लखनऊ, [जितेंद्र उपाध्याय]। समय के साथ खुद को तैयार कर चलने वाला हर रेस में आगे बढ़ता है। माता-पिता संतान की दिव्यांगता को लेकर परेशान रहते हैं, उनके लिए यह खबर उत्साह देने वाली है। मूकबधिर युवतियां कंधे से कंधा मिलाकर सामान्य लोगों के साथ काम कर अपनी पहचान बना रही हैं। जो माता-पिता उन्हें बोझ समझते थे वे अब उनकी दास्तां बताने में गर्व महसूस करते हैं।

भगवान ने हर बच्चे को अलग काबलियत से नवाजा है। बस जरूरत है उस काबलियत को निखारने की। अगर समाज का सही साथ मिले तो मूक-बधिर भी आसमान छू सकते हैं। सीतापुर रोड के त्रिवेणी नगर की रहने वाली जूफिया का इशारों में यह कहना भले ही आम लोगों के समझ से परे हो, लेकिन अपने जैसे लोगों को प्रेरित जरूर करता है। जूफिया अब एक मल्टीनेशन कंपनी में सेल्स विभाग में काम करती हैं। 

अकेली जूफिया ही नहीं अलीगंज की रागिनी भी एक शापिंग माल में सामान्य लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर न केवल काम कर रही हैं बल्कि परिवार भी चला रही हैं। दिव्यांगों को निश्शुल्क प्रशिक्षण देने वाले सौभाग्य फाउंडेशन के अमित मेहरोत्रा ने बताया कि ऐसे लोगो में सीखने की प्रवृत्ति सामान्य लोगों से कई गुना ज्यादा होती है। रागिनी के साथ ही बुशरा तो मल्टी टैलेंटेड है। वह एक मल्टीनेशन कंपनी में सेल्स एसोसिएट के तौर पर काम कर रही है। तीन युवतियां ही नहीं ऐसी 300 से अधिक दिव्यांग युवा युवतियां कंपनियों में काम करके समाज को एक नई दिशा दे रही हैं। 

इसलिए मनाया जाता है दिवसः जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी केेके वर्मा ने बताया कि मूक बधिरों को सामाजिक, आर्थिक और समानता का अधिकार दिलाने के लिए 26 सितंबर को हर साल विश्व मूक बधिर दिवस मनाया जाता है। विश्व बधिर संघ (डब्ल्यूएफडी) ने वर्ष 1958 से विश्व मूक-बधिर दिवस की शुरुआत की थी। विभागीय योजनाएं मूक बधिरों को समाज की मुख्यधारा में लाने का काम करती हैं। दिव्यांगों को 500 रुपये महीने की पेंशन व मूक बधिर बच्चों का निश्शुल्क आपरेशन भी कराया जाता है।

Edited By: Vikas Mishra

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