मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

लखनऊ(जेएनएन)। स्कूल के डांस प्रतियोगिता से रंगमंच तक, टीवी के धारावाहिक से फिल्मों तक अपनी प्रतिभा का जौहर दिखाने वाली अभिनेत्री श्वेता तिवारी ने अपनी मेहनत और लगन से टीवी और फिल्मों में एक खास मुकाम बनाया है। अपने 20 साल के सफर में श्वेता तिवारी ने लोगों को हंसाया भी रूलाया भी। 'कसौटी जिंदगी की', 'यह रिश्ता क्या कहलाता है', 'परवरिश', 'बालवीर' जैसे धारावाहिक के अलावा कई फिल्में भी की है। तीनों माध्यम में शानदार अभिनय करने वाली श्वेता तिवारी हमेशा अपनी शर्तों पर जीती हैं। शनिवार को मदन मोहन मालवीय मार्ग स्थित एक निजी होटल में 'जब वी सेप्रेट प्ले' के लिए शहर आए श्वेता तिवारी, राकेश बेदी व राहुल बूचर ने  अपने अनुभव को साझा किया।

बचपन से अभिनय करना चाहती थी

श्वेता बताती हैं कि वह बचपन से ही अभिनय करना चाहती थी। वह अपनी मां से कहती थीं कि मुझे और कुछ नहीं सिर्फ  अभिनय करना है। वह स्कूल के दिनों से ही प्ले और डांस शो करती थी। धीरे-धीरे थियेटर करने लगी, फिर वहीं से धारावाहिकों में काम मिलने लगा। पृथ्वी थियेटर में एक प्ले कर रही थी, वहीं से धारावाहिक 'रिश्तेÓ में काम करने का ऑफर मिला, उसके बाद से अभी तक काम कर रही हूं। अभिनय की दीवानगी ने मुझे इस मुकाम तक पहुंचाया है।

युवाओं को समझनी होगी रंगमंच की गंभीरता

अभिनेत्री श्वेता ने बताया कि वह रंगमंच को बहुत महत्व देती हैं। आज के युवा रंगमंच को गंभीरता से नहीं लेते हैं, यह उनके लिए एक सीख जैसी है। अभिनय को निखारना हो तो ज्यादा से ज्यादा थियेटर करो। थियेटर में आपको तुरंत फीडबैक मिलता है।

हर भाषा को याद करना पड़ता है

हिंदी, पंजाबी, उर्दू, कन्नड़ जैसी भाषाओं की फिल्मों में अभिनय कर चुकी श्वेता कहती है कि एक कलाकार को हर भाषा तो आती नहीं हैं, ऐसे में डायलाग याद करने पड़ते हैं। इसके लिए लोग एक दूसरे की मदद भी लेते रहते हैं। अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा में फिल्म करते समय आपको आराम बिलकुल नहीं मिलता।

स्क्रिप्टिड नहीं है बिगबॉस

बिगबॉस-4 में विजेता रही श्वेता ने बताया कि बिगबॉस से काफी लोकप्रियता मिली है। सबको ऐसा लगता है कि बिगबॉस स्क्रिप्टिड होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। कुछ एडिटिंग होती है, लेकिन कोई सीन फेक नहीं होते हैं।

लखनऊ को बदलते हुए देख रही हूं

धारावाहिकों में अपने अभिनय से सभी का दिल जीतने वाली श्वेता तिवारी ने बताया कि रंगमंच उनका पहला प्यार है। लखनऊ बहुत ही खूबसूरत शहर है। यहां कई बार आ चुकी हूं। लखनऊ से बहुत प्यार मिला है, यह मेरे घर की तरह है। यहां के लोगों को अपनी कल्चर की समझ है, वह इसके लिए गंभीर हैं।

सफलता का कोई शार्टकट नहीं है : राकेश बेदी

लगभग 40 वर्षों से अभिनय करने वाले राकेश बेदी रंगमंच के प्रति बहुत गंभीर है। वह बताते हैं कि बचपन से ही थियेटर अच्छा लगता था। कॉलेज के दिनों से ही थियेटर करने लगे। यह ऐसा शौक था जिसे करने के लिए सिनेमा, और धारावाहिक में काम किया। राकेश बेदी ने लोगों को खूब हंसाया। फिल्म, धारावाहिक, थियेटर तीनों माध्यम में शानदार अभिनय करने वाले राकेश ने अपनी मेहनत और लगन से एक अलग पहचान बनाई। उन्होंने बताया कि सफलता को कोई शार्टकट नहीं है, मेहनत और लगन के साथ ही आप किसी भी काम सफल हो सकते हैं। प्रतिभा के साथ तैयारी करना बहुत जरूरी है। एक अभिनय की खासियत के बारे में राकेश बताते हैं कि अभिनय को दर्शकों को इंटरटेनमेंट करना आना चाहिए। वह चाहे फिल्म हो, धारावाहिक हो या प्ले सभी में इंटरटेनमेंट होना बहुत जरूरी है।

कलाकारों को रंगमंच से जोडऩा है : राहुल

 देश में कई प्ले कर चुके राहुल ने बताया कि शहर के कलाकारों को रंगमंच से जोडऩे के उद्देश्य से थियेटर ग्रुप बनाया है। कलाकारों को अपने शहर में ही थियेटर करके दो वक्त की रोटी कमा सके, ऐसा रास्ता बनाना है। बहुत जल्द ही हम मंच पर महाभारत लेकर आएंगे। राहुल ने बताया कि उन्हें रंगमंच से बहुत प्यार है। पिछले कई वर्षों से कोई महीना ऐसा नहीं गया जिसमें उन्होंने थियेटर न किया हो। नई पीढ़ी को थियेटर के प्रति सकारात्मक सोच के लिए हम लोगों को थियेटर करना चाहिए। अलग-अलग तरह की कहानी को मंच पर दिखाना पसंद है।

Posted By: Anurag Gupta

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप