लखनऊ [रूमा सिन्हा]। क्या आप भी दूध के खाली पैकेटों को कूड़े में डाल देते हैं, लेकिन आगे ऐसा नहीं होगा। दूध उत्पादक इस पर विचार कर रहे हैं कि लाखों की संख्या में हर रोज खाली पैकेटों को उपभोक्ताओं से कैसे वापस एकत्र किया जाए जिससे यह कूड़े का बोझ न बढ़ाएं।

पॉलीथीन कचरे के निस्तारण पर गंभीर पर्यावरण मंत्रलय ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के अंतर्गत एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर्स रिसपॉंसिबिलिटी (इपीआर) को सख्ती से लागू करने का फैसला लिया है। इसके तहत कचरा उत्पादकों को ही उनके उत्पाद से निकलने वाले कचरे का निस्तारण करना होगा। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चंद रोज पूर्व आयोजित कार्यक्रम में साफ कर दिया कि उत्पादक अपने वेस्ट का निस्तारण कैसे करेंगे, इसके लिए एक माह में एक्शन प्लान बोर्ड को सौंपे।

देखा गया है कि हर रोज शहर में लाखों की संख्या में निकलने वाले दूध के खाली पैकेट प्लास्टिक कचरे का बोझ बढ़ाते हैं। यह समस्या केवल राजधानी की ही नहीं है। सभी राज्य इससे जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार ने तो दूध के पैकेट पर 50 पैसे सरचार्ज लगाने का फैसला किया है। यह 50 पैसे उपभोक्ता से डिपॉजिट के रूप में लिए जाएंगे जिसका रिफंड खाली पैकेट देने पर कर दिया जाएगा।

क्‍या कहते हैं जिम्‍मेदार 

 उप्र.प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव आशीष तिवारी ने बताया कि 

केवल दूध उत्पादक ही नहीं बल्कि सभी ऐसे उद्योगों को जिनसे प्लास्टिक वेस्ट जेनरेट होता अपने वेस्ट का सौ फीसद निस्तारण सुनिश्चित करना है। उद्योगों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। इस संबंध में एक कार्यशाला भी आयोजित की जा चुकी है। अब उन्हें इसका अनुपालन सुनिश्चित करना है। यदि नहीं करेंगे तो पर्यावरणीय हर्जाना वसूला जाएगा और रकम स्थानीय निकाय को दे दी जाएगी जिससे वह उनके उत्पाद द्वारा होने वाले कचरे का निस्तारण सुनिश्चित कर सकें।

पहले भी थी स्कीम

पराग के महाप्रबंधक एचएस वर्मा बताते हैं कि वर्ष1995 के आसपास पराग ने खाली पैकेटों के बदले मक्खन या अन्य चीजें देने की स्कीम चलाई थी। मकसद था कि हर रोज बाजार में हजारों की संख्या में पहुंचने वाले खाली दूध के पैकेट घरेलू कूड़े में न डाले जाएं। उन्होंने कहा कि जल्द ही एक बार फिर बाजार में पहुंचने वाले 60-65 हजार दूध के पैकेटों को निस्तारण के लिए कदम उठाए जाएंगे। अमूल व ज्ञान दूध के लगभग साढ़े चार लाख पैकेट बाजार पहुंचते हैं। जाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में खाली पैकेट फिलहाल घरेलू कचरे में पहुंचकर उसकी तादाद बढ़ा रहे हैं। यही नहीं, मट्ठा, फ्लेवर्ड मिल्क आदि के पैकेटों की भी जबर्दस्त खपत होती है। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि केवल मिल्क प्रोडक्ट से ही कितना प्लास्टिक कूड़ा जेनरेट हो रहा है। साफ है कि यदि इस पर अंकुश लगा लिया गया तो पर्यावरण को बड़ी राहत मिलेगी

 

Posted By: Anurag Gupta

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