लखनऊ, जेएनएन। हरतालिका तीज के दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और सौभाग्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। हिंदू धर्म के अनुसार व्रत का बड़ा महत्व है।

इस बार हरतालिका तीज के व्रत की तिथि को लेकर लोग काफी असमंजस में हैं। धर्म विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार हरतालिका व्रत एक सितम्बर यानी रविवार को है तो वहीं कुछ कह रहे हैं कि यह दो सितम्बर को है।

उदया तिथि के अनुसार दो सितंबर यानी सोमवार को ही तीज व्रत रखा जाएगा। दो सितंबर दिन सोमवार को सूर्योदय 5 बजकर 45 मिनट पर होगा, सुबह 9 बजकर 2 मिनट के बाद चतुर्थी तिथि लग जायेगी, इस दिन हस्त नक्षत्र दिन में 1 बजकर 35 मिनट, पश्चात चित्रा नक्षत्र, शुभ योग दिन में 11 बजकर 9 मिनट बाद शुक्ल योग। चन्द्रमा का संचरण कन्या राशि में होगा। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरितालिका का व्रत किया जाता है। इसमें अगर तृतीया तिथि का मुहूर्त मात्र (2 घटी अर्थात 48 मिनट =1मुहूर्त) भी हो तो भी यही तिथि ग्राह्य है। द्वितीया पितामह ब्रह्मा जी का है और चतुर्थी गौरी, पुत्र गणेश की तिथि है, अत: द्वितीया से युक्त तृतीया का निषेध और चतुर्थी का योग श्रेष्ठ है। गौरी और गणेश के तिथियों का सम्मिलन उत्तम माना गया है। अत: 2 सितम्बर को निर्विवाद रूप से पवित्र व्रत हरितालिका रखा जाएगा।

सुहागिनें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यह व्रत रखती हैं। तृतीया तिथि एक सितंबर रविवार को सुबह प्रात: 8 बजकर 26 मिनट से रात्रि 4 बजकर 56 मिनट तक रहेगी। दो सितंबर को उदया तिथि चतुर्थी होगी। अत: हरतालिका व्रत पूजन रविवार को ही किया जाना शास्त्र सम्मत है। पति परिवार और बच्चों की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाने वाला हरितालिका व्रत एक सितंबर को है।

इस वर्ष व्रत का महात्म्य भाद्रपद तृतीया तिथि सोमवार को होने से एवं चन्द्रमा कन्या राशि का होकर दैनिक ग्रहीय स्थिति के अनुसार धन स्थान में स्थित होकर आयुष्य भाव पर दृष्टिपात करेगा। हस्त नक्षत्र का स्वामी चन्द्र अपने ही वार का नियमन कर रहा है । अत: यह व्रत पति के आयुष्य एवं भौभाग्य वृद्धि के साथ ही साथ अनेकानेक अन्य शुभताओं को प्रदान करने वाला है। सौभाग्यवती स्त्रियॉ अपने सुहाग की लम्बी आयु की कामना से हरितालिका तृतीया यानी तीज व्रत करती हैं। इसमें महिलाएँ अन्न, जल ग्रहण करे बिना श्रद्धापूर्वक यह व्रत रखती हैं। पुराणों के अनुसार इस व्रत को देवी पार्वती ने किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शंकर की प्राप्ति हुई थी। इस दिन पूजन, अर्चन के साथ मॉ पार्वती की कथा भी सुनती हैं, जिसमें देवी पार्वती के त्याग, धैर्य एवं एकनिष्ठ पतिव्रत की भावना को जानकर उनका मन विभोर हो उठता है। इस दिन मुख्य रूप से शिव- पार्वती और मंगलकारी गणेश जी की पूजा- अर्चना करने का विधान है ।

सुहागिन भोर में किसी सरोवर में स्नान कर व्रत का संकल्प लें। घर पर दूब युक्त लोटे में जलभर कर 108 बार स्नान करें। व्रत पूर्व संध्या पर रात्रि में ही सहज भोजन मिष्ठान लेकर जल पी लें। व्रत के दिन उन्हें निराहार निर्जला ही रहना होता है।

पूजन व आरती का मुहूर्त

सुहागिन शिव-पार्वती का पूजन करती हैं। उनकी भव्य झांकी सजाती हैं। शाम को विशेष पूजन एवं आरती मुहूर्त छह बजकर 15 मिनट से 8 बजकर 58 मिनट तक है। इसके पश्चात प्रत्येक प्रहर में आरती वंदना की जाती है।

ब्रह्म मुहूर्त में पुन: शिव-पार्वती के मृदा से निर्मित विग्रहों का पूजन अर्चन कर विसर्जन सरोवर नदी में किया जाता है। सुहागिन रात्रिकाल में जागरण करती हैं। यह सभी सामूहिक भजन कीर्तन के साथ शिव-गौरी की भक्तिवंदना करती हैं।

व्रत तिथि को लेकर विद्वानों के विभिन्न मत

इस बार विद्वानों के विभिन्न मत तृतीया को दो सितंबर भी तृतीया व्रत की बात रख रहे हैं। यहां उन सभी से विनम्रता पूर्वक आग्रह है कि निश्चित तौर पर हरितालिका व्रत तीज एक सितंबर को ही मनाया जाना चाहिए। कारण, उदयातिथि में तृतीया तिथि एक और दो सितंबर दोनों में ही नहीं है। इसके साथ ही गणना में स्पष्ट रूप से तिथी की उपस्थिति लगभग पूरे अहोरात्र में एक सितंबर को ही है। 

Posted By: Dharmendra Pandey

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