अयोध्या [मुकेश पांडेय]। राममंदिर मसले पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आ चुका है। ऐसे में अहम किरदारों की चर्चा स्वाभाविक है, इनमें आधी आबादी का प्रतिनिधित्व रेखांकित करने योग्य है, भाजपा की राष्ट्रीय कार्यपरिषद में मंदिर के लिए प्रस्ताव लाने वाली राजमाता विजयाराजे सिंधिया रहीं हों अथवा अपने भाषणों को लेकर चर्चा में आईं उमा भारती एवं साध्वी ऋतंभरा। छह दिसंबर की घटना शायद ही घटती, यदि उमा भारती एवं साध्वी ऋतंभरा ने रामकथा कुंज के मंच से कारसेवकों में कुछ कर गुजरने का शौर्य न भरा होता। 

मंदिर आंदोलन का इतिहास कोई एक-दो वर्ष का नहीं, बल्कि दशकों पुराना है। भले ही इसकी अगुवाई विश्व हिंदू परिषद कर रही थी पर भारतीय जनता पार्टी की संस्थापक सदस्य रहीं राजमाता विजयराजे सिंधिया ही पार्टी की राष्ट्रीय कार्य परिषद में यह प्रस्ताव लेकर आईं थीं। उसके बाद से ही कभी परोक्ष तो कभी अपरोक्ष रूप से भाजपा आंदोलन का हिस्सा बनी। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी 1989 में जब रथयात्रा लेकर लेकर निकले, उसे पूरा सहयोग राजमाता सिंधिया ने दिया।

छह दिसंबर, 1992 की कारसेवा के दौरान वे अयोध्या में अहम भूमिका में रहीं और हार्डलाइनर नेता की तरह आंदोलन का नेतृत्व किया। अन्य नेताओं की तरह उन्हें भी इस मामले का आरोपी बनाया गया। ऐसे में स्वाभाविक है कि जब मंदिर आंदोलन की चर्चा होगी तो उनका नाम शीर्ष कतार में रखा जाएगा। यही नहीं मंदिर आंदोलन की बदौलत राष्ट्रीय राजनीति में सितारा बनकर चमकी उमा भारती के उत्थान के पीछे भी सिंधिया जैसी शख्सियत ही थीं।

उमा भारती केंद्रीय मंत्री बनीं या मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री, उसकी वजह केवल राममंदिर आंदोलन ही रहा, जिसने सन्यासी से उमा को देश की सियासत का देदीप्यमान नक्षत्र बना दिया। उन्होंने 90 के दशक में राममंदिर के समर्थन में पूरे देश में भ्रमण कर सभाएं की और हिंदुओं में जोश जगाने वाला भाषण दिया। यही कारण रहा कि विहिप की लगभग हर सभा से उनकी नुमाइंदगी का अक्स उभरता रहा।

छह दिसंबर, 92 को मुख्य मंच पर प्रमुख वक्ता के रूप में शामिल रहीं उमा भारती के जोशीले भाषण ने कारसेवकों को गुंबद पर चढ़ने के लिए प्रेरित किया। यही कारण रहा कि इस मामले के केस नंबर 198 के जिन 13 अभियुक्तों में आठ के खिलाफ चार्जशीट प्रस्तुत की गई, उनमें उमा भारती भी एक थीं। मामले की जांच के लिए गठित क्राइम इंवेस्टीगेशन डिपार्टमेंट (सीआइडी) के अधिकारी गंगाप्रसाद तिवारी ने अपनी जांच रिपोर्ट में उन्हें रामकथा कुंज में बने सभामंच से ऐसे उत्तेजक भाषण का दोषी माना, जिसने कारसेवकों से ढांचा ध्वस्त कराने में अहम भूमिका निभाई।

यूं तो अनाथ बालिकाओं के लिए वात्सत्य ग्राम जैसा प्रकल्प संचालित करने के कारण साध्वी ऋतंभरा इस वक्त अपने सामाजिक कार्यों के लिए पहचानी जाती हैं, लेकिन मंदिर आंदोलन में वे सबसे चमकदार किरदारों में एक थी। उनके भाषणों के ऑडियो कैसेट ने घर-घर आंदोलन की न केवल अलख जगाई, बल्कि उन्हें उठते-बैठते राममंदिर के विषय में सोचने को विवश किया। लिब्रहान आयोग ने उन्हें भी इस मामले का प्रमुख अभियुक्त बनाया। छह दिसंबर को उनके साथ ही रामकथा कुंज के मंच पर आसीन रहे हनुमानगढ़ी से जुड़े महंत मनमोहन दास बताते हैं कि कारसेवक शायद ही उत्तेजित होते, अगर साध्वी ऋतंभरा ने उनमें अपने काव्यमयी भाषणों से जोश न भरा होता।

वे बताते हैं कि कारसेवक एकबारगी तो लौटने लगे थे, लेकिन ऋतंभरा के भाषणों ने आग में घी का काम किया। ...और कारसेवक पलट कर बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ चले। देखते ही देखते गुंबद और उसका पूरा ढांचा जमींदोज हो गया। उस समय कारसेवक रहे अयोध्या के अभिषेक मिश्र एवं संजीव सिंह उस दिन के मंजर और जोशीले भाषण को याद कर रोमांचित हो उठते हैं।

Posted By: Umesh Tiwari

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप