लखनऊ [संदीप पांडेय]। देश के नौनिहाल कम उम्र में वहम के शिकार हो रहे हैं। जिसे नजरअंदाज करने पर वह तमाम बीमारियों की गिरफ्त में आ रहे हैं। यह खुलासा केजीएमयू समेत देश के छह संस्थानों द्वारा किए शोध में हुआ। इंडियन जनरल ऑफ साइकियाट्री ने नवंबर के अंक में इसका प्रकाशन किया है।

बच्चों में ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) को लेकर कई शोध हुए। वहीं दावा है कि एक साथ मिलकर छह संस्थानों ने देश में पहली बार बीमारी पर अध्ययन किया। केजीएमयू के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. आदर्श त्रिपाठी को प्रोजेक्ट का प्राइमरी इन्वेस्टीगेटर बनाया गया। डॉ. आदर्श त्रिपाठी के मुताबिक वर्ष 2017 से 2018 तक शोध किया गया। इसमें 16 वर्ष तक के 173 ब'चे व किशोर शामिल किए गए। कुल ब'चों में 65 फीसद मेल व 35 फीसद फीमेल रहे।

शोध में पाया गया कि ओसीडी की बीमारी विकसित देशों में जहां छह से सात वर्ष में ब'चों को हो रही है, वहीं भारत में पांच वर्ष के बच्चों में भी मिली। इसके अलावा कोमॉर्बिड डिसऑर्डर देश के ब'चों में कम पाया गया। यानी ओसीडी बीमारी से घिरे विदेशी ब'चों में दूसरी मानसिक बीमारियों का औसत 80 फीसद रहा, वहीं देश के ब'चों पर असर 30 फीसद मिला। डॉ. आदर्श के मुताबिक यह बीमारी एक वहम की तरह है, जो ब'चों पर हावी होकर उनमें एक अजीब सी सनक सवार कर देती है। ऐसे में वह एक ही काम को बार-बार करते हैं। इंडियन जनरल ऑफ साइकियाट्री ने तीन दिन पहले शोध का प्रकाशन किया।

रिसर्च में शमिल रहे संस्थान

केजीएमयू, पीजीआइ चंडीगढ़, सीआइपी रांची, बंगलुरु निमहेंस, इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज व वर्धमान मेडिकल कॉलेज प.बंगाल में रिसर्च किया गया। इसमें केजीएमयू मेन सेंटर रहा। सभी संस्थानों के कुल 11 डॉक्टर शोध में शामिल रहे। 

ओसीडी दे रही बीमारी

डॉ. आदर्श के मुताबिक ओसीडी 100 में से 1.4 फीसद ब'चों में हो सकता है। इसमें ब'चे एक काम को बार-बार करते हैं, बार-बार अपनी चीजों को चेक करते हैं, दिमाग में उनके अनैच्छिक विचार आते हैं, किसी का मार न दें, किसी को चोट न पहुंच जाए, भगवान के लिए कुछ गलत न बोल दें, जैसे तमाम वहम रहते हैं। वहीं समय पर इलाज न कराने से एंजाइटी, डिप्रेशन, अटेंशन डेफसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) बीमारी हो जाती हैं। ब'चों की बीमारी में ओसीडी पांचवें नंबर पर आती है।

यह भी जानें

  • यह बीमारी ब्रेन के न्यूरोनल कनेक्शन लूप सीएसटीपी में गड़बड़ी से होती है।
  • अभिभावकों में इलाज को लेकर जागरूकता नहीं है, ब'चे डेढ़ से दो वर्ष की देरी से डॉक्टर के पास पहुंच रहे हैं।
  • अभिभावक बेटों का इलाज पूरा कराते हैं, वहीं बेटियों का देर से व अधूरा इलाज कराकर ही छोड़ देते हैं।
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Posted By: Anurag Gupta

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