UP में 4157 अधिवक्ताओं पर 5056 आपराधिक मामले, लखनऊ पहले नंबर पर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के 4,157 अधिवक्ताओं पर 5,056 आपराधिक मामलों पर गंभीर चिंता जताई है, जिसमें लखनऊ सबसे आगे ...और पढ़ें
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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
HighLights
यूपी में 4,157 अधिवक्ताओं पर 5,056 आपराधिक मामले दर्ज हैं।
लखनऊ में सर्वाधिक मामले, 917 अधिवक्ताओं पर 586 केस दर्ज।
हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं के मामलों की सुनवाई दूसरे जिलों में कराने का आदेश।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। प्रदेश में 4,157 अधिवक्ताओं पर 5,056 आपराधिक मामले हैं, जिसमें लखनऊ पहले नंबर पर है। ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों और बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कई अहम निर्देश जारी किए हैं।
कहा कि अधिवक्ताओं के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई उनके गृह जिले की बजाय दूसरे जिले की अदालतों में कराई जाएगी। अदालत ने बार काउंसिल और राज्य सरकार को अधिवक्ता पेशे की गरिमा बनाए रखने के लिए व्यापक सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा कि कानून तब दो बार मरता है, जब उसके रक्षक ही अपराध में शामिल हो जाएं और संस्थाएं उन पर कार्रवाई से बचती रहें। अदालत ने प्रदेशभर से आई रिपोर्ट के आधार पर पाया कि उत्तर प्रदेश के 75 जिलों, सात पुलिस कमिश्नरेट और जीआरपी क्षेत्र में 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ 5,056 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, जबकि इनमें से 418 अधिवक्ता ऐसे हैं जिन पर तीन या उससे अधिक मुकदमे दर्ज हैं।
रिपोर्ट में सबसे अधिक चिंता लखनऊ को लेकर जताई गई है। आंकड़ों के अनुसार लखनऊ में 917 अधिवक्ताओं पर 586 मुकदमे दर्ज हैं, जो प्रदेश के सभी कमिश्नरेट में सबसे अधिक हैं। इतना ही नहीं, वजीरगंज अकेले ऐसा थाना है, जहां 422 अधिवक्ताओं के खिलाफ 236 एफआइआर दर्ज हैं।
हाईकोर्ट ने इसे पूरे प्रदेश का सबसे गंभीर और असामान्य आंकड़ा बताते हुए कहा कि यह लखनऊ की अदालतों के आसपास अपराधी प्रवृत्ति वाले अधिवक्ताओं की अत्यधिक मौजूदगी का संकेत है। अदालत ने यह भी माना कि बार काउंसिल की अनुशासनात्मक व्यवस्था प्रभावी नहीं रही।
रिपोर्ट में सामने आया कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में 5.14 लाख से अधिक अधिवक्ता पंजीकृत हैं, लेकिन सत्यापन के दौरान केवल 105 फर्जी डिग्री वाले अधिवक्ताओं की पहचान हो सकी। हाईकोर्ट ने इस संख्या को अविश्वसनीय बताते हुए कहा कि यह महज औपचारिक जांच प्रतीत होती है। यह भी टिप्पणी की कि अधिवक्ताओं को प्रैक्टिस सर्टिफिकेट जारी करते समय पुलिस सत्यापन की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग भी बिना किसी प्रभावी जांच के पेशे में प्रवेश कर रहे हैं।
निर्णय में लखनऊ का उल्लेख फर्जी डिग्री के मामलों में भी हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रयागराज के बाद लखनऊ उन जिलों में शामिल है जहां फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सबसे अधिक मामले मिले। अदालत ने कहा कि इनमें प्रदेश के सभी अधिवक्ताओं का आडिट, नामांकन से पहले अनिवार्य पुलिस सत्यापन, विश्वविद्यालयों, नेशनल एकेडमिक डिपाजिटरी (एनएडी) और डिजीलाकर के माध्यम से डिग्रियों का डिजिटल सत्यापन, प्रत्येक अधिवक्ता से वार्षिक शपथपत्र लेना तथा स्वतंत्र अनुशासनात्मक ट्रिब्यूनल का गठन शामिल है।
इससे न्यायालयों की गरिमा बनी रहेगी। अदालत की यह टिप्पणी केवल किसी एक जिले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश की न्यायिक और विधिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
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जमानत हो सकती है निरस्त
ट्रांसफर किए गए मामलों को संबंधित जिला जज मुकदमे आवंटित करेंगे। गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित होगी और पुलिस सभी केस डायरी, चार्जशीट व अन्य अभिलेख समय पर स्थानांतरित अदालत को उपलब्ध कराएगी। आरोपितों को व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट सामान्य रूप से नहीं दी जाएगी और अनावश्यक अनुपस्थिति पर जमानत निरस्त करने तक की कार्रवाई की जा सकती है।
11 या उससे अधिक वाले मुकदमे
- दिलीप सिंह ठाकुर– 27 मुकदमे
- कुंवर अंबिका सिंह उर्फ डब्बू सिंह – 13 मुकदमे
- राज कुमार शर्मा – 13 मुकदमे
- शरद यादव – 13 मुकदमे
- सैयद मंजर – 12 मुकदमे
- सौरभ प्रताप सिंह – 11 मुकदमे
