लखनऊ [जितेंद्र शर्मा]। 'अखिलेश जी अपने आवास से मात्र एक किलोमीटर दूर माल एवेन्यू में स्व.कल्याण सिंह बाबूजी को श्रद्धांजलि देने नहीं आ सके। कहीं मुस्लिम वोट बैंक के मोह ने उन्हें पिछड़ों के सबसे बड़े नेता को श्रद्धांजलि देने से तो नहीं रोक लिया?' भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के इन चंद शब्दों ने पूरी इबारत समझा दी है। सपा मुखिया अखिलेश यादव पर हमला करते हुए जिस तरह से उन्होंने 'मुस्लिम वोट बैंक' और 'पिछड़ों के सबसे बड़े नेता' का जिक्र किया है, उससे साफ है कि उत्तर प्रदेश में 2022 के चुनावी मैदान में भगवा दल पिछड़े और हिंदुत्व के अस्त्र के साथ उतरेगा। इन दो मुद्दों से प्रदेश में भाजपा का कल्याण कर चुके दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह रणनीति के इस रथ के 'अदृश्य सारथी' होंगे।

विधानसभा चुनाव नजदीक आते-आते तमाम मुद्दे किनारे हो गए और प्रदेश में जाति-धर्म की पारंपरिक राजनीति अपनी रौ में आने लगी। दशकों तक भाजपा के एजेंडे में शामिल रहे राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में शुरू हुआ तो सत्ताधारी दल को इसका लाभ मिलने की संभावना देख सेक्युलर की छवि को दांव पर लगाकर सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे दल मंदिर-मूर्ति की सियासत में उतर आए। इधर, पिछड़ी जातियों को अपनी-अपनी ओर खींचने के प्रयास सभी दलों ने शुरू कर दिए। इस बीच दिग्गज भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के दुखद निधन ने हिंदुत्व और पिछड़ों के मुद्दे को भावनाओं का बड़ा मंच दे दिया है।

दरअसल, पिछड़ों के लोकप्रिय नेता के रूप में राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने वाले कल्याण 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाकर और राम मंदिर निर्माण के लिए सत्ता त्यागकर बड़े हिंदूवादी नेता के रूप में स्थापित हो गए थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार मंचों पर कल्याण की मौजूदगी ने भाजपा के लिए जीत की राह आसान करने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

अब फिर चुनाव होने जा रहे हैं। पिछड़ों और हिंदुओं में लोकप्रिय यह रामभक्त चेहरा भाजपा के मंचों पर नहीं होगा, लेकिन राजनीतिक वंशज अपने पूर्वज की नीति से मार्गदर्शन लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं। पार्टी चाहती है कि कल्याण भले न रहे हों, लेकिन उनकी विचारधारा को और धार दी जाएगी। जाहिर है कि पिछड़ों की राजनीति करने वाली सपा के साथ ही बसपा और कांग्रेस भी साफ्ट हिंदुत्व के साथ भाजपा से मुकाबले की ओर बढ़ रही हैं, लेकिन कल्याण सिंह के अंतिम दर्शन को न पहुंचकर सपा और कांग्रेस ने भगवा खेमे को इन्हीं दो अस्त्रों के इस्तेमाल की शुरुआत का मौका दे दिया है। यही वजह है कि कन्नौज के सांसद सुब्रत पाठक के बाद प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और सांसद साक्षी महाराज ने ट्वीट कर हमले शुरू कर दिए।

ऐसे चले शब्दबाण

उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट कर कहा कि 'अखिलेश यादव जी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व.कल्याण सिंह बाबूजी को अंतिम विदा देने के लिए न आकर आपने पिछड़े वर्ग की बात करने का नैतिक अधिकार खो दिया। आपके द्वारा पिछड़े वर्ग की बात करना केवल ढोंग है।'

उन्नाव के सांसद साक्षी महाराज ने कहा कि पिछड़ों के सबसे बड़े नेता बाबूजी की अंतिम यात्रा में न जाकर पिछड़ों की राजनीति करने वाले अखिलेश यादव व मुलायम सिंह यादव ने तुष्टिकरण के आधार पर नैतिकता को इस तरह तार-तार किया, जो बहुत निंदनीय और चिंता का विषय है।

कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि कल्याण सिंह के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करने के लिए मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और कांग्रेस के नेतृत्व का कोई बड़ा-छोटा नेता नहीं पहुंचा। यह दर्शाता है कि पिछड़ों के नेता का सम्मान, पिछड़ों के नेता बनने का ढोंग करने वाले मुलायम सिंह भी बर्दाश्त नहीं कर सके, जबकि यह सामान्य शिष्टाचार है।

मृत्यु पर नहीं होनी चाहिए राजनीति : सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है कि भाजपा कल्याण सिंह की मृत्यु पर भी राजनीति कर रही है। मृत्यु पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। जहां तक अखिलेश यादव के न पहुंचने का प्रश्न है तो वे उस दिन लखनऊ से बाहर थे। विधानभवन में श्रद्धांजलि अर्पित करने पार्टी की ओर से नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी पहुंचे थे। कल्याण सिंह के निधन पर तत्काल अखिलेश ने शोक संदेश भी जारी किया था।

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