लखनऊ [राजीव बाजपेयी]। राजधानी स्थित राधेलाल स्वीट्स पर एक्शन काबिलेतारीफ है, मगर सैकड़ों मामले हैं जिनमें लचर तंत्र, कमजोर कानून और भ्रष्टाचार के चलते लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले बच निकलते हैं। लोगों को स्वच्छ खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने के जिम्मेदार विभाग इक्का-दुक्का दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई कर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं। हां, त्योहारी सीजन में उनकी तेजी जरूर देखने वाली होती है और मिलावट का गोरखधंधा बदस्तूर जारी रहता है। हालांकि, राधेलाल स्वीट्स पर त्वरित एक्शन जरूर काबिलेतारीफ है, लेकिन यह तेजी आगे कायम रह पायेगी बड़ा सवाल है। 

एक नजर इस पर भी 

 

केस-01

29 फरवरी 2013 को अलीगंज स्थित राधेलाल स्वीट्स में शुगर फ्री मिठाई का सैंपल भरा गया। एक सितंबर 2014 को प्रशासन ने दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया। प्रक्रिया में करीब डेढ़ साल गुजर गया। इस दौरान दुकान चलती रही और माल बिकता रहा।  

केस-02

दो साल पहले फन मॉल स्थित केएफसी स्टोर में चिकन को पकाने वाले मसाले में खतरनाक  मोनोसोडियम ग्लूटामेट पाया गया। पांच महीने को जांच रिपोर्ट अनसेफ आने के बाद भी अब तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। तब तक स्टोर वैसे ही चलता रहा। हालांकि दावा किया जाता रहा कि जिस स्टॉक में गड़बड़ थी, उसे सीज किया।

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केस-03

25 जुलाई 2015 को राजाजीपुरम स्थित मधु डेयरी से सैंपल भरा। पनीर का नमूना जांच में फेल पाया गया। एडीएम कोर्ट में वाद दायर किया गया। चार साल बाद यानी 18 जून 2019 को एडीएम पूर्वी वैभव मिश्र ने पांच लाख का रुपये का जुर्माना लगाया।  

 

क्या है प्रक्रिया ? 

  • फूड सेफ्टी अफसर ही जांच कर नमूने एकत्र करेगा 
  • सभी पक्षों की मौजूदगी में चार सैंपल भरे जाते हैं 
  • दुकानदार को सैंपल लेकर उसकी रेफरल जांच कराने का अधिकार
  • सैंपल लेने के चौबीस घंटे के भीतर प्रयोगशाला भेजना जरूरी  
  • 14 दिनों के अंदर नमूने की जांच रिपोर्ट मिलने का नियम 

सैंपलिंग के बाद  

  • मिलावट की पुष्टि होने पर दुकानदार को नोटिस  
  • नोटिस में पक्ष रखने के लिए एक महीने का समय 
  • इस दौरान आरोपी सेकेंड लैब से सैंपल की रेफरल जांच करा सकता है। 
  • आरोपी अपर नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में पक्ष रख सकता है
  • सुनवाई के बाद अदालत जुर्माना या सजा तय करती है

यह है हकीकत 

  • सैंपल चौबीस घंटे में लैब जाने चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है
  • प्रयोगशाला से रिपोर्ट 14 दिन के बजाए तीन-चार महीनों तक नहीं आती।
  • जब तक रिपोर्ट नहीं आती, तब तक घटिया माल बाजार में बदस्तूर बिकता है। 
  • रिपोर्ट आने के बाद लैब से रेफरल जांच में लंबा वक्त लगता है।
  • सेकेंड लैब की रेफरल रिपोर्ट जरा भिन्न हुई तो मामला लटक जाता है।
  • सब स्टैंडर्ड या मिथ्या छाप के मामलों में न्याय निर्णायक अधिकारी फैसला लेता है लेकिन, तारीखें ही नहीं लगती।
  • रिपोर्ट अनसेफ आने पर एसीजेएम के यहां मामला दर्ज कराया जाता है। तारीख पर तारीख और धंधा चलता रहता है।   

क्या होना चाहिए?

  • सेहत से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्ती की जरूरत। 
  • मिलावटखोरी के मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में निपटाया जाए। 
  • मिलावट या संदेह होने पर माल  तत्काल जब्त हो।
  • एक उत्पाद में मिलावट पाए जाने पर दुकान में बिक्री प्रतिबंधित हो।
  • मौके पर ही जांच किट की व्यवस्था हो ताकि तत्काल मिलावट का पता चले।
  • मिलावटखोरों के खिलाफ फैसले की निर्धारित समय सीता तय हो।
  • प्रयोशालाओं का उच्चीकरण किया जाए ताकि रिपोर्ट जल्दी आए। 
  • लैब बढ़ाने की जरूरत। प्रदेश में जांच के लिए केवल पांच ही प्रयोगशालाएं हैं, जिनमें लखनऊ, मेरठ, आगरा, वाराणसी और गोरखपुर।  

क्या कहते हैं अफसर?

मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी सुरेश मिश्र के मुताबिक, सुरक्षा मानक अधिनियम के तहत जो भी नियम हैं, उसी के अनुसार कार्रवाई की जाती है। मिलावटखोरों पर अंकुश लगाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। नियमावाली में संशोधन सरकार ही कर सकती है। 

 

Posted By: Divyansh Rastogi

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