लखनऊ, जेएनएन। Dainik Jagran Samvadi 2019 Lucknow : संवादी... यानि साहित्य, रंगमंच, लोककला, नृत्य, गायन और वादन के दिग्गजों से साहित्य, राजनीति, संगीत, खान-पान, सिनेमा, धर्म और देशभक्ति समेत कई मुद्दों पर खुलकर एक मंच पर चर्चा। तीन दिन, बीस सत्र और संवाद की अथाह संभावनाओं के साथ संवादी आपके साथ है। अभिव्यक्ति के उत्सव ने दो दिन का सफर पूरा कर लिया। विचारों के टकराव, तालियों की गूंज और आक्रोश के सुर आपस में भरपूर संवाद करते दिखे। दर्शकदीर्घा ने जितनी शिद्दत से संवाद किया, उतने ही संतुष्टिपरक निष्कर्ष मंच से मिले। अगर आप अब तक इस साहित्यिक उत्सव का हिस्सा नहीं बन सके तो पूरा रविवार आपके पास है।  रविवार को संवाद के सात रंग आपको भिगोने के लिए तैयार हैं। आइए और संवाद कीजिए...

पहला सत्र - स्त्री साहित्य का संघर्ष 

वक्‍ता - मृदुला सिन्हा, वर्तिका नंदा, रजनी गुप्त

साहित्यकार महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी संघर्ष करते हैं

पहले सत्र स्त्री साहित्य का संघर्ष पर गोवा की राज्यपाल रहीं  मृदुला सिन्हा ने कहा कि साहित्यकार महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी संघर्ष करते हैं। जो साहित्य समाज को बदलता है, जो यथार्थ से निकलता है। कस्बे और महानगर में कोई फर्क़ नहीं होता है। वहीं, हिंदी साहित्य में कहानी एवं उपन्यास विधा में पहचान बना चुकी रजनी गुप्त ने भारतीय जेलों में महिलाओं के जीवन को लेकर कहा कि वहां स्त्री को मनुष्य ना समझने की पीड़ा दिखती है। कई अपराध ऐसे होते हैं जो दिखते हैं, कुछ अज्ञानता वश भी जेल में है। औरत पैदा नहीं होतीं है, वो बना दी जाती है। स्वतंत्रता, आत्म निर्णय, निजता ज़रुरी है। मेरे उपन्यास यथार्थ हैं, हमारे परिवारों में लोकतंत्र नहीं है। आत्म चेतना से सम्पन्न होते हैं, तभी आप न्याय के लिये लड़ सकते हैं। 

आपके पास जब कुछ भी ना हो तब भी आप खुश रहें, वो साहित्य है

स्त्री की स्वतंत्रा और स्वछन्दता में बदलाव को लेकर मृदुला ने कहा कि जिसे हम संघर्ष कहते है, कोई भी रचना बनाने में खुशी होती है। मेरे घर में एक बाल विधवा हमेशा हस्तीं रहती थी। गांव में उसका पूरा घर बह गया था, वो बांस के खंबे के पास हुक्का पी रही थी, वो मुझसे लिपट कर हंस रही थी। आवाक रह गई, मैं सोचने पर मजबूर हो गयी की वो अब क्‍यों खुश थी। फिर मैंने सोचा कि वो गोबर से लिपी दीवार को देखकर खुश हो रही थी। वो उसकी रचना थी, जिसमें वो खुश थी। आपके पास जब कुछ भी ना हो तब भी आप खुश रहें वो साहित्य है। जैसा दुख राजा के घर में हो, वैसा दुख किसी के पास ना आए। महिलाएं आनन्द देने वाला साहित्य दे रही हैं। महिलाएं अपना आनन्द खुद ढूंढ लेती हैं। साहित्य के माध्यम से हमें चेतना मिलती है। इस दौरान 'तिनका तिनका दासना' वर्तिका जी की पुस्तक का विमोचन हुआ। 

जानें वक्‍ताओं के बारे में 

  • मृदुला सिन्हा : गोवा की राज्यपाल रहीं एवं भाजपा की केंद्रीय कार्यसमिति की सदस्य। हिंदी साहित्य लेखन में सुविख्यात हैं। 
  • वर्तिका नंदा : पत्रकारिता, शोध एवं कविता के लिए पहचानी जाती हैं। मधुर दस्तक, थी, हूं...रहूंगी, रानियां सब जानती हैं प्रमुख कविता संग्रह है। 
  • रजनी गुप्त : हिंदी साहित्य में कहानी एवं उपन्यास विधा में पहचान है। एक नई सुबह, हाट बाजार जैसी कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। 

दूसरा सत्र- लखनऊ विश्वविद्यालय के सौ साल 

वक्‍ता - जस्टिस हैदर अब्बास रजा, प्रोफेसर भूमित्रिदेव, प्रोफेसर एसपी सिंह 

दूसरे सत्र 'लखनऊ विश्वविद्यालय के सौ साल' पर लखनऊ विश्वविद्यालय के समय के बदलाव पर प्रो. एसपी सिंह ने कहा कि जो जमाना कल था, वो आज भी है और हमेशा रहेगा। 100 वें साल में भी लोग ऐसे ही बोलते हैं, बदलाव कब होता है, हमें पता भी नहीं चलेगा। संस्थाएं जितनी पुरानी होती जाती है, क्‍योंकि वो एक थंडे पानी कि तरह ही हैं। बाहर वाला ही बता पाता है।

यूनिवर्सिटी में 1953 में हुआ सबसे बड़ा आंदोलन

जस्टिस हैदर अब्बास रजा ने कहा कि बटलर साहब, हबीबुल्लाह साहब, बीरबल साहनी, दीनदयाल उपाध्याय जी जैसे तमाम लोग लखनऊ के पढ़े हुए थे, इनमें से कुछ तो यहीं टीचर भी बनें। लखनऊ यूनिवर्सिटी में 1953 में सबसे बड़ा आन्दोलन हुआ। उस जमाने में मैं केकेसी में पढ़ता था, उस वक्त यहां स्टूडेंट यूनियन को खत्म कर दिया गया था। 1942 हो या 1953 में कई ऐसे मामले, आन्दोलन हुए मगर कभी इसके भीतर पुलिस दाखिल नहीं हुई। 

अपनो को खुश करने के लिये नीतियां बनाई गयी

विखंडन कहां से शुरु हुआ, कब सिखेंगे ये बात की परिपाटी मज़बूत करने की ज़रुरत है? इसपर एसपी सिंह ने कहा कि परिवर्तन के लिये जाना जाता हूं। एक ऐसा स्थाई सिस्टम हो, जो मॉनिटर कर रहा हो। वीसी के जाते ही तुरंत सिरे से निर्णय वापस ले लिये जाते है। सुविधा देने के लिये, अपनो को खुश करने के लिये नीतियां बनाई गयी, अपने लिये नीतियां बनाई गयी।

विश्वद्यालयों में तालमेल कम, तोलमोल ज्यादा 

वहीं, प्रोफेसर भूमित्रिदेव ने कहा कि जो तबाही हुई नालंदा में 12 वीं सदी में जाक स्लो वत्स ने देखा, 90 साल का शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहा था, बीएचयू में मैं चोथा वीसी था। कुछ वीसी भगवान बन गए हैं। वो सिर्फ भक्तों की सेवा करने में लगे रहते हैं। बच्चों में कमियां कम होती हैं। विश्वद्यालयों में तालमेल कम है। तोलमोल ज्यादा है। 

आज 15 रेपिस्ट राज्य सभा के मेंबर, ऐसा कल्‍चर नेताओं ने बनाया

चुनाव को पिछ्ले जमाने के चुनावों से अंतर बताते हुए जस्टिस हैदर अब्बास रजा ने कहा कि यूनिवर्सिटी में जब तक एग्जीक्यूटिव कम्‍युनिटी थी, तब तक उसकी मॉलर अथॉरिटी बहुत अच्छी थी। जब से बाहर के वीसी आने लगे, ऐसे लोग वीसी बनाए जा रहे हैं, जो कभी यूनिवर्सिटी गये ही नहीं। छात्र उनकी इज्‍जत क्‍यों करेगा। जो टॉपर नहीं होता है, वो इलेक्‍शन में भाग नहीं लेता था। एनएम शर्मा, शंकर दयाल शर्मा, एसएन जाफर जैसे एलीमेंट लोग चुनाव लड़ते थे। आज 15 रेपिस्ट लोकसभा और राज्यसभा में सदस्य हैं। गुंडे और बदमाश असेम्बली में पहुंच रहे हैं। उन्हीं की देन है कि आज विश्वद्यालयों में बच्चे पढ़ाई में कम अन्य गतिविधियों में ज्यादा भाग लेता है। आज वीसी कभी क्लास में पढ़ाते नहीं हैं। 

जानें वक्‍ताओं के बारे में 

  • जस्टिस हैदर अब्बास रजा :इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ से न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हैं। प्रदेश के लोकायुक्त भी रहे। 
  • प्रो. एसपी सिंह : हाल ही में लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। 

तीसरा सत्र - हिंदी पर बेस्टसेलर का प्रभाव

वक्‍ता - प्रभात रंजन, भगतवंत अनमोल, गौतम राजऋषि नवीन चौधरी, संचालक - तरुण गोस्वामी

बेस्टसेलर ने नए ही नहीं पुराने लेखकों को दी नई पहचान 

तीसरे सत्र 'हिंदी पर बेस्टसेलर का प्रभाव' पर बेस्‍टसेलर के आने के बाद नए लेखकों के लिए खुले रास्‍ते सवाल पर हिंदी साहित्यकार प्रभात रंजन ने कहा कि बेस्टसेलर ने नए ही नहीं पुराने लेखकों को नई पहचान दी है। मैं लेखक हूं, दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाता हूं, लेकिन अब नई पीढ़ी के युवा आदर्श के रूप में देख रहे हैं, जो अभी पैन लेखक हैं। भगवंत अनमोल ने कहा कि मैं कही भी बुलाया जाता हूं, इसलिये की मैं बेस्टसेलर लिस्ट में शामिल हूं। एक युवा लेखक के रुप में, बेस्टसेलर संजीवनी के रुप में काम आती है। बुक स्टॉल में खरीदने आने वाले सिर्फ दोस्ती यारी में, सोशल मीडिया में आने की वजह है। 

हिन्दी पट्टी में लेखकों को अलग पहचान मिली है

बेस्टसेलर लिस्ट में आने के बाद दबाव कितना आता है? सदाबहार लेखक गौतम राजऋषि ने जवाब देते हुए कहा कि बेस्टसेलर की लिस्ट ने युवा लेखक और वरिष्ठ लेखक दोनों में प्रेशर डाला है। युवा लेखक तो इस लिस्ट में आना ही चाहता है, साथ में वरिष्ठ लेखक भी इस लिस्ट में आना चाहता है। जब तक आप अपनी चीजों को खुद नहीं लाएंगे तब तक दिक्कतें आएंगी। पहले लुगदी साहित्य होता था, अब बेस्टसेलर होता है। जो लोग प्रचार करते है, उन्हे बुरा कहा जाता है। लेकिन आपको अपना प्रचार करना पड़ता है। भगवंत अनमोल ने कहा कि लेखक अपने जोनर में लिखता है। जब लेखक लिख रहा होता है, तब उसपर कोई प्रेशर नहीं होता है। लेकिन जब मार्केटिंग करनी होती है, तब दिक्कतें आती हैं। कोई भी प्रकाशक नहीं चाहता कि वो नए लेखक की किताब को पांच सौ पेज का छापे। वहीं, प्रभात रंजन ने कहा कि बेस्टसेलर ने एक पैमाना दिया है। हिन्दी पट्टी में लेखकों को अलग पहचान मिली है। लेखकों को पाठकों तक पहुंचने का रास्ता मिला है।

रीडर बेस को समझे

प्रचार करना कितना जरूरी है ? इसपर नवीन चौधरी ने कहा कि 55 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया पर सुन्ने के बाद ही आते हैं। बेशर्मी की हद तक प्रचार मुझे समझ नहीं आता है, डिस्ट्रीब्यूशन का पूरा मॉडल ध्‍वस्‍त हो गया है, हिंदी को दिक्कत आ रही है। छोटी जगह बुक्‍स मिलना मुश्किल हो गया है। लेखकों पर बेस्टसेलर ही लिखने के दबाव पर बोले नवीन चौधरी ने कहा कि ऐसा नहीं है, कंज्यूमर बिहेवियर पर भी निर्भर करता है। नॉन फिक्‍शन और फिक्‍शन पर निर्भर करता है। रीडर बेस को समझना पड़ता है। मार्किट को देखना पड़ता है।

जानें वक्‍ताओं के बारे में 

  • प्रभात रंजन : हिंदी साहित्यकार हैं। कहानी और आलोचना विधा में पहचान रखते हैं। 
  • भगवंत अनमोल : बेस्ट स्पीच थेरेपी के संस्थापक हैं। स्पीच थेरेपिस्ट और मोटीवेशनल स्पीकर भी हैं।
  • गौतम राजऋषि : सदाबहार लेखक हैं। शायर हैं। फौज में होते हुए भी लेखन में अमिट छाप छाप छोड़ी है। 

चौथा सत्र : यथार्थ और कल्पना का साथ

वक्‍ता- हरिंदर सिक्का से मनोज राजन त्रिपाठी की बातचीत। 

हरिंदर सिक्का फिल्म निर्माता एवं निर्देशक हैं। साहित्य लेखन में छाप छोड़ी है। 

'कॉललिंग सहमत' से बनी थी राज़ी फिल्म

राज़ी फिल्म के सवाल पर हरिंदर ने बताया, 1994 में  मैंने फौज की नौकरी छोड़ दी, घर मे पैसे नहीं थे। कारगिल जंग  के दौरान उपजे हालत  के बाद मैंने कश्‍मीरी महिला सहमत  के न‍िजी जीवन पर किताब 'कॉललिंग सहमत लिखना शुरु किया। मुझे यह क‍िताब लिखने में  आठ साल लगे । किताब के पूरा होने के बाद इसे खरीदने के लिए कई लोग आए, करोड़ में कीमत लगाई, लेकिन मैंने  साफ मना कर दिया। 

कश्‍मीरी मुसलमान गलत नहीं

हरिंदर  सिक्का ने कहा  कश्‍मीरी मुसलमानों को हमेशा गलत समझा जाता है। हमें से समझना होगा कि कौन मां चाहेगी कि उसका बेटा हाथ में पत्‍थर उठाए।  इतने सालों से वहां आतंकवाद को फंडिंग की जा रही थी। धारा 370 हटने के बाद बहुत कुछ बदला है । मेरी अगली किताब धारा 370 है जिसकी प्रेरणा भी कॉलिंग सहमत की सहमत हैं। वहां कश्मीरी मुस्लिम औरत  सहमत भी है जिसने हिंदुस्तान के लिये अपना पूरा परिवार खत्म कर दिया। उसके लिए अपने मुल्‍क से बढ़कर कुछ नहीं था।  

पांचवां सत्र- इतिहास लेखन की चुनौतियां'

वक्‍ता - विश्वास पाटिल से आत्म प्रकाश मिश्र की बातचीत 

पानीपत की जंग हर रोज की कहानी नहीं

पांचवें सत्र में इतिहास लेखन की चुनौतियां पर सवाल उठा कि पानीपत, ढाई लाख प्रतियां छप चुकी है, ये टाइटिल कैसे सूझा ? इसपर विश्वास पाटिल ने कहा कि मुझसे स्कूल में  छुट्टी के बाद आने के बाद पूछा पानीपतकी जंग कब-कब हुई? मैंने कॉन्फिडेंस के साथ कहा, पहले पहला हुआ उसके बाद में दूसरा फिर तीसरा। 22 साल का था, तब मैंने पानीपत के बारे में पढ़ा तो मुझे लगा की ये हर रोज की कहानी नहीं है। यह विशाल स्टोरी है, मैं 22 साल से 28 साल तक स्टडी करता रहा। 

फिल्‍म मुगले आज़म' की पूरी कहानी झूठी

एतिहासिक फिल्मों में हमेशा कंट्रोवर्सी होती है, उसमें लोगों के विरोध का क्‍या कारण है ? इसपर विश्वास पाटिल ने कहा कि उस नजरिये से देखना चाहिये, आसिफ ने दुर्गा खोटे (भारतीय अभिनेत्री) को दिखाया। आज भी मां के रुप में, उन्हें ही दिखाया जाता है। कल्पना बेस्ट चाहिए यथार्थ पर । मुगले आज़म पूरी कहानी झूठी है । एक ड्रामा कम्पनी ने मनगढंत कहानी बना दी थी। काशिराव को नाचता था। बाजीराव को नचाया गया, जबकि बाजीराव की तलवार नाचती है। आज बाजीराव में मस्तानी भी नाचने लगी । चंद्रमुखी , पारो आदि सबको फ़िल्म डायरेक्टर ने नचवा दिया, जबकि इतिहास में ऐसा कुछ नहीं है। लेखक को कोई भी कृति अपने मातृभाषा में लिखनी चाहिए , अनुवाद करने के लिए अनुवादक मौजूद हैं। क्या पानीपत के बाद आपको कुछ घमंड हुआ ? पाटिल ने कहा कि हां , मुझे रातों- रात सफलता मिलने से थोड़ा घमंड आ गया था। तलवार से कलम महान है । खारिज करने से भी इतिहास खत्म नहीं होता।

पाण्डुलिपि लिखी तो आठ बार रिजेक्‍ट, तब भी हार नहीं मानी

युवावस्था में इतना गम्भीर क्‍यों हो गए ? इसपर विश्वास पाटिल ने कहा कि मैंने जब पाण्डुलिपि लिखी तो पब्लिशर ने 8 बार रिजेक्ट कर दिया। 9वीं बार महाराष्ट्र के एक पब्लिशर ने इसे लिया। फिर वो रातों-रात अमीर हो गये। एक-एक साल में तीन एडिशन लिये जा रहे थे। आज के जमाने में भी इसे इतना पढ़ा जा रहा है। इस स्टोरी में तीन थॉट्स थे।  जो अहमद शाए, अफ्दाली और पेशवा के बीच की जंग पर हैं। 

प्रोफाइल 

विश्वास पाटिल : इतिहासकार, साहित्यकार एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। 

छठा सत्र - साहित्य और सिनेमा

छठे सत्र साहित्य और सिनेमा पर सवाल उठा कि आजतक 28 बार देवदास बनाई जा चुकी है। पीसी बरुआ ने बनाया। उसमें देवदास मुंह पर किताब रखे होते हैं। दूसरी बार में कमरे के पास खड़ी होती है। तीसरी बार संजय लीला के साथ पारो पैर के पास खड़ी होती है, एक ही साहित्य के तीन सिनेमा? इसपर प्रभात रंजन ने कहा कि तीनों देवदास अपने-अपने जमाने में बहुत हिट हुई। 

आज भी आर्टिस्ट थिएटर से निकल रहा है

बंगाल फिल्मों में  गलत प्रोपेगंडा कैसे रोका  ? इसपर संदीप भूतोडि़या ने कहा कि बंगाल में आज भी आर्टिस्ट थिएटर से निकल रहा है। यूपी के संगीत का क्या महत्व है ? प्रभात रंजन ने बताया कि नौशाद साहब बहुत अच्छे शायर हैं। मजरूह सुल्तानपुरी ने बहुत कम गजल लिखी है। 

डायरेक्टर अपनी थर्ड आई से देखता है

संदीप भूतोडिय़ा ने कहा कि फिल्मों में किसी भी स्टोरी को डायरेक्टर अपनी थर्ड आई से देखता है। उसी के हिसाब से हमें काम करना होता है। वहीं, प्रभात रंजन ने कहा कि लेखक अब शब्दों से चित्र नहीं बना पा रहा है। सिनेमा एकमात्र संवाद का विकल्प नहीं है। संदीप भूतोडिय़ा ने कहा कि साहित्य का प्रभाव हमारे देश में पहली फ़िल्म से था, बंगाल में सिनेमा आज भी ठोस है। बंगाल के फिल्‍म डायरेक्‍टर सत्यजीत रे जब अवध की पिक्चर बनाते हैं, तो वो अलग क्‍यों हो जाती है? प्रकाशक गौरव प्रकाश ने कहा कि सत्यजीत रे ने अपनी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में यूपी के लोगों को बहुत लेजी दिखाया है। 

प्रोफाइल

संदीप भूतोडिय़ा : लेखक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। द सफारी उनकी पहली किताब है। 

समापन सत्र - हास्य और गीत

सर्वेश अस्थाना, अनु अवस्थी, मालविका हरिओमव

संवादी के अंतिम सत्र की घोषणा ही हुई तो गोमतीनगर के बीएनए हॉल की सीढिय़ां कुर्सियां बन गईं। हास-परिहास भरे लहजे में संचालक आत्म प्रकाश मिश्र ने हास्य कवि सर्वेश अस्थाना और मालविका का परिचय कराया लेकिन, उस मेहमान के बारे में बस हिंट किया। वो छोटे बप्पी लहरी की तरह दिखते हैं और वैसे ही सोने की चेन पहनते हैं...और जब वो आए तो अपना परिचय यूं दिया- पहचान त गयो होइहो...। कानपुर से बोल रहे हैं...अन्‍नुअवस्थी...।

अपने अलहदा अंदाज से टेलीविजन सहित विभिन्न मंचों से दर्शकों को गुदगुदाने वाले इस कलाकार ने यहां भी पूरे हॉल को ठहाकों से भर डाला। मालविका हरिओम ने 'उड़ी जाओ रे शुगुनवा...' देवी गीत गाकर इस महफिल की औपचारिक शुरुआत की। भक्ति भाव के बाद एक बार फिर हंसी के फव्वारे छूटे। आत्म प्रकाश ने सर्वेश की दाढ़ी का राज पूछा। उन्होंने 10 भाई-बहिनों के बीच लंबे अरसे तक अपने कुंवारे रहने की कहानी सुना डाली। बताया- हम पहिले बहुत 'ब्यूटीफुल टाइप के हैंडसम' थे।

कविता के व्यवसायीकरण से कवि परफार्मर बनने को मजबूर

हंसी की महफिल में एक गंभीर बात भी उठी। स्टैंडअप कॉमेडियन की तरह मंच पर दिखते हास्य कवियों पर सवाल हुआ तो सर्वेश ने जवाब में इसके लिए कविता के व्यवसायीकरण को इसका दोष दिया। कहा कि पहले बच्चन जी के जमाने में कवि सम्मेलन में कविताएं बिना तालियों के सुनी जाती थीं। फिर दौर बदला। अब इसका व्यवसायीकरण हो चुका है। आयोजक सेलेक्टर बन चुके हैं। अब कवियों से पूछा जाता है कि 'हाउ यू परफार्म।' हम कवियों की लाइनें पेश करके परफार्मर लाखों रुपये पाते हैं, हमें कुछ हजार में ही संतोष करना पड़ता है। ऐसे में अगर कुछ कवि अपने लिखे को परफार्म करके अपनी बेहतर जिंदगी के लिए संसाधन जुटा रहे हैं तो इसमें गलत क्या है।

 

प्रोफाइल 

  • सर्वेश अस्थाना : हास्य कवि हैं। हिंदी, उर्दू में गीत, गजल के साथ हास्य-व्यंग्य के लिए जाने जाते हैं। 
  • अनु अवस्थी : हास्य कलाकार हैं। कनपुरिया टोन में अपनी मजेदार बातों से दर्शकों को लोटपोट करा देते हैं।
  • मालविका हरिओम : लेखन और गायन दोनों में समान अधिकार रखती हैं। लोक गीतों पर आधारित देवी भजनों का अलबम देवी दयालु भईं प्रसिद्ध हुआ।

Posted By: Divyansh Rastogi

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