लखनऊ, राजू मिश्र। COVID-19 Outbreak प्रत्येक अवधारणा किसी सिद्धांत पर आधारित होती है और इसी अवधारणा के आधार पर नियम बनते हैं। यहीं, यह उल्लेख भी आवश्यक है कि प्रत्येक नियम के अपवाद होते हैं। चाहे विज्ञान हो या ज्ञान की कोई अन्य धारा, नियम यह मानकर ही बनाए जाते हैं कि इसमें कुछ अपवाद अवश्य होंगे। मानवता भी एक नियम है और इसकी अनदेखी करने वालों को अपवाद नहीं माना जा सकता। ये समाज के अपराधी हैं। वाराणसी में मात्र 100 मीटर तक अर्थी को कंधा देने के लिए सात हजार रुपये ऐंठ लिए गए। जौनपुर के एक गांव में पत्नी की मौत होने पर संक्रमण की आशंका में कोई कंधा देने नहीं आया। उसे साइकिल पर शव लादकर घाट तक पहुंचाना पड़ा। आगरा में एक महिला की मौत हो गई तो पड़ोसियों ने उधर झांकना तक उचित नहीं समझा। समूचे उत्तर प्रदेश में ऐसे किस्सों की भरमार है। सिर्फ नाम और स्थान का ही अंतर रह गया है। जिधर दृष्टि डालिए मानवता को कचोटती ऐसी कहानियों की भरमार है। पता नहीं इस दौर में मुंशी प्रेमचंद जैसे कथाकार होते तो कहानी कफन लिखते या श्मशान। या फिर, उनकी भी लेखनी कांप जाती।

वाराणसी की कहानी में पूरी व्यवस्था की बानगी है। बिजली विभाग में कार्यरत मनीष श्रीवास्तव की मां की कोरोना रिपोर्ट पाजिटिव थी। मनीष ने उन्हें एक मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती कराया। यहां 16 हजार रुपये प्रतिदिन का खर्च बताया गया। हालांकि, इसे गनीमत कहिए। कुछ दिन पहले तक तो राजधानी लखनऊ में लाख रुपये प्रतिदिन तक निजी अस्पताल वसूल रहे थे। मनीष की कहानी उससे आगे की है। मनीष ने रकम जमा कराई तो इलाज शुरू हुआ। बमुश्किल आधा घंटा बाद ही मनीष ने देखा कि मां को लगाई गई आक्सीजन निकालकर किसी दूसरे मरीज को लगा दी गई। आपत्ति की तो विवाद हुआ और विवाद बढ़ा तो मरीज को डिस्चार्ज कराना पड़ा। लेकिन, इस आधे घंटे का ही 16 हजार का बिल थमा दिया गया। व्यथा यहीं समाप्त नहीं हुई। मां को वह पंडित दीनदयाल अस्पताल ले गया। यहां डॉक्टर ने रेमडेसिविर की डिमांड रख दी। डीएम के हस्तक्षेप के बावजूद अस्पताल से रेमडेसिविर नहीं लगाया गया। आक्सीजन लेवल गिरता गया। गिड़गिड़ाने के बाद डॉक्टरों ने एक मृत मरीज की हाइपोक्सिया मानीटर मशीन लगा दी। चंद मिनटों में ही सांसें थम गईं। बाद में पता चला कि यह मशीन तो पहले से ही खराब थी। हद अभी बाकी थी। अंतिम संस्कार के लिए जब शव को हरिश्चंद्र घाट ले जाने के लिए एंबुलेंस आई तो उसमें और शव भी रख दिए गए। घाट पर शवदाह के लिए सात हजार रुपये लिए गए। लेकिन, मनीष केवल दो लोग थे। दो और कांधों का जुगाड़ करने के लिए सात हजार और देने पड़े। समर्पित भाव से मरीजों की सेवा कर रहे संस्थानों, चिकित्सकों सामान्य लोगों के बीच ऐसे क्रूर लोग अपवाद जरूर हैं, लेकिन इन्हें मानवता का अपराधी माना जाना चाहिए। उन्हें सलाम करना होगा जो इस दौर में भी मानवता के अंकुर पाल पोस रहे। जैसे, आगरा में अकेली महिला के अंतिम संस्कार में पुलिस का कुनबा जुटा और न केवल अंतिम संस्कार कराया, बल्कि मोबाइल पर विदेश में फंसे उनके स्वजन को अंतिम दर्शन भी कराए।

पीपीई किट में छुपे राक्षसों की हो रही पहचान : आप कह सकते हैं कि क्या धरती के भगवान चिकित्सक इतने निष्ठुर हो गए हैं। तो, इस सवाल का जवाब अभी सटीक तौर पर तलाश पाना मुश्किल है। लेकिन, असल राक्षसों की तस्वीर सामने आने लगी लगी है। अस्पताल संचालक व्यवसायियों और आठ-दस हजार रुपये में संविदा पर रखे गए बेरोजगारों की फौज में चिकित्सीय पेशा बदनाम हो रहा है। शुरुआती सुस्ती के बाद सक्रिय हुई प्रशासनिक मशीनरी जब जांच पड़ताल कर रही है तो पता चला रहा कि आपदा के चरम अवसर पर आक्सीजन और रेमडेसिविर की किल्लत क्यों हुई। सरकार के दावों और हकीकत में अंतर का कारण क्या था। कालाबाजारियों ने कई जगह कृत्रिम किल्लत भी खड़ी कर दी। आगरा में जांच में पाया गया कि कुछ नान कोविड अस्पतालों ने आर्पूितकर्ताओं से आक्सीजन लेकर उसकी कालाबाजारी कर डाली। कई जगह पैरा मेडिकल और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों ने जो कारनामे किए, वह डाक्टरों के माथे पर चिपक गए। पीपीई किट में कौन है, किसे पता लेकिन बीमार और तीमारदार इन्हें चिकित्सक समझ गिड़गिड़ाते रहे और वे लूटते रहे।

[वरिष्ठ समाचार संपादक, उत्तर प्रदेश]