लखनऊ, जेएनएन। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड प्रबंधन के उत्तर प्रदेश स्टेट पावर सेक्टर इम्प्लाइज ट्रस्ट में जमा करोड़ों रुपये के असुरक्षित निवेश के मामले मेें उर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने अखिलेश यादव सरकार को दोषी माना है। ऊर्जा मंत्री ने मीडिया से कहा कि हम इस बड़े घोटाले की जांच करा रहे हैं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीबीआई जांच की संस्तुति भी कर दी है।

ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने बिजली विभाग के भविष्य निधि घोटाले का ठीकरा अखिलेश यादव सरकार पर फोड़ा है। उन्होंने कहा कि फाइनेंस कंपनियों में निवेश का निर्णय एक दिन में नहीं लिया गया था। इसकी नींव तो वर्ष 2014 में ही पड़ गई थी। 21 अप्रैल 2014 को हुई पावर कारपोरेशन ट्रस्ट बोर्ड की बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि बैंक से इतर अधिक ब्याज देने वाली संस्थाओं में भी निवेश किया जा सकता है। श्रीकांत शर्मा ने कहा कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपनी भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की नीति के तहत एक बार फिर इस मामले में बड़ी कार्रवाई की है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने रविवार को ऊर्जा विभाग में 45000 कर्मचारियों के 2268 करोड़ रुपये के पीएफ घोटाला मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की सिफारिश की है। इस प्रकरण पर सीबीआई जांच कराने का पत्र केंद्र सरकार को भेज दिया है, साथ ही पूरे मामले की जांच डीजी ईओडब्ल्यू करेंगे।

अन्य आला अधिकारियों के खिलाफ भी जल्द कड़ी कार्रवाई 

विभिन्न विद्युत कर्मचारी संगठन के लोग इस मामले मेें सीएम योगी आदित्यनाथ से सीबीआई से जांच कराने की मांग कर रहे थे। इसके साथ ही सरकार ने डीएचएलएफ में फंसे पावर कारपोरेशन के कर्मियों के करीब 1600 करोड़ रुपये को निकालने के लिए भी अपने स्तर से हर संभव प्रयास शुरू कर दिए हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ और उर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के निर्देश पर इस पूरे मामले की जांच नए सिरे से शुरू कर दी गई है। इसमें दोषी मिलने पर पावर कारपोरेशन के अन्य आला अधिकारियों के खिलाफ भी जल्द कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

गुमनाम शिकायत को भी गंभीरता से लिया 

10 जुलाई 2019 को इस प्रकरण में एक गुमनाम शिकायत अध्यक्ष पॉवर कारपोरेशन को प्राप्त हुई थी। हमने गुमनाम शिकायत को भी गंभीरता से लिया और जांच शुरू करा दी। 12 जुलाई 2019 को प्रकरण में निदेशक वित्त की अध्यक्षता में जांच के आदेश दिये गए। इसके बाद जांच समिति ने 29 अगस्त 2019 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। जांच रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई कि गंभीर वित्तीय अनियमितता की गई है। जिसमें भारत सरकार के निवेश नियमों का भी सीधे तौर पर उल्लंघन किया गया। ऊर्जा मंत्री ने बताया कि इसके एक अक्टूबर 2019 को मामले की विस्तृत जांच के लिए पॉवर कारपोरेशन की सतर्कता विंग को निर्देशित किया गया। 10 अक्टूबर 2019 को ट्रस्ट के तत्कालीन सचिव पीके गुप्ता को निलंबित कर विभागीय जांच के निर्देश दिये गए। विजिलेंस विंग की संस्तुति के आधार पर इस गंभीर प्रकरण में आपराधिक मामला दर्ज कराने का भी निर्णय लिया गया।

दोनों आरोपी गिरफ्तार

दो नवंबर 2019 को मामले में हजरतगंज कोतवाली में सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। उन्होंने कहा कि विषय की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर प्रकरण की सीबीआई जांच कराने की मांग की। जिस पर उन्होंने इसकी संस्तुति करते हुए तब तक महानिदेशक आर्थिक अपराध शाखा को जांच करने के निर्देश दिए। श्रीकांत शर्मा ने बताया कि इस मामले में दोनों आरोपियों पूर्व निदेशक वित्त सुधांशु द्विवेदी व निलंबित महाप्रबंधक पीके गुप्ता को पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया है। इसके साथ ही अब इस गंभीर मामले में अन्य जो भी अधिकारी दोषी होंगे सरकार उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही करेगी। इसी कारण प्रकरण को सीबीआई जांच में लिए संस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने पहले ही स्पष्ट किया है कि मामले में किसी भी कर्मचारी का अहित नहीं होगा। पावर कारपोरेशन सभी देयों का भुगतान सुनिश्चित करेगा। उसमें किसी भी प्रकार का कोई विलंब नहीं किया जाएगा। सभी कार्मिक मेरे परिवार का अभिन्न अंग हैं।

अखिलेश सरकार में किया गया था निवेश का फैसला

उत्तर प्रदेश स्टेट पावर सेक्टर एंप्लॉइज ट्रस्ट में जमा यूपीपीसीएल कर्मियों के पीएफ का 1600 करोड़ रुपये निजी कंपनी डीएचएफसीएल में निवेश किए जाने से फंस गया है। पावर कारपोरेशन कर्मियों के पीएफ का पैसा केंद्र सरकार की गाईडलाइन को दरकिनार कर निजी कंपनी में निवेश करने का फैसला अखिलेश सरकार में किया गया था। यह फैसला 21 अप्रैल 2014 को हुई उत्तर प्रदेश स्टेट पावर सेक्टर एंप्लॉइज ट्रस्ट के बोर्ड आफ ट्रस्टीज की बैठक में किया गया था। इसके चलते मार्च 2017 से दिसंबर 2018 तक कर्मियों के पीएफ के 2631.20 करोड़ रुपये डीएचएफसीएल में जमा किए गए। इस दौरान एक हजार करोड़ रुपये तो वापस मिल गए, लेकिन इसी बीच मुम्बई हाईकोर्ट ने डीएचएफएल के सभी भुगतान पर रोक लगा दी। जिससे पावर कारपोरेशन कर्मियों के पीएफ के करीब 1600 करोड़ रुपये फंस जाने से खलबली मच गई। बोर्ड के इसी फैसले को आधार बनाकर हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों में निवेश की प्रक्रिया 2016 में प्रारम्भ की गई। दीवान हाउसिंग फाइनेंस कंपनी लिमिटेड (डीएचएफसीएल) में निवेश 17 मार्च 2017 से प्रारंभ किया गया। तब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे। जेले भेजे गए प्रवीण कुमार गुप्ता दक्षिणांचल विद्युत वितरण लिमिटेड आगरा के महाप्रबंधक (लेखा एवं संप्रेक्षा) पद पर तैनात थे। प्रवीण उत्तर प्रदेश स्टेट पावर सेक्टर इम्प्लाइज ट्रस्ट में जमा रकम को असुरक्षित लेनदारों की श्रेणी में आने वाली दीवान हाउसिंग फाइनेंस कारपोरेशन लिमिटेड (डीएचएफसीएल) में निवेश करने के प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए थे। उधर अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने बताया कि बिजली विभाग में भविष्य निधि घोटाले की सीबीआई जांच का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज दिया गया है। 

बिजली क्षेत्र में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने को UP सरकार गंभीर

उत्तर प्रदेश सरकार बिजली क्षेत्र में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने को लेकर गंभीर है और यही वजह है कि राज्य सरकार पिछले लगभग छह साल के दौरान विभाग में हुए सभी कार्यों और परियोजनाओं का आडिट करा रही है। ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने कहा कि 2014 से 2019 के बीच बिजली विभाग के अंतर्गत हुए कार्यों का आडिट कराने के पीछे उद्देश्य यह पता लगाना है कि परियोजना के क्रियान्वयन में किसी प्रकार की गड़बड़ी या भ्रष्टाचार तो नहीं हुआ है। हम बिजली विभाग के अंतर्गत वाराणसी, आगरा, मेरठ और लखनऊ समेत अन्य जगहों पर 2014 से 2019 के बीच हुए सभी कार्यों का तीसरे पक्ष (स्वतंत्र एजेंसी से) आडिट करा रहे हैं।

Posted By: Dharmendra Pandey

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