लखनऊ, जेएनएन। नरेन्द्र मोदी सरकार में वित्त मंत्री निर्मला सीतामरण की अध्यक्षता में शुक्रवार को लखनऊ में हुई जीएसटी काउंसिल की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए हैं। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों से फिलहाल राहत नहीं मिलने वाली है। जीएसटी काउंसिल की 45वी बैठक में ज्यादातर राज्य पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने पर सहमत नहीं हुए। वहीं कोरोना व कैंसर के इलाज में काम आने वाली दवाओं समेत कुछ अन्य जीवनरक्षक औषधियां अब सस्ती होंगी।

बैठक खत्म होने के बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैठक में फैसलों की जानकारी देते हुए कहा कि केरल हाई कोर्ट ने जीएसटी काउंसिल को पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार करने का निर्देश दिया था। हाई कोर्ट के निर्देश पर यह मुद्दा काउंसिल के विचारार्थ रखा गया था। बैठक में ज्यादातर राज्यों ने पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने पर असहमति जतायी है। यह कहते हुए कि इसके लिए यह उचित समय नहीं है। हम केरल हाई कोर्ट को काउंसिल की भावना से अवगत कराएंंगे। पेट्रोल व डीजल पर अभी केंद्र टैक्स लेता है। केंद्र के टैक्स लगाने के बाद राज्य इस पर वैट लगाकर उसे वसूलते हैं। राज्यों को लगता है कि पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने पर उन्हें राजस्व का नुकसान तो होगा ही, कर वसूलने का अधिकार भी उनके हाथ से छिन जाएगा।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतामरण ने बताया कि जीएसटी काउंसिल की बैठक में फैसला लिया गया कि कैंसर की दवाओं पर भी जीएसटी घटा दिया जाए। अब इन दवाओं पर 12 से घटाकर पांच फीसद जीएसटी लिया जाएगा। इसी प्रकार सभी तरह के पेन पर 18 फीसद‌ जीएसटी होगा। बायो डीजल पर जीएसटी 12 से घटाकर पांच फीसद की गई। वहीं, पौष्टिकता से भरपूर फोर्टिफाइड चावल पर 18 से पांच फीसद जीएसटी किया गया। रेलवे लोकोमोटिव पार्ट्स पर 18 फीसद जीएसटी लगेगा। रिन्यूएबल एनर्जी के कंपोनेंट पर 12 फीसद जीएसटी होगी। वहीं, आयरन, कापर, लेड, जिंक, कोबाल्ट पर 18 फीसद जीएसटी लगेगा।

जीएसटी काउंसिल की बैठक में सात राज्यों के उप मुख्यमंत्री शामिल हुए हैं। इनमें अरुणाचल प्रदेश के चौना मेन, बिहार के उप मुख्यमंत्री राज किशोर प्रसाद, दिल्ली के मनीष सिसोदिया, गुजरात के नितिन पटेल, हरियाणा के दुष्यंत चौटाला, मणिपुर के युमनाम जोए कुमार सिंह और त्रिपुरा के जिष्णु देव वर्मा शामिल हैं। इसके अलावा कई राज्यों के वित्त या फिर मुख्यमंत्री की ओर से नामित मंत्री भी शामिल हुए हैं। केन्द्र सरकार ने एक देश -एक दाम के तहत पेट्रोल-डीजल, नेचुरल गैस और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (विमान ईंधन) को जीएसटी के दायरे में लाने पर विचार किया था। इसी को लेकर बैठक में चर्चा की गई।

उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने जीएसटी काउंसिल की 45वीं बैठक में उत्तर प्रदेश की तरफ से अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इंफोर्समेंट और तकनीकी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए। समय के साथ कानूनों में आवश्यक परिवर्तन स्वाभाविक है। आम लोगों के जनजीवन को आसान बनाने के लिए नियमों एवं कानूनों में संशोधन व परिवर्तन किया जाना चाहिए। जिससे कि आम आदमी पर बोझ न पड़े। उत्तर प्रदेश ने कोविड-19 के बाद बेहतर प्रदर्शन किया है। 

बैठक से पहले ही उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने संकेत दिया था कि वह पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने का विरोध करेंगे। काउंसिल की बैठक से पहले वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा था कि उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स को जीएसटी के अंतर्गत लाने के खिलाफ है। उनके साथ में बैठक में शामिल छह अन्य राज्यों के वित्त मंत्री पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में शामिल करने पक्ष में नहीं हैं। इससे तो तय है कि बैठक में पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में लाने का प्रस्ताव अगर रखा भी जाता है तो वह खारिज हो सकता है।

लखनऊ के होटल ताज में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) काउंसिल की 45वीं बैठक केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में हुई। इस बैठक में जैसे ही पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया तो कई राज्य इसके विरोध में खड़े हो गए। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, झारखंड, छत्तीसगढ़, केरल समेत ज्यादातर राज्यों ने पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे से बाहर ही रखने को कहा है। ऐसे में तो यह प्रस्ताव खारिज हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के के दायरे में लाया जाता है तो पेट्रोल 28 रुपए और डीजल 25 रुपए तक सस्ता हो जाएगा। इसके विपरीत राज्यों का राजस्व बढ़ाने का बड़ा जरिया भी इसके कर से मिलने वाला धन है। इसी कारण अधिकांश राज्य पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के पक्ष में नहीं हैं।

काउंसिल की इस बैठक में 48 से ज्यादा वस्तुओं पर टैक्स दरों की समीक्षा की जा जा रही है। इसमें 11 कोविड दवाओं पर टैक्स छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ाने का भी फैसला हो सकता है। लखनऊ में चल रही इस बैठक के ब्रेक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी वित्त मंत्री निर्मला सीतामरण से भेंट की और फिर गोरखपुर के लिए रवाना हो गए।

राज्यों को जीएसटी राजस्व में कमी की भरपाई के लिए समय सीमा बढ़ाने पर भी विचार हो सकता है। कोविड 19 के इलाज में काम आने वाली दवाओं पर छूट की अवधि को बढ़ाने का फैसला हो सकता है। जीएसटी की समस्त प्रक्रियाओं के लिए एकीकृत पोर्टल लांच करने के बारे में निर्णय हो सकता है। विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर जीएसटी की दरों की समीक्षा भी होगी।

जीएसटी काउंसिल की 45वीं बैठक देश में कोरोना महामारी के प्रकोप के बाद काउंसिल की पहली फिजिकल बैठक है। इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर विचार किया जा सकता है। इससे पिछली बैठक 12 जून को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई थी। इसमें कोविड-19 महामारी के खिलाफ जंग में अहम कई आइटम्स पर जीएसटी रेट्स में कटौती करने का फैसला किया गया था। शुक्रवार की बैठक में इस छूट को और 3 महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है। यह बैठक आम जनता के लिए भी कई मामले में महत्वपूर्ण है। काउंसिल की इस बैठक में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है, जिसका असर कारोबारियों से लेकर आम आदमी पर पड़ेगा।

बैठक में जोमैटो तथा स्विगी जैसे खाद्य डिलीवरी ऐप को रेस्टोरेंट के रूप में मानने और उनकी डिलीवरी पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगाने के प्रस्ताव पर भी विचार होगा। कमेटी के फिटमेंट पैनल ने काउंसिल से फूड डिलिवरी ऐप्स को कम से कम 5 परसेंट जीएसटी के दायरे में लाने की सिफारिश की है। काउंसिल के फिटमेंट पैनल ने सिफारिश की है कि फूड एग्रीगेटर को ई-कॉमर्स ऑपरेटर माना जाए। इसके साथ ही फार्मा सेक्टर से जुड़े कुछ ऐलान भी संभव हैं।

देश में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) व्यवस्था एक जुलाई, 2017 से लागू हुई थी। जीएसटी में केन्द्रीय कर के रूप में उत्पाद शुल्क और राज्यों के शुल्क में वैट को शामिल किया गया था। पेट्रोल, डीजल, एटीएफ, प्राकृतिक गैस तथा कच्चे तेल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया। इन सभी उत्पादों से केन्द्र और राज्य सरकारों को कर के रूप में बड़ा राजस्व मिलता है।

जीएसटी की दिक्कतें दूर करे काउंसिल

जीएसटी लागू हुए करीब चार वर्ष बीत चुके हैं फिर भी अभी तक जीएसटी पोर्टल ठीक से काम नहीं कर पा रहा है। तमाम दिक्कतें व्यापारियों के लिए आज भी चुनौतियां बनी हुई हैं। व्यापारियों ने जीएसटी काउंसिल को भेजे गए पत्र में उठाए गए बिंदुओं के निस्तारण की मांग की। लखनऊ व्यापार मंडल के वरिष्ठ महामंत्री अमरनाथ मिश्र ने कहा कि ट्रांसपोर्ट भाड़े पर क्रेता व्यापारी द्वारा स्वत: कर भुगतान कर आइटीसी क्लेम किया जाता है। यदि यही टैक्स ट्रांसपोर्टर के ऊपर छोड़ दिया जाए तो क्रेता व्यापारी को दोहरी इंट्री नहीं करनी पड़ेगी और करापवंचन से राहत मिलेगी। इनकम टैक्स की भांति ऑटो रिफंड होना चाहिए इससे व्यापारी की पूंजी नहीं फंसेगी। पूंजी से व्यापारी अपना कारोबार करेगा इससे सरकार के टैक्स में बढ़ोतरी होगी। उन्होंने कहा कि कम जानकारी के अभाव में वर्ष 2017-18 एवं 2018-19 में व्यापारियों से तमाम गलतियां हुई हैं। तब जीएसटीआर-2 ऑटो जेनरेट नहीं होता था। इसके कारण तमाम व्यापारियों से आइटीसी का दावा गलत हो गया। विभाग तीन वर्ष बाद अब नोटिस जारी कर 24 फीसद ब्याज के साथ अर्थ दंड लगा रहा है। उन्होंने मांग करते हुए कहा कि व्यापारी द्वारा जो अधिक आईटीसी क्लेम कर लिया गया है उसे जमा करा लिया जाए उस पर लगे ब्याज एवं अर्थदंड को माफ किया जाए।

इन पर भी गौर करें जिम्मेदार

भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के वरिष्ठ प्रदेश महामंत्री ज्ञानेश मिश्र ने कहा कि कोरोना काल की दूसरी लहर के दौरान संक्रमण से जुड़ी दवाओं, आक्सीजन व उपकरण, वैक्सीन को आयात शुल्क से मुक्त रखा जाय। तिलहन व तेल की बढ़ रही कीमतों को ध्यान में रखते हुए इससे जीएसटी में पांच प्रतिशत की श्रेणी से हटाकर गल्ला व दलहन की तरह शून्य श्रेणी में रखा जाय। तेल का आयात बढ़ाने के लिए आयात शुल्क पूर्णतया समाप्त किया जाय। 

Edited By: Dharmendra Pandey