लखनऊ, राज्य ब्यूरो। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी की फर्जी डिग्रियों के मामले में एसआइटी ने मुकदमा दर्ज कर लिया है। इस मामले में 16 लोगों को आरोपित बनाया गया है। फर्जी डिग्री के सहारे 75 जिलों के प्राथमिक विद्यालयों में 1130 शिक्षकों की नौकरी लग गई थी।

फर्जी डिग्रियों का मामला सामने आने पर प्रदेश सरकार ने इस मामले की जांच एसआइटी को सौंप दी थी। एसआइटी ने 2004 से 2014 के बीच प्राथमिक विद्यालयों में चयनित उन शिक्षकों की डिग्रियों व मार्कशीट का दोबारा सत्यापन कराया, जिन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से पास किया था। करीब छह हजार शिक्षकों के अभिलेखों की जांच में 1130 शिक्षकों की डिग्रियां फर्जी मिली हैं।

डिग्रियों के फर्जीवाड़े की एसआइटी जांच तो करीब दो साल पहले ही पूरी हो गई थी। एसआइटी ने रिपोर्ट शासन को सौंपकर एफआइआर दर्ज कराने के लिए अनुमति मांगी थी। एसआइटी की जांच में विश्वविद्यालय के 17 शिक्षक, अधिकारी व कर्मचारी दोषी पाए गए हैं। इनमें से एक आरोपित का निधन हो चुका है। ऐसे में एसआइटी ने अब 16 आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।

बता दें क‍ि वर्ष 2004 से 2014 तक बेसिक शिक्षा विभाग के परिषदीय विद्यालय में संस्कृत विश्वविद्यालय के डिग्रीधारक बड़े पैमाने पर अध्यापक पद पर चयनित हुए थे। वहीं विभिन्न जनपदों के डायटों द्वारा अंकपत्रों के सत्यापन रिपोर्ट दो तरह के रिपोर्ट भेज दी है। एक ही अनुक्रमांक के परीक्षार्थी को पहले फर्जी और बाद में प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण दर्शाया गया था। ऐसे कई प्रकारण उजागर होने के बाद भ्रम की स्थिति बन गई।

उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस मामले के आरोपी कर्मचारियों के प्राथमिकी भी दर्ज कराई थी। मिहिर मिश्र नामक एक कर्मचारी अब भी फरार है। दूसरी ओर शासन ने पूरे प्रकरण की जांच एसआइटी को सौंप दी थी। एसआइटी को जांच करने में तीन साल का समय लगा।

99 पेज की जांच रिपोर्ट में परीक्षा अभिलेखों में कटिंग व पन्ने बदले जाने के लिए वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के बीच तत्कालीन नौ कुलसचिवों, उप कुलसचिवोें, सहायक कुलसचिवों को पर अभिलेखों के रखरखाव पर सवाल उठाया गया था और उन्हें भी इसके लिए जिम्मेदार माना है। अब एसआइटी की ओर से मुकदमा दर्ज कराने के बाद विश्वविद्यालय में खलबली मची हुई है।

टीआर पर किसी भी अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं: विश्वविद्यालय के टेबुलेशन रजिस्ट्रर (टीआर) पर किसी भी अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं है। इसके चलते परीक्षा अभिलेखों में हेराफेरी भी हुई है। टीआर के पन्ने बदल दिए गए हैं। इसे देखते हुए विश्वविद्यालय की कार्य परिषद ही वर्ष 1985 से 2009 तक के परीक्षा अभिलेख संदिग्ध घोषित कर चुकी है।

1130 शिक्षकों की डिग्री फर्जी: एसआइटी की जांच में संस्कृत विश्वविद्यालय ने परिषदीय विद्यालयों में नियुक्त शिक्षकों के अंकपत्रों का सत्यापन दोबारा किया था। सूबे 69 जिलों में कुल 5797 शिक्षकों में 1130 शिक्षकों के प्रमाणपत्र फर्जी मिले हैं। वहीं 207 शिक्षकों के प्रमाणपत्रों को संदिग्ध दर्शाया गया है।

Edited By: Prabhapunj Mishra