लखनऊ, [सौरभ शुक्ल]। बांग्लादेशी डकैत हमजा को मुठभेड़ में ढेर कर पुुलिस ने साहसिक काम किया है, लेकिन उसको लेकर तमाम सवाल भी खड़े हो गए हैं। पहला सवाल यह है कि क्या चार साल पहले हमजा बांग्लादेशी नहीं था? पुलिस रिकार्ड के मुताबिक 2017 में गोमतीनगर क्षेत्र में उसे गिरफ्तार करके जेल भेजा गया था। इसमें भी पुलिस के दावे अलग-अलग हैं।

गोमतीनगर कोतवाली के निरीक्षक केके तिवारी कहते हैं कि उसे चोरी के आरोप में जेल भेजा गया था तो एडीसीपी हमजा को डकैती में जेल भेजने की बात बताते हैं। बड़ा सवाल यह है कि चार साल पहले पकड़ा गया हमजा बांग्लादेशी था तो उसके खिलाफ घुसपैठ का मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया गया। पुलिस ने कैसे पड़ताल की थी कि उसके बांग्लादेशी होने का प्रमाण नहीं मिला? उसे जेल किस पते से भेजा गया था? उसके पास कहां का निवास प्रमाण पत्र मिला था? उसकी विवेचना किसने की थी? जमानत किसने ली थी? अगर उस समय ही बांग्लादेशी होने का प्रमाण मिला तो उसकी गिरफ्तारी की सूचना दूतावास को क्यों नहीं दी गई ? अगर वह जेल से छूटा तो पुलिस ने उसकी निगरानी क्यों नहीं की। जब वह जमानत पर जेल से छूटा तो उसकी सूचना दूतावास में क्यों नहीं दी गई?

चलिए मान लेते हैं कि अगर चार साल पहले वह बांग्लादेशी नहीं था तो अब उसके बंग्लादेशी होने की पुष्टि कैसे हुई? अगर चार साल पहले वह बांंग्लादेशी था तो उसने किन दस्तावेजों के आधार पर जमानत ले ली? अगर चार साल पहले उसने जमानत में फर्जी दस्तावेज लगाए तो पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान खड़े होते हैं। पुलिस की थ्योरी मान भी लेते हैं कि कुछ पहले पकड़े गए साथियों से पूछताछ पर उसके बांग्लादेशी होने का पता चला तो चार साल पहले उसकी मदद करने वालों की तलाश करनी चाहिए। जाहिर सी बात है कि उसको भारतीय दस्तावेज और कानूनी मदद यहीं के लोगों ने दी होगी।

मामले में पुलिस की घोर लापरवाही है। हमजा को जब 2017 में जेल भेजा गया तो कब और कैसे उसे जमानत मिली। जमानत के बाद दूतावास में इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई। उसके मुकदमे का ट्रायल चल रहा था कि नहीं। पुलिस ने उसकी निगरानी क्यों नहीं की। पुलिस की लापरवाही से उसे पुराने मामले में जमानत मिल गई और फिर वह वारदात करता रहा। - सुनिति सचान त्रिपाठी, पूर्व अपर महाधिवक्ता

Edited By: Vikas Mishra