लखनऊ, जेएनएन। श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय ने कहा कि कुछ लोग आसानी से कह देते हैं कि भगवान श्रीराम मंदिर की लड़ाई आस्था की जीत है, जबकि ऐसा है नहीं। करीब 500 साल का संघर्ष और स्वतंत्र भारत में 70 साल की लंबी न्यायिक लड़ाई के बाद यह मौका आया है। तकनीकी साक्ष्यों के साथ यह जीत हासिल हुई है। वे शनिवार को अमीनाबाद दवा विक्रेता समिति द्वारा आयोजित श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान के मौके पर बोल रहे थे। इस मौके पर दवा व्यवसायियों ने 19 लाख 56 हजार 106 रुपये से अधिक की राशि समर्पित की। 

दान नहीं समर्पण निधि: ट्रस्ट के महामंत्री ने चेक प्राप्त करने के बाद कहा कि श्रीराम स्वयं दाता हैं। दाता को देना ठीक नहीं, यह समर्पण भाव है। विभिन्न दलों पर इशारों में कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि यह दान नहीं समर्पण निधि है। दवा व्यवसायियों द्वारा भेंट की गई धन राशि पर उन्होंने कहा यह 270 लोग नहीं 270 परिवारों की ओर से मिली भेंट है। अगर इसे परिवार के सदस्यों के साथ जोड़ा जाए तो कम से कम 11 सौ से अधिक लोगों का समर्पण भाव इसमें साफ नजर आता है। 

ये राष्ट्र का मंदिर है: चंपत राय ने कहा कि मंदिर किसी व्यक्ति का नहीं यह राष्ट्र मंदिर है जो सबके समर्पण भाव से तैयार किया जा रहा है। 

विधि एवं न्याय मंत्री ब्रजेश पाठक ने ऐतिहासिक पन्ने पलटे। आयोजकों को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि जिसके नाम से ही उद्धार हो जाता है, उन प्रभू श्रीराम के काम के लिए पूरा जीवन समर्पित है। सबके समर्पण भाव से यह राष्ट्र मंदिर तैयार हो रहा है। इस मौके पर संस्था के अध्यक्ष अनिल जय सिंह, महामंत्री ओपी सिंह, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सुदीप दुबे, आर्गेनाइजिंग सेक्रेट्री सीएम दुबे, वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रदीप चंद जैन, कोषाध्यक्ष सुभाष शर्मा, पंकज सिंह, अखिल जय सिंह, विनोद शर्मा, राजीव शर्मा, राजीव रस्तोगी, अशोक मोतियानी, अनिल बजाज, सुरेश छबलानी समेत बड़ी संख्या में दवा कारोबारी मौजूद रहे। विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय संगठन मंत्री राजेश उपाध्यक्ष कन्हैया नगीना, मंत्री देवेंद्र समेत कई गणमान्य लोगों का दवा व्यवसायियों ने भव्य स्वागत किया। 

देश भर में 44 दिन चला अभियान: बता दें, राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति तथा कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इसमें अपना योगदान दिया। श्री राम मंदिर के लिए दुनिया का सबसे बड़ा फंड कलेक्शन अभियान संत रविदास जयंती यानी शनिवार 27 फरवरी को पूर्ण हो गया।  यह अभियान 15 जनवरी मकर संक्रांति के दिन शुरू होकर माघी पूर्णिमा पर समाप्त हुआ है। 

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