लखनऊ, जेएनएन। सीतापुर निवासी मनोज कुमार सात मई को दुर्घटना का शिकार हो गए थे। दायीं तरफ उनके ऑर्बिट फ्लोर में फ्रैक्चर हो गया। ऐसे में आई बॉल नीचे खिसक गई। लिहाजा, आंख का प्रतिबिंब गड़बड़ा गया। एक वस्तु उन्हें डबल दिखने लगी। निजी अस्पतालों में दिखाया। यहां इंप्लांट डालकर हड्डी जोडऩे का हवाला दिया गया। 

आर्थिक रूप से कमजोर मनोज ने सितंबर में केजीएमयू के ओरल एंड मैक्सिलो फेशियल सर्जरी विभाग में दिखाया। यहां दंत संकाय के डीन डॉ. शादाब मोहम्मद ने 16 सितंबर को ऑपरेशन का फैसला किया। 

कर्व कार्टिलेज की फिक्स

डॉ. शादाब के मुताबिक, सबसे पहले आंख के नीचे चीरा लगाया गया।  क्षतिग्रस्त मांसपेशियों की रिपेयङ्क्षरग की व खराब मांसपेशियों को हटाया। इसके बाद कान के पीछे चीरा लगाया। यहां से कार्टिलेज (ऊतकों का समूह) निकाला। कर्व के आकार का बनाकर उसे ऑर्बिट फ्लोर पर फिक्स कर दिया। इससे सपोर्ट मिलने से खिसकी आई बॉल अपने स्थान पर आ गई। वहीं हड्डी को भी कार्टिलेज से सपोर्ट मिल गया। वह खुद-ब-खुद कुछ दिनों में मजबूत हो जाएगी।

पहली सर्जरी का दावा

डॉ. शाबाद ने कहा कि यह 'ऑर्बिट फ्लोर रीकंस्ट्रक्शन बाय इअर कार्टिलेज' तकनीक सर्जरी पहली बार संस्थान में हुई है। साथ ही उत्तर भारत में सुविधा उपलब्ध कराने वाला पहला सेंटर है। इसमें इंप्लांट का प्रयोग नहीं किया गया। यह इंप्लांट ही सिर्फ 25 हजार का आता है। वहीं सर्जरी का शुल्क अलग होता है। ऑपरेशन टीम में डॉ. विभा, डॉ. रुबिन, डॉ. जयकिशन, डॉ. संतोष, डॉ. स्नेहा, डॉ. हरीश शामिल रहे।

 

Posted By: Divyansh Rastogi

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