लखनऊ [कुसुम भारती]। ढाई साल का आद्विक आजकल जब भी किसी नए व्यक्ति को देखता है, तो मां के आंचल के पीछे छिपने की कोशिश करने लगता है। यही हाल चार साल की मासूम टिया का भी है। वह तो घर में दूध वाले, अखबार वाले को देखते ही रोने लगती है। ये सिर्फ दो बच्चों की नहीं, बल्कि ऐसे तमाम मासूम बच्चों की कहानी है जो पिछले कई महीनों से कोरोना के डर से घरों में कैद हैं। दरअसल कोरोना संक्रमण की वजह से घरों में कैद एक से चार साल तक के बच्चे, जो बाहरी दुनिया से पूरी तरह अन्जान हैं, उम्र का यही वो फेज है जिसमें वे इससे रूबरू हो पाते। लेकिन संक्रमण की वजह से छोटे बच्चों को बाहर ले जाना खतरे से खाली नहीं। ऐसे में उनका मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है।

महीनों से उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति को नहीं देखा है। ऐसे में जब कोई अपरिचित उनके सामने आता है तो अचानक घबरा जाते हैं और रोने लगते हैं। बाहर न निकलने की वजह से ये बच्चे सोशल नहीं हो पा रहे। ऐसे में जब इनका समाज में पदार्पण होगा तो ये कैसे बिहेव करेंगे। कहीं ऐसा न हो कि कल ये गोमती नदी को देखकर ही हैरत में पड़ जाएं कि नदी ऐसी होती है? प्रकृति की नैसर्गिकता का ज्ञान इन्हें घर बैठे क्या सिर्फ टीवी, मोबाइल पर ही दिया जा सकेगा। यदि यह संक्रमण कुछ समय और इसी तरह जारी रहा तो इन बच्चों के मानस पर क्या प्रभाव पड़ेगा। बच्चों के सामने ऐसी समस्याएं न आएं इसके लिए घरों में माता-पिता भी नई-नई तरकीबें अपना रहें हैं। वहीं, विशेषज्ञ भी बच्चों को आने वाले कल के लिए तैयार करने की सलाह दे रहे हैं। कोरोना काल में सामने आ रहीं कुछ ऐसी ही समस्याओं के समाधान पर एक रिपोर्ट। 

वीडियो कॉल के जरिए दोस्तों-रिश्तदारों से बनाया कनेक्शन : 

मुरलीनगर निवासी मीनाक्षी अग्रवाल कहती हैं, मेरी बेटी नीया अभी ढाई साल की है। अब वह थोड़ा-बहुत लोगों को और चीजों के बारे में समझने लगी थी। मगर पिछ्ले पांच महीनों से घर में कैद होने के कारण थोड़ा बदलाव तो आया है। नए चेहरे देखकर घबरा जाती है। मगर मैंने इस दौरान उसको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से कनेक्ट कर्ने के लिए वीडियो कॉल का विकल्प अपनाया है। अब मैं अपने दोस्तों, मायके और ससुराल वालों से सिर्फ वीडियो कॉल पर बात करती हूं तो उसको भी सामने बैठाती हूं ताकि बेटी सभी को पहचानने लगे और जब उसको मैं रूबरू मिलवाऊं तो वह उनसे डरने के बजाय फ्रेंडली रहे। हालांकि, बेटी बहुत एक्टिव है। मैं यूट्यूब पर नेचर से जुड़ी चीजों को दिखाकर ऑनलाइन पढ़ाती भी हूं।

मां के साथ एक टीचर हूं इसलिए भी ज्यादा दे रही ध्यान :

एक निजी स्कूल में टीचर नेहा कहती हैं, टीचर होने के साथ दो साल के बेटे की मां भी हूं इसलिए जानती हूं कि बच्चों के फाइव सेंस का डेवलपमेंट  भी एक से पांच साल के दौरान बहुत तेजी से होता है इसलिए मैं उसको कई तरह की एक्टिविटी कराती रहती हूं। उसका एडमीशन प्रेप में कराया था मगर कोरोना के चलते  स्कूल नहीं जा सका। कोरोना संक्रमण का असर बच्चों पर भी दिख रहा है, मेरा बेटा आजकल वह बहुत जल्दी हाइपर हो जाता है क्योंकि उसका एनर्जी लेवल पूरी तरह यूज नहीं हो पाता है। जबकि पहले ऐसा नहीं था। इसीलिए उसको हमेशा किसी न किसी एक्टिविटी में व्यस्त रखने का प्रयास करती रहती हूं। 

प्ले ग्रुप में एडमीशन कराया पर स्कूल न जा सका :

यहियागंज निवासी सुरुचि बाजपेयी कहती हैं, कोरोना काल शुरू होने से पहले बेटे का नाम प्ले ग्रुप में लिखाया था, मगर लॉक डाउन होने के बाद उसको स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिल सका। ऐसे में अपने बेटे अक्षय को खुद ही घर पर पढ़ाती हूं। थोड़ा चिड़चिड़ा तो हो गया है, मगर कोशिश यही करती हूं कि उसको ज्यादा से ज्यादा समय दे सकूं और खुश रख सकूं। घर में हर छोटी से छोटी बात सिखाती हूं। नेचर से जुड़ी चीजों की जानकारी भी देती रहती हूं।

घर पर पढ़ाई के साथ एक्टिविटी भी : 

हैदरगंज निवासी स्वतंत्र बाजपेयी कहते हैं, बेटे वशिष्ठ का प्ले ग्रुप में सीएमएस में एडमीशन कराया था लेकिन उसके 15 दिन बाद ही लॉक डाउन हो गया। जिसके चलते बेटा स्कूल जा ही नहीं सका। ऐसे में न सिर्फ उसको घर में पढ़ाता हूं बल्कि उसकी फिजिकल व मेंटल ग्रोथ के लिए कई तरह की एक्टिविटी भी कराता हूं। स्कूल की ओर से चल रही ऑनलाइन पढ़ाई में भी मदद करता हूं। इंटरनेट पर समाज से जुड़ी चीजों की जानकारी भी देता रहता हूं ताकि आने वाले समय के लिए तैयार हो सके।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट:

कोरोना संकट काल में बच्चों के इम्यून का भी रखें खास ख्याल :

केजीएमयू में वरिष्ठ आहार एवं पोषण विशेषज्ञ डॉ. सुनीता सक्सेना कहती हैं, इस वक्त बढ़ते कोरोना वायरस के कारण लोगों की लाइफस्टाइल में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। वहीं, दूसरी तरफ छोटे बच्चों के लिए कोरोना काल में संक्रमण का खतरा भी ज्यादा है क्योंकि छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम काफी कमजोर होता है। ऐसे में, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने के कारण कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के साथ ही उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने के लिए बच्चों को विटामिन—सी युक्त फल और सब्जियों का सेवन अधिक से अधिक करवाएं। खासकर छोटे बच्चों के आहार में रंग-बिरंगे फल व सब्जियों को शामिल करें। ज्यादा से ज्यादा सीट्रस फ्रूट दें ताकि उनका इम्यून सिस्टम मजबूत हो सके। 

गैजेट से दूरकर नेचर से कराएं दोस्ती : 

केजीएमयू में चाइल्ड साइकियाट्रिक डिपार्टमेंट में एडिशनल प्रोफेसर व मनोचिकित्सक डॉ. अमित आर्या कहते हैं, आजकल वर्क फ्रॉम होम के चलते घर में बड़ों को सारा दिन लैपटॉप और मोबाइल पर काम करते देख छोटे बच्चे भी मोबाइल के प्रति आकर्षित होने लगे हैं। वहीं, बच्चे डिस्टर्ब न करें इसलिए माता-पिता भी बच्चों को गैजेट पकड़ा देते हैं जोकि उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। बच्चे इस समय मोबाइल, टीवी या लैपटॉप आदि का इस्तेमाल अधिक कर रहें है। इसलिए बच्चों को इन गैजेट से दूर रखें और उनके लिए आप स्वयं समय निकालें। माता-पिता घर में बने लॉन, गार्डन या गमलों में लगे पेड़-पौधों से बच्चों की दोस्ती कराएं। उनको गमले लगे फूलों की जानकारी दें। साथ ही इंटरनेट पर अपने शहर की ऐतिहासिक तस्वीरों, नदी आदि को दिखाते रहें ताकि जब कोरोना काल खत्म हो और उनका सामना अपने शहर से हो तो वह खुद को इससे जुड़ा हुआ महसूस करें।

परिवार का वातावरण अच्छा रखें : 

बलरामपुर अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अभय सिंह कहते हैं,  किसी भी चीज की ग्रूमिंग के लिए परिवार का वातावरण बहुत मायने रखता है। वहीं, बढ़ते कोरोना संक्रमण को देखते हुए माता-पिता को फिलहाल अब अपने बच्चों को ज्यादा समय देना पड़ेगा। ऐसे में घर का माहौल बेहतर व अच्छा होना चाहिए। अब चूंकि ऐसा फेज चल रहा है इसलिए कुछ महीनों तक बच्चों को घर में ही रहना है इसलिए बच्चों के एकेडमिक ज्ञान पर भी माता-पिता को ही ध्यान होगा। भले ऑनलाइन पढ़ाई का जमाना है, मगर बच्चों की दोस्ती किताबों से भी कराएं ताकि किताबों के प्रति उनकी रुचि बढ़े। कहानियों की किताब से उनको अच्छी-अच्छी प्रेरक कथाएं पढ़कर सुनाएं। जब वे आपको हाथ में किताब लेकर पढ़ते देखेंगे तो उनके भीतर भी किताबों के लिए प्रेम पैदा होगा। एक से चार-पांच साल के बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं इसलिए आप जैसे उनको ढालेंगे वे ढल जाएंगे।

बच्चों के साथ इनडोर गेम्स खेलें :

नवयुग गर्ल्स पीजी कॉलेज में प्रिंसिपल व मनोवैज्ञानिक डॉ. सृष्टि श्रीवास्तव कहती हैं, माता-पिता बच्चों के साथ कैरम बोर्ड, लूडो, शतरंज जैसे कई प्रकार के इनडोर गेम्स का मजा ले सकते हैं। भले ही छोटे बच्चों को उतनी जानकारी नहीं होगी मगर आप इस समय को अपने बच्चों के साथ बिताएं और उनको मानसिक रूप से खुश रखें।

 

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