लखनऊ[नीरज मिश्र]। Republic Day Special: आइए, गणतंत्र दिवस पर रोडवेज इतिहास के पुराने पन्नों को फिर से पलटते हैं। उस दौर की बात करते हैं, जब सड़कों पर न तो लोगों की भीड़ हुआ करती थी और न ही तेज गति से दौडऩे वाली कार-बसों का हुजूम। समृद्ध लोगों की गिनी-चुनी गाडिय़ां ही नजर आती थीं। यह वह दौर था, जब शेवरलेट जैसे ब्रांड की गाडिय़ां रखने वाले लोगों को अंगुलियों पर गिना जा सकता था। 

ऐसे में आजादी के बाद फरवरी 48 में रोडवेज की पहली बस जब सड़क पर आई तो लोगों ने खूब पसंद किया। शेवरलेट की पेट्रोल चेसिस की 22 सीटर इस गाड़ी को केंद्रीय कार्यशाला में बनाया गया। काफी समय तक इस बस ने लोगों को सहारा दिया। कल-पुर्जों की कमी और दिक्कतों से बस की हालत धीरे-धीरे बिगडऩे लगी। कार्यशाला में जर्जर हो चुकी इस बस को तब के रोडवेज प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों ने कटवा दिया। उसके बाद वर्ष 1955 में बनी पहली डीजल बस का आगमन हुआ। 'विरासत' के रूप में आज भी इसे संजोए रखा गया है। करीब 66 वर्ष बीत चुके हैं। यह वह समय था, जब जनप्रतिनिधियों के पास भी लग्जरी गाडिय़ों की कतारें नहीं होती थी। ऐसे में जहां तक बस गई, वहां तक इसकी सेवा ली। उसके बाद कोई अन्य साधन देख जनसेवक राह पकड़ लेते थे। 

मुख्य प्रधान प्रबंधक प्राविधिक जयदीप वर्मा बताते हैं कि तकरीबन सात साल बाद केंद्रीय कार्यशाला ने साल 1955 में एंगल आयरन से निर्मित पहली डीजल बस का निर्माण किया। उस दौर में डीजल चालित इस बस को खूब पहचान मिली। सूबे के प्रथम मुख्यमंत्री पं. गोविंद वल्लभ पंत ने बस संख्या यूपीएफ-3134 की शुरुआत कर इस पर सफर किया। पहला रूट लखनऊ से बाराबंकी का था। लोगों को यह सेवा खूब भायी। यह बस रोडवेज इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। लेकिन, इस बार रोडवेज ने सबक लिया। पुरानी बस की तरह इसे काटकर हटाया नहीं, बल्कि 'विरासत' के रूप में संजो लिया। कानपुर स्थित डॉ. राममनोहर लोहिया कार्यशाला में यह बस आज भी खड़ी है। विरासत बस अपने पुराने दिनों की याद ताजा करती हैं। 

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पहले के कर्मचारी इस बस से खासा जुड़ाव महसूस करते थे। इसके पीछे वजह भी थी। प्रदेश के मुखिया ने इसमें सफर किया था। आज भी उनकी पुरानी तस्वीरें लोगों को 'विरासत' की तरफ देखने के लिए मजबूर करती हैं। धीरे-धीरे रोडवेज का अपना कुनबा बढ़ा तो 'माननीयों' ने इससे यात्रा शुरू की। न केवल विधानसभा, बल्कि अपने क्षेत्र में भी रोडवेज सेवाओं का जनसेवक भरपूर उपयोग करते थे। सुलतानपुर के मुसाफिरखाना से कई बार के विधायक रहे एक माननीय अपने क्षेत्र के गरीब-गुरबों को बीमार होने पर इन्हीं बसों से राजधानी लाकर उनका इलाज करवाते थे। बाद में शाम को फिर बस पकड़ क्षेत्र में पहुंच जाते थे। 

एक से बढ़कर 12 हजार से ज्यादा हो गया बसों का बेड़ा: वर्ष 1948 से शुरू हुआ रोडवेज बसों का सफर 1972 तक चला। इसके बाद राजकीय रोडवेज खत्म हो गया। इसके बार उप्र राज्य सड़क परिवहन निगम बना। आज एक बस से शुरू हुआ सफर 12 हजार बसों का आंकड़ा पार कर चुका है। इसमें निगम की अपनी बसें और अनुबंधित लग्जरी बसों का बेड़ा है। इनमें वॉल्वो, स्कैनिया, जनरथ समेत विभिन्न कैटेगरी की बसें हैं।

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