लखनऊ। बस्ती कजिले के गांवों में स्वच्छता के नाम पर 50 करोड़ रुपये फूंक दिए गए, मगर अभी तक 35 फीसद घरों में ही शौचालय हैं। इनमें भी कहीं छत नहीं है तो कहीं दरवाजे व सीट लापता है। निर्माण पर खर्च धनराशि का जिला पंचायत राज विभाग से हिसाब मांगा जा रहा है तो जवाब देने में अफसरों के पसीने छूट रहे हैं।

गांवों में स्वच्छता का वातावरण पैदा करने के लिए 1986 में केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम की शुरुआत की गई। आशा के अनुरूप परिणाम न आने पर वर्ष 1999 में इसे नया नाम दिया गया संपूर्ण स्व'छता अभियान। योजना में गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के साथ ही कमजोर तबके को शामिल किया गया। अभियान के लगभग दो दशक से अधिक बीत गए, लेकिन गांवों में बदलाव नहीं आ सका।

संपूर्ण स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए समय-समय पर लागत राशि बढ़ाई गई। प्रत्येक शौचालय पर 625 से 1500, फिर 2200, 3200और 4600 रुपये व्यय किए गए। तेरह साल में 77 हजार शौचालय बनाने के दावे किए गए, लेकिन हकीकत में इस धनराशि का जमकर दुरुपयोग किया गया। 2012 में इसे निर्मल भारत अभियान का नाम दिया गया। निर्माण लागत दस हजार कर दी गई, लेकिन यह भी गांवों में जोर नहीं पकड़ पाया। एक साल बाद लागत राशि 10900 की गई, पर क्रियान्वयन में बरती गई शिथिलता ने इसे महज कागजों में समेट दिया।

कनेथू बुजुर्ग गांव में शौचालयों की जांच पड़ताल में तस्वीर चौंकाऊ मिली। किसी घर में बना शौचालय खरपतवार व गोइठा रखने में इस्तेमाल हो रहा है, तो किसी में घासें उग आई हैं। गांव की दलित बस्ती में 35 शौचालय बनवाए गए हैं, लेकिन एक भी उपयोग में नहीं है।

जांच को बनी उच्चस्तरीय समिति

एक जनहित याचिका पर हाइकोर्ट ने शौचालय निर्माण में हुई धांधली की जांच उ'चस्तरीय समिति से कराने का आदेश दिया था। उप निदेशक पंचायत देवीपाटन गिरीश चंद रजक के संयोजकत्व में तीन सदस्यीय टीम गठित की गई। टीम को दो माह में जांच पूरी करनी थी, लेकिन चार माह बीत गए, अब तक ब्योरा ही तैयार नहीं हो सका है। समिति को वर्ष 2002 से 2012 तक ब्लाकवार शौचालयों के निर्माण का हिसाब तैयार करना है। पंचायत उपनिदेशक डीसी सक्सेना कहते हैं कि बारह साल में शौचालय निर्माण पर हुए व्यय और कराए गए कार्यो की जांच उ'च स्तरीय समिति कर रही है। समिति की मांग पर हाल ही में पूरा ब्योरा तैयार करा कर भेज दिया गया है।

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