लखनऊ [आशुतोष मिश्र]। संवादी के अंतिम सत्र की घोषणा ही हुई तो गोमतीनगर के बीएनए हॉल की सीढिय़ां कुर्सियां बन गईं। हास-परिहास भरे लहजे में संचालक आत्म प्रकाश मिश्र ने हास्य कवि सर्वेश अस्थाना और मालविका का परिचय कराया लेकिन, उस मेहमान के बारे में बस हिंट किया। वो छोटे बप्पी लहरी की तरह दिखते हैं और वैसे ही सोने की चेन पहनते हैं...और जब वो आए तो अपना परिचय यूं दिया- पहचान त गयो होइहो...। कानपुर से बोल रहे हैं...अन्‍नुअवस्थी...।

अपने अलहदा अंदाज से टेलीविजन सहित विभिन्न मंचों से दर्शकों को गुदगुदाने वाले इस कलाकार ने यहां भी पूरे हॉल को ठहाकों से भर डाला। मालविका हरिओम ने 'उड़ी जाओ रे शुगुनवा...' देवी गीत गाकर इस महफिल की औपचारिक शुरुआत की। भक्ति भाव के बाद एक बार फिर हंसी के फव्वारे छूटे। आत्म प्रकाश ने सर्वेश की दाढ़ी का राज पूछा। उन्होंने 10 भाई-बहिनों के बीच लंबे अरसे तक अपने कुंवारे रहने की कहानी सुना डाली। बताया- हम पहिले बहुत 'ब्यूटीफुल टाइप के हैंडसम' थे। पहली बार लड़की वाले बच्चा जानकर शादी से इंकार कर गए। गुस्से में पूरी दाढ़ी रख ली तो दूसरी लड़की के घरवालों ने गुंडा बोलकर मना कर दिया। इसके बाद मैं मध्यमार्गी (फ्रेंच कट) हो गया। श्रोताओं के ठहाकों से उत्साहित सर्वेश आगे अपने विवाह की पूरी कहानी सुना गए। किस तरह से एक लड़की के घरवाले ने उनसे पिता से कहा था कि 'तुम्हार लड़का हमका पसंद नाही है।' जवाब में पिता बोले थे- 'भइया, पसंद तक हमहुंकै न हो त का करीं ओके घर से निकाल देईं।' अपनी चुटीली बातों के रस से भिगोते हुए सर्वेश देर तक सबको हंसाते रहे। अन्‍नुअवस्थी, सर्वेश और आत्म प्रकाश की हंसी ठिठोली सबके चेहरों पर मुस्कान को परमानेंट बनाए रखी थी। तभी मालविका ने भोजपुरी और पंजाबी में विवाह गीत सुनाकर भारतीय संस्कृति के एक राग होने का अहसास कराया। फिर सर्वेश अस्थाना ने माइक थामा। 'पिता जी को हमारी शादी का ख्याल आया/ इसलिए मेरा वैवाहिक विज्ञापन छपवाया...' सुनाकर उन्होंने सबको खूब हंसाया। हम बोल रहे हैं.... का आइडिया कहां से मिला, जवाब में अन्‍नुअवस्थी अपने लहजे से सबको गुदगुदाते हुए बोले- कानैपुर से...। उन्होंने कवियों की टांग खींचते हुए सबको हंसाया तो वहीं, सर्वेश ने पुलिस पर हास्य व्यंग्य करके। बताया- एक बार पुलिस ने चेकिंग के दौरान बाइक रोकी। सौ रुपया देकर बच गया लेकिन, सोचा आगे चेकिंग होगी तो क्या करूंगा। रुपये तो अब हैं ही नहीं। पुलिस वालों से परेशानी बताई तो उन्होंने बता दिया कि कोई रोके तो 'पेप्सी' बोल देना। उस दिन पेप्सी लेकर पूरा शहर घूमे। पुलिस वालों ने रोका लेकिन 'पेप्सी' सुनते ही जाने दिया। अगले दिन फिर यही आइडिया अपनाते हुए बाइक से निकला। 'पेप्सी' बोला तो पुलिसवाले ने किनारे बाइक खड़ा करने को कहा और डपटते हुए बोला-आज कोकाकोला है। मालविका ने भी अपनी कलम से निकले हास्य को तरन्नुम के साथ सुनाया- 'नइया डूब रही मझधार हमसे क्या मतलब है यार...।' सर्वेश ने जब नेता, पुलिस, वकील और कवि पर व्यंग्य करके हास्य की महफिल को आनंद के शिखर तक पहुंचा दिया।

कविता के व्यवसायीकरण से कवि परफार्मर बनने को मजबूर

हंसी की महफिल में एक गंभीर बात भी उठी। स्टैंडअप कॉमेडियन की तरह मंच पर दिखते हास्य कवियों पर सवाल हुआ तो सर्वेश ने जवाब में इसके लिए कविता के व्यवसायीकरण को इसका दोष दिया। कहा कि पहले बच्चन जी के जमाने में कवि सम्मेलन में कविताएं बिना तालियों के सुनी जाती थीं। फिर दौर बदला। अब इसका व्यवसायीकरण हो चुका है। आयोजक सेलेक्टर बन चुके हैं। अब कवियों से पूछा जाता है कि 'हाउ यू परफार्म।' हम कवियों की लाइनें पेश करके परफार्मर लाखों रुपये पाते हैं, हमें कुछ हजार में ही संतोष करना पड़ता है। ऐसे में अगर कुछ कवि अपने लिखे को परफार्म करके अपनी बेहतर जिंदगी के लिए संसाधन जुटा रहे हैं तो इसमें गलत क्या है।

Posted By: Divyansh Rastogi

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