लखनऊ (जितेंद्र उपाध्याय)। समृद्धि के प्रतीक सूर्य देव के पूजन का पर्व छठ को लेकर राजधानी में भी तैयारियां शुरू हो गई हैं। 36 घंटे निर्जला व्रत के इस महापर्व की शुरुआत वैसे तो छोटी छठ (खरना) 12 नवंबर से शुरू हो जाएगी, लेकिन नहायखाय से 11 नवंबर से शुरू हो जाएगा। लक्ष्मण मेला स्थल पर होने वाला मुख्य आयोजन 13 और 14 नवंबर को होगा। मेला स्थल पर घाट पर सुसुबिता (छठ मइया का प्रतीक) बनाने का कार्य शुरू हो गया है तो पुरानी का रंग रोगन किया जाएगा।

ऐसे होती है पूजा
लौकी की खीर खाकर महिलाएं व्रत शुरू करती हैं। बेटा या पति बांस की टोकरी में मौसमी फल व सब्जियों को छह, 12 व 24 की संख्या में लेकर नदी या तालाबों के किनारे जाते हैं। छठ गीत गाती व्रती महिलाओं के संग अन्य महिलाएं घाट तक जाती हैं। मिट्टी की सुसुबिता (छठ मइया का प्रतीक) बनाकर पुरोहितों के सानिध्य में पूजा होती है। गन्ने के साथ ही दूध व गंगा जल से डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। दूसरे दिन उगते सूर्य की उपासना और अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है।

पूजन में विशेष

छठ पर्व पर परिवार में जितने पुरुष होते हैं उतने सूप से पूजा की जाती है। गाय का दूध, गन्ना, सिंघाड़ा, संतरा, सेब, मूली, नींबू, कच्ची हल्दी व चावल का बना लड्डू और रक्षा सूत्र के पुरोहित व पूज्यनीय विधि विधान से पूजन कराते हैं। महिलाएं ऐसी सड़ी या धोती पहनती हैं जिसमे काले रंग का प्रयोग न हो।

महापर्व का पहला दिन

कार्तिक मास की चतुर्थी 11 नवंबर को नहाय खाय से व्रत की शुरुआत होती है। रंजना सिंह ने बताया कि लौकी-भात (अरवा चावल) व दाल बनाई जाती है। इन दिन रसोई को पूरी तरह साफ करके व्रती महिलाएं अलग चूल्हे पर इसे पकाती हैं। दिनभर व्रत रखने के साथ ही देर शाम इसका सेवन करती हैं। परिवार का कोई भी सदस्य तब तक भोजन नहीं करता है, जब तक व्रती महिलाएं भोजन न कर लें।

व्रत का दूसरा दिन

छोटी छठ कार्तिक मास की पंचमी 12 नवंबर को दूसरे दिन व्रती महिलाएं व्रत की सामग्री की साफ सफाई के साथ ही दिनभर व्रत रखती हैं। शिवान की मूल निवासी कलावती बताती हैं कि शाम को देशी घी रसियाव (गुड़-अरवा चावल की बनी खीर) का केले के पत्ते पर सेवन करके व्रत की शुरुआत की जाती है। इसी दिन ठेकुआ के साथ ही पूजन में लगने वाली सामग्री का निर्माण भी किया जाता है। इसके बाद से इनका 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है। कुछ महिलाएं इस दिन घाट पर जाकर सुसुबिता की पूजा-अर्चना कर डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं।

तीसरे दिन होती है मुख्य पूजा

निशातगंज निवासी रेनू ने बताया कि कार्तिक मास की छठी 13 नवंबर को को मुख्य पर्व होता है। शाम को पुरुष सदस्य सिर पर टोकरी में पूजन सामग्री रखकर घाट तक जाते हैं और व्रती महिलाओं छठी मइया के गीत रास्तेभर गाती हैं। सूर्य अस्त होने से पहले सुसुबिता की पूजा करने के साथ ही महिलाएं पानी में खड़ी होकर सूर्य देव को अर्घ्य देती हैं। बिना चप्पल के नंगे पैर घाट तक जाने की परंपरा भी है। इसके साथ ही संतान सुख और शादी विवाह जैसे शुभ कार्य होने वाले घरों की महिलाएं या पुरुष परिक्रमा करके घाट तक जाते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर कुछ लोग बैंड बाजे ही धुन पर थिरकते हुए घाट तक जाते हैं। डूबते सूर्य को अघ्र्य देने के साथ ही घाटों पर आतिशबाजी भी होती है। कुछ लोग घाट पर ही रात बिताते हैं तो कुछ घर वापस आते हैं, लेकिन रातभर छठ मइया के गीत गाते हैं।

सप्तमी को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य 

आलमबाग की किरन पांडेय ने बताया कि 13 की शाम की भांति एक बार फिर 14 नवंबर की सुबह पुरुष सिर पर टोकरी में पूजन सामग्री के साथ ही घाट तक जाते हैं। महिलाएं पूरब दिशा की तरफ मुंह करके उगते सूर्य को अघ्र्य देती हैं। गन्ने के संग सूर्य को अर्घ्य देकर महिलाएं सभी को प्रसाद देती हैं। प्रसाद वितरण के साथ ही 36 घंटे के व्रत का पारण होता है। केरवा फरेला घवद से ओहे पे सुगा मंडराय...और कांचहि बांस की बहंगिया...जैसे छठ गीतों के संग व्रती घाटों पर जाती हैं।

Posted By: Anurag Gupta