लखनऊ (जेएनएन)। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर से संसद में पेश किये जाने विधेयक का विरोध करते हुए इसे मुुस्लिम महिलाओं वपरिवारों के लिए नुकसानदेह और शरीयत के खिलाफ बताया है। इसे मुस्लिम पर्सनल लॉ में अवांछित हस्तक्षेप करार देने के साथ ही कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के कल्याण का दावा करने वाला यह विधेयक उल्टा उनकी और बच्चों की परेशानियां व उलझनें बढ़ाएगा।

 

प्रस्तावित विधेयक को बोर्ड ने मुस्लिम पतियोंं के तलाक देने के हक को छीनने की साजिश करार दिया है। बोर्ड ने केंद्र सरकार से विधेयक को संसद में पेश न करने की मांग की है। यह भी तय किया है कि बोर्ड के अध्यक्ष प्रधानमंत्री को विधेयक को लेकर बोर्ड के पक्ष और मुस्लिम समुदाय की भावनाओं से अवगत कराएंगे और उसे वापस लेने की मांग करेंगे।

 

एक बार में तीन तलाक कह कर मुस्लिम महिलाओं को बेसहारा छोडऩे वाले पतियों को सबक सिखाने के लिए केंद्र सरकार की ओर से संसद में पेश किये जाने वाले मुस्लिम वुमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज बिल पर अपना स्टैंड तय करने के लिए रविवार को नदवा कॉलेज में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की वर्किंग कमेटी की बैठक हुई। बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना खलीलुर्रहमान सज्जाद नोमानी ने बैठक में पारित प्रस्तावों की जानकारी दी।

 

उन्होंने कहा कि विधेयक के कई बिंदु मौजूदा कानूनी प्रावधान के खिलाफ और अवांछित हैं। इसके प्रावधान संविधान की ओर से विभिन्न धर्मों को दी गई सुरक्षा और गारंटी के खिलाफ हैं। यह विधेयक तलाक-ए-बिद्दत को गैरकानूनी और निष्प्रभावी ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बहुत आगे आगे बढ़ गया है। 

 

 

नोमानी ने कहा कि विधेयक को ड्राफ्ट करते समय कानून बनाने की संसदीय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। विधेयक का प्रारूप तैयार करते समय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मुसलमान विद्वानों और मुस्लिम महिलाओं की नुमाइंदगी करने वाली संस्थाओं व अन्य प्रभावित पक्षकारों से मशविरा नहीं किया गया। जिस तलाक-ए-बिद्दत को सुप्रीम कोर्ट ने निष्प्रभावी और अवैध ठहराया, सरकार ने उसे आपराधिक कृत्य ठहराते हुए उसके लिए सजा तय कर दी। जब तलाक ही नहीं हुआ तो क्रिमिनल चार्ज कैसा? इसका खमियाजा औरतें और बच्चे भुगतेंगे।

 

मौलाना नोमानी ने कहा कि अव्वल तो सरकार इस विधेयक को पेश ही न करे। यदि सरकार को लगता है कि विधेयक पेश करना जरूरी है तो उसे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मुस्लिम महिलाओं के संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत करने के बाद ही तैयार किया जाए। बोर्ड सभी तर्कों के साथ अपना पक्ष केंद्र सरकार के अलावा विभिन्न राजनीतिक दलों और कानून विशेषज्ञों के सामने भी रखेगा। कहा कि यदि सरकार मकसद वाकई मुस्लिम महिलाओं का कल्याण है तो वह विधेयक को वापस ले। यदि उद्देश्य राजनीतिक है तो वह इस पर कोई कमेंट नहीं करेंगे। बोर्ड के सेक्रेट्री मौलाना उमरैन महफूज रहमानी ने भी विधेयक के प्रावधानों को परस्पर विरोधाभासी बताया। 

 

महिलाओं के हितों की अनदेखी

अध्यक्ष महिला सेल ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड डॉ.आसमां जहरा ने कहा कि तीन तलाक विधेयक में मुस्लिम महिलाओं की हितों के पूरी तरह अनदेखी हुई है। इसके कानून बनने पर मुस्लिम महिलाओं को ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इस कानून को अमली जामा पहनाने के स्तर पर भी दिक्कतें आएंगी। 

 

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