लखनऊ [आशुतोष मिश्र]। 'संग चलें जब तीन पीढिय़ा/ चढ़े विकास की सभी सीढिय़ां।' छोटी-छोटी इन दो लाइनों में गोवा की पूर्व राज्यपाल एवं वरिष्ठ साहित्यकार मृदुला सिन्हा ने बेहद बड़ी बात कह दी। बीएनए हॉल में सजे 'संवादी' के मंच से वह इस तरह 'स्त्री साहित्य का संघर्ष' ही नहीं, वरन सारे वर्ग विभेद को खत्म करने का नुस्खा दे गईं। 

उन्होंने साहित्य लेखन में स्त्री के संघर्ष को अलग न करने की अपील की। इसके पक्ष में तर्क भी दिया। कहा, हम इस तरह से वर्ग संघर्ष को जन्म देंगे। सिर्फ साहित्य ही नहीं, बल्कि विमर्श में भी हमें इसका ध्यान रखना चाहिए। दलित विमर्श, स्त्री विमर्श जैसे प्रचलन भी ठीक नहीं। सरकार भी बच्चा, महिला, बुजुर्ग आदि में बांटकर विकास की योजनाएं चलाती है, मेरे अनुभव से वो भी ठीक नहीं। इस तरह से सबके लिए हमने खुद ही अलग दृष्टि पैदा कर ली है। साहित्य में महिलाओं की तरह बहुत से पुरुषों को भी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे में साहित्य में स्त्री-पुरुष के संघर्ष को अलग करके जीवन को रणक्षेत्र न बनाएं। मैं व्यक्तिगत तौर पर कहूं तो मैंने कोई संघर्ष नहीं किया, बल्कि मेहनत की।

हां, कुछ हैं जिन्हें संघर्ष करना पड़ता है। पर इनकी संख्या बहुत कम है। ऐसी एक महिला से मैं मिली थी। उसने मुझसे कहा था- आप लिखती हैं। आपके घर का सहयोग मिलता है। मैं सबसे छिपकर रात में लिखती हूं। जब कभी यह पति या सास के हाथ पड़ जाता है तो वो उसे फाड़कर फूंक देते हैं। कबीर की पत्नी भी कविताएं लिखती थीं लेकिन, उन्हें किसी ने संजोया नहीं। इसके पीछे सोच थी- महिला है क्या लिखेगी। अब परिस्थितियां बदली हैं। बेटियां नभ, थल, जल हर ओर छाई हैं। उन्होंने खुद को पहचानना शुरू कर दिया है। यहां थोड़ा सचेत होने की भी जरूरत है। उनका मकसद सिर्फ अपने लिए ही जीना नहीं है। साहित्य का काम समाज में सकारात्मकता भरना है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हर घर में एक अर्धनारीश्वर का रूप दिखे। उनसे पहले वर्तिका नंदा ने भी साहित्यकार के संघर्ष का इस तरह वर्गीकरण को उचित नहीं बताया था। सूचना क्रांति के इस दौर में उन्होंने लेखन में गंभीरता का संघर्ष बताया। इसके साथ ही कहा कि और भी कई संघर्ष हैं जिन पर बात होनी चाहिए वनिस्बत 'स्त्री साहित्य का संघर्ष' के। 

हालांकि, साहित्यकार रजनी गुप्ता की राय जुदा थी। उन्होंने तर्क किया कि यह सिर्फ उस 10 फीसद शहरी आबादी की बात हो सकती है। यह विषय उस चमकदार इलाके के लिए नहीं बल्कि गांव-देहात का है। सोचिए, स्त्री साहित्य की शुरुआत...जब उसे अपना नाम छिपाकर 'बंग महिला' के नाम से लिखना पड़ा। बाहर से जो चमकदार चेहरे दिख रहे हैं, उनके अंदर की पीड़ा आप पहचान नहीं पा रहे। स्त्री को बाहरी आजादी तो मिली है, मगर वो आंतरिक यानी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आज भी संघर्ष कर रही है। संचालन कर रही शालिनी सिंह ने भी सहमति में सिर हिलाया।

वर्तिका नंदा ने इस संघर्ष को स्वीकारा, मगर उन्होंने एक नई लकीर खींचने की पैरवी की। कहा कि हम यह क्यों सोचते हैं कि कोई बढऩे नहीं देगा। जब तक हम आकलन के मोड में रहते हैं, विकास नहीं हो पाता। फिर उन्होंने यह बात दोहराई कि हम किन मापदंडों पर यह कह सकते हैं कि साहित्य में संघर्ष अकेले स्त्री को ही करना पड़ता है। दरअसल, आज संघर्ष पाठक का है, गंभीरता ओर गहराई का है। उनके साथ रजनी गुप्ता ने जेल से जुड़े स्त्री साहित्य लेखन को सबके साथ साझा किया। रजनी गुप्ता ने कहा कि जेल में बंद महिलाओं के मन में मनुष्य न समझे जाने की पीड़ा है। जरूरत है कि परिवार उसके अंदर स्त्री होने का पूर्वाग्रह न भरे, जिससे वो स्वतंत्र चेता महिला के रूप में अपनी निजता, आजादी और आत्मनिर्णय की क्षमता को महसूस कर सके। आज भी महिलाओं को परिवार में लोकतंत्र का इंतजार है। सत्र के अंतिम पड़ाव पर मृदुला सिन्हा ने अपने संस्मरणों के सहारे सबको सकारात्मक लेखन के लिए प्रेरित किया। चेताया कि नकारात्मकता को पाठक चावल के कंकड़ की तरह चुनकर अलग कर देगा। उन्होंने साहित्यकार के सबसे बड़े सुख से उसे रूबरू कराया। बताया कि साहित्यकार अपनी कृति को देखकर प्रसन्न होता है। कोई भी संघर्ष इस प्रसन्नता को रोक नहीं सकता। 

 

Posted By: Divyansh Rastogi

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