क्रांतिकारियों का मजबूत गढ़ हुआ करता था। जहां संग्राम के दौरान जबरदस्त बमबारी हुई थी, जिससे इमारत को बड़ा नुकसान पहुंचा। बाद में सिकंदरबाग युद्ध में भी इमारत को नुकसान हुआ। यहां पर हजरत मुहम्मद साहब के पैरों के निशान वाला एक पत्थर भी है, जो मक्का-मदीना से लाया गया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहां बारूद में धमाका होने से कदम रसूल तबाह हो गया। बाद में अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर लिया। तीन वर्ष पहले हुसैनाबाद ट्रस्ट व जिला प्रशासन ने मिलकर कदम रसूल को संवारने के लिए प्रस्ताव तैयार किया था, लेकिन समय के साथ यह प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में खो गया।

यहां दफन हैं गाजीउद्दीन हैदर

गाजीउद्दीन हैदर ने इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मोहम्मद साहब के दामाद हजरत इमाम अली अलेहिस्सलाम की याद में इमामबाड़ा शाहनजफ हो बनवाया था। उनकी वसीयत के अनुसार यहीं पर गाजीउद्दीन हैदर को उनकी मृत्यु के बाद सन् 1827 में दफनाया गया। लखौरी ईटों और चूने के मसालों से निर्मित इस इमारत के ऊपरी छोर पर बड़ा सा गुंबद है। जिसके चारों ओर गलियारा नुमा बरामदा है। मुख्य कक्ष में इमाम की जरीह के पास ही बादशाह के साथ उनकी तीन बेगम सरफराज महल, मुबारक महल व मुमताज महल की कब्र है।

अतिक्रमण के साये में विरासत
हजरतगंज स्थित शाहनजफ इमामबाड़ा अतिक्रमण के साये में है। बादशाह गाजीउद्दीन हैदर ने (सन् 1814 से 1827) इस इमामबाड़े को बनवाया था। धार्मिक महत्व के साथ यह इमारत पहले स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाती है। रखरखाव के साथ अतिक्रमण का मार ङोल रही यह इमारत बदहाल हो चुकी है। एक ओर इमामबाड़े की सेंचियों में लोग घर बनाकर इसकी बाउंड्रीवाल को खोखला कर रहे हैं। पीछे की ओर दर्जनों लोगों ने इमारत की बाउंड्री से मिलाकर मकान खड़ा कर लिया है। वहीं, खाली पड़े मैदान में गाड़ियों की मरम्मत की जा रही है। मुख्य इमारत भी खस्ताहाल हो चुकी है। बरामदे में जगह-जगह से छत के साथ दीवारों में भी दरारें पड़ चुकी हैं।

 

Posted By: Anurag Gupta

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