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लखनऊ, जेएनएन। हिंदी साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यास की विधा को प्रारंभ करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार नरेन्द्र कोहली को करीब से जानने का मौका मिलेगा। उनकी रचनाधर्मिता के साथ ही उनके जीवन के विविध पहलूओं पर भी बात होगी। दैनिक जागरण, प्रभा खेतान फाउंडेशन, एहसास वूमन ऑफ लखनऊ और लखनऊ एक्सप्रेशंस सोसाइटी के सहयोग से मंगलवार को 'कलम' कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इसमें उप्र ङ्क्षहदी संस्थान के पूर्व निदेशक एवं उपन्यासकार सुधाकर अदीब नरेन्द्र कोहली से संवाद करेंगे। साथ ही उनकी किताब 'न भूतो न भविष्यति' पर भी बात होगी। गोमती नगर के होटल हायत रीजेंसी में साढ़े तीन बजे से कार्यक्रम शुरू होगा। 

'कलम सामाजिक कार्यकर्ता संदीप भूटोरिया के प्रखर मस्तिष्क की उपज है। वह प्रभा खेतान फाउंडेशन के ट्रस्टी भी हैं। इन्होंने मुख्य रूप से देश में हिंदी और क्षेत्रीय साहित्य को बढ़ावा देने के लिए 'कलम शुरू किया और चयनित प्रमुख व्यक्तियों के साथ लेखकों और कवियों को सबसे रूबरू होने का एक मंच प्रदान किया। 'कलम' श्रृंखला आगरा, अहमदाबाद, अजमेर, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, चंडीगढ़, दिल्ली, हैदराबाद, जयपुर, कोलकता, लंदन, मुंबई, पटना, पुणे, रायपुर, रांची, उदयपुर और लखनऊ में शुरू की गई है। लखनऊ श्रृंखला का आयोजन लखनऊ एक्सप्रेशंस सोसाइटी, हायत रीजेंसी और महिलाओं के समूह- एहसास के सहयोग से हो रहा है। डिंपल त्रिवेदी, कनक रेखा चौहान और ताजिन हुसैन लखनऊ की एहसास समूह से जुड़ी हुई हैं।

साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को दिए स्वर 

सियालकोट, पंजाब (विभाजन पूर्व) में जन्मे वरिष्ठ साहित्यकार नरेन्द्र कोहली की प्रारंभिक शिक्षा लाहौर में हुई। भारत विभाजन के बाद परिवार  जमशेदपुर आ गया। प्रारंभिक अवस्था में ङ्क्षहदी के इस सर्वकालिक श्रेष्ठ रचनाकार की शिक्षा का माध्यम उर्दू था। ङ्क्षहदी विषय दसवीं कक्षा की परीक्षा के बाद ही मिल पाया। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और डाक्टरेट की उपाधि ली। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नगेन्द्र के निर्देशन में ङ्क्षहदी उपन्यास : सृजन एवं सिद्धांत विषय पर उनका शोध प्रबंध पूरा हुआ। 1963 से लेकर 1995 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया और वहीं से 1995 में पूर्णकालिक लेखन की स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण किया। साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर देने का श्रेय इन्हें ही जाता है। 1975 में उनके रामकथा पर आधारित उपन्यास दीक्षा के प्रकाशन से हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग प्रारंभ हुआ। भगवान राम की कथा को भक्तिकाल की भावुकता से निकाल कर आधुनिक यथार्थ की जमीन पर खड़ा कर दिया। 19 उपन्यासों को समेटे उनकी महाकाव्यात्मक उपन्यास श्रृंखलाएं महासमर (आठ उपन्यास), तोड़ो कारा तोड़ो (पांच-छह उपन्यास), अभ्युदय (दीक्षा आदि पांच उपन्यास) आदि उनकी उत्कृष्ट कृतियां हैं। सामाजिक उपन्यासों 'साथ सहा गया दु:ख, 'क्षमा करना जीजी, 'प्रीति-कथा के अलावा कई ऐतिहासिक उपन्यास भी हैं। 

सुधाकर अदीब के बारे में 

फैजाबाद में जन्मे उप्र हिंदी संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब का हाल ही में 'कथा विराट' उपन्यास आया है। इसमें इन्होंने 35 वर्षों का हमारे महान पूर्वजों का जीता जागता इतिहास समेटा है। अन्य रचनाओं में उपन्यास श्रेणी में अथ मूषक उवाच, चींटे के पर, हमारा क्षितिज, मम अरण्य, शोन तारीख, रंग राची, कहानी संग्रह मृगतृष्णा, देहयात्रा, उजाले अंधेरे, पगडंडी, काव्य संग्रह अनुभूति, संवेदना, जानी जग की पीर, हथेली पर जान, शोधग्रंथ ङ्क्षहदी उपन्यासों में प्रशासन शामिल हैं।    

Posted By: Anurag Gupta

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