लखनऊ, (अम्बिका वाजपेयी)। अग्रज श्रीराम से लक्ष्मण का अप्रतिम स्नेह युगों से एक उदाहरण है। उस स्नेह को अपने चरित्र में ढालकर उदाहरण बनने की चुनौती आज उन्ही की नगरी के सामने थी। फैसला राम से जुड़ा हो तो लक्ष्मणनगरी की बेचैनी स्वाभाविक थी। शासन सत्ता और गंगा-जमुनी तहजीब के केंद्र लखनऊ की प्रतिक्रिया कितना मायने रखती है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं। सुबह से ही सड़कों पर पसरी खामोशी को साढ़े दस बजने का इंतजार था। सड़कों पर भले सन्नाटा हो, लेकिन घरों में टीवी का शोर था।

इंदिरानगर, गोमतीनगर, अलीगंज से लेकर पूरे लखनऊ का माहौल लगभग एक जैसा था। बच्चे स्कूल की छुट्टी होने के चलते पार्कों में पहुंच चुके थे। सड़कों पर वाहनों की संख्या कम थी, लेकिन इक्का-दुक्का चाय की दुकानों पर अनुमान बहुत। फैसला आया, सुना गया और जैसी उम्मीद थी वही हुआ, ऐतिहासिक फैसले के बाद लक्ष्मणनगरी राम की तरह ही मर्यादा में रही। सदियों पुराने विवाद पर सुप्रीम फैसले के बाद करीब ग्यारह बजे तस्वीर लगभग साफ हो चुकी थी। पिछले कुछ दिनों की अपेक्षा मौसम भी साफ था। सुप्रीम कोर्ट में सदियों पुराने विवाद से धुंध छंटी थी तो यहां भी भाईचारा धूप की मानिंद चमक रहा था। अब फैसले पर प्रतिक्रिया जानने का समय था। सरकार सतर्क थी और जनता सामान्य।

शक्ति भवन के सामने कार में बैठे मोहम्मद अतीक की निगाहें मोबाइल पर टिकी थीं। सवाल पूछते ही सवाल आता है प्रेस से हैं क्या? अतीक तुरंत कहते हैं कि पहले ही कहा जा चुका है कि जो फैसला होगा वो मंजूर होगा, तो इसमें बहस की गुंजाइश नहीं है। बस किसी को भड़काने जैसी बातें न की जाएं। इस फैसले पर उसी को एतराज होगा जिनकी दुकान बंद होने का खतरा है। उनकी हां में मिलाते हुए बगल की सीट पर बैठे शिवेश हंसते हुए कहते हैं कि चलो पार्टियों के हाथ से एक मुद्दा तो गया। राजधानी के व्यस्ततम हजरतगंज चौराहे पर भी बारह बजे तक गाडिय़ों की संख्या बढऩे लगी थी, लेकिन रोज की अपेक्षा बहुत कम।

विधानभवन के सामने खड़े न्यूज चैनलों के एंकर राहगीरों की रफ्तार में सवालों के ब्रेक लगाने की कोशिश कर रहे थे। एंकर के माइक लेकर लगभग सामने आ जाने पर एक बाइक सवार ने रुकते ही भाजपा दफ्तर की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहां जाकर बात करिए न। भाजपा दफ्तर में मौजूद लोगों की निगाहें चाय की चुस्की के साथ टीवी पर थीं। पार्टी हाईकमान के निर्देश का असर था कि वहां बोलने के बजाय सिर्फ आज टीवी को सुना जा रहा था। बसपा के कार्यालय का गेट बंद था तो सपा और कांग्रेस के दफ्तर में सिर्फ टीवी की आवाज ही गूंज रही थी।

चारबाग और कैसरबाग बस स्टेशन पर आपाधापी तो बहुत थी, लेकिन साधनों से अपने गंतव्य तक पहुंचने की। किसी को बात करने में दिलचस्पी नहीं थी। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर बस फोन पर परिवार को अपनी कुशलक्षेम देने की आतुरता दिखी। शहीद स्मारक के सामने से टीले वाली मस्जिद तक लगी नारियल पानी की सैकड़ों दुकानें को ग्राहकों का इंतजार था तो शहर का माहौल ऊपर से सख्त और अंदर फैसले की बेचैनी लिए था। पेड़ की छांव में अलसाए से लेटे रिक्शा चालक भी सवारियों के इंतजार में दिखे। सर्वमान्य फैसले के बाद सब कुछ पटरी पर था। सभी धर्मगुरु एक मंच पर थे और गंगा-जमुनी तहजीब की धारा गोमती के साथ प्रवाहमान थी।

बोले धर्मगुरु, फैसला सर्वमान्य

फैसला आने के बाद ऐशबाग ईदगाह सभी धर्मगुरु एक मंच पर जुटे। ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली, मौलाना सूफियान निजामी, लखनऊ गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह बग्गा, स्वामी सारंग ने हाथ उठाकर फैसले को सराहा और शांति बनाए रखने के लिए राजधानी के लोगों का शुक्रिया अदा किया।

शांत रहा पुराना लखनऊ

संवेदनशील माने जाने वाले पुराने लखनऊ में शुक्रवार रात जरूर कुछ जरूरी सामान खरीदने की आपाधापी से लेकर सुबह दस बजे माहौल शांत था। दोपहर एक बजते ही यहां माहौल सामान्य और पटरी पर था। चौपटिया मंडी में फैसले के पहले और उसके ठीक बाद गजब की रौनक रही। सामान्य दिनों की तरह यहां लोग सब्जी खरीदते रहे। परचून की दुकानों पर भी भीड़ रही। छोले भठूरे, पूड़ी कचौड़ी खाने वालों का जमावड़ा दुकानों के सामने रहा। दूसरी ओर चौपटिया चौराहे से अकबरी गेट और तंबाकू मंडी रोड पर सन्नाटा पसरा रहा। नाममात्र की दुकानें ही खोली गईं, हालांकि दोपहर होते-होते सब सामान्य था।

Posted By: Anurag Gupta

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