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सीतापुर, [निर्मल पांडेय]। अनुदानित जूनियर हाईस्कूलों में पढ़ाते-पढ़ाते जीवन गुजर गया पर, शिक्षण कार्य के बदले टका नहीं मिला और कुछ शिक्षक मृत्यु को भी प्राप्त हो गए। जी हां, ये स्थिति केवल सीतापुर जिले की ही नहीं है बल्कि, प्रदेश के एक हजार अनुदानित जूनियर हाईस्कूल के शिक्षकों से जुड़ी है। कई शिक्षक अभी जीवित भी हैं, कई सेवानिवृत्त हो गए हैं। परिवार की आर्थिक तंगी को दूर करने को वेतन पाने की आस में सहायक बेसिक शिक्षा निदेशक कार्यालय लखनऊ से लेकर परिषद कार्यालय इलाहाबाद तक दौड़ लगाई पर नतीजा सिफर रहा है। 

पिसावां के बाजनगर के विश्राम लाल जूनियर हाईस्कूल में 1971 में अंग्रेजी अध्यापक पद पर नियुक्ति पाए शत्रुहन सिंह को 44 साल की सेवा के बाद भी वेतन नहीं मिल पाया। वे जून 2015 में रिटायर हो गए और मार्च 2016 में उनकी मृत्यु भी हो गई। शत्रुहन सिंह के कुल तीन संतानों में उमेश इकलौते बेटे हैं। उमेश के मुताबिक, पिता के बकाया वेतन प्राप्ति के लिए लखनऊ-इलाहाबाद की दौड़ लगाकर थक चुका हूं। अब पिता भी जीवित नहीं है, उनकी कमाई मिलने की आस नहीं है उम्मीद टूट चुकी है। इसलिए गांव के बाहर चक्की-पालेशर लगाकर जीवन यापन कर रहा हूं। 

विद्यालय के प्रधानाध्यापक राजकुमार का कहना है बाजनगर में विश्राम लाल जूनियर हाईस्कूल दिसंबर 2006 को अनुदान की श्रेणी में आ गया था। वहीं संदना के आदर्श कन्या जूनियर हाईस्कूल के प्रबंधक राजकिशोर तिवारी का कहना है कि, स्कूल वर्ष 2006 में अनुदान की श्रेणी में शामिल हुआ था। प्रधानाध्यापक जयश्री शुक्ला बिना वेतन के ही 2018 में सेवानिवृत्त हो गईं।

नियुक्ति प्रक्रिया अपूर्ण...

बीएसए कार्यालय के पटल प्रभारी संजय श्रीवास्तव का कहना है कि बिना वेतन शिक्षण कार्य करने वाले शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया अपूर्ण है। इसीलिए इनका वेतन फंसा है। अब ये मामला कोर्ट व शासन में है, इसलिए उसी स्तर पर कुछ निर्णय हो सकता है। जिले में अनुदानित विद्यालयों की कुल संख्या 85 है।

 बीएसए अजय कुमार ने बताया कि अनुदानित जूनियर हाईस्कूलों में बिना वेतन के शिक्षण कार्य करने वाले शिक्षकों के संबंध में शासन ने संज्ञान लिया है। इस मामले में शिक्षा निदेशक ने बैठक भी लगा दी है। उम्मीद है कि इन शिक्षकों का कुछ भला होगा।

Posted By: Anurag Gupta

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