ललितपुर ब्यूरो :

हमारे तन-मन को स्वस्थ और तन्दुरस्त रखने वाले देशी खेल अब विलुप्त हो गये है। आधुनिकता की अँधी दौड़ में भाग रहे आजकल के बच्चे भाग दौड़ वाले खेलों से परहेज करने लगे है। यही वजह है कि शरीर व मन को स्वस्थ रखने वाले देशी खेल या तो विलुप्त हो गये है या विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गये है। ऐसे बच्चे अब मैदान में खेलने के बजाय मोबाइल, कम्प्यूटर व टीवी में उलझे रहते है।

एक जमाने में कबड्डी, कुश्ती, गिल्ली-डण्डा, खो खो, कंचा, चंगा-अष्टा, लुका-छिपी, विष-अमृत, मेंढक-छड़ी, पतंगबाजी, टीपू, लंगड़ी, क्रिकेट आदि का अपना अलग ही मजा होता था। याद करे वे दिन जब बच्चे दिन-दिन भर ये खेल खेलते रहते थे। भाग दौड़ के इन खेलों से एक प्रकार से बच्चों का व्यायाम भी हो जाता था। इसके अलावा बच्चों में खेल व टीम भावना भी विकसित होती थी। इन खेलों को खेलने के बाद बच्चे पसीने से तर बतर हो जाते थे। बच्चों के गली मोहल्लों व खेल के मैदान में खेलने से वहाँ चहल पहल भी बनी रहती थी। इस दौरान बच्चों की शरारतें, प्रतिस्पर्धा, बाल सुलभ, ईष्र्या व चंचलता भी देखने को मिलती थी। दूर खड़े बड़े बुजुर्ग बच्चों की शरारतें देख कर ही अपना मनोरजन कर लिया करते थे, लेकिन आज के इस आधुनिक युग में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिलता। अब न तो मैदान में कबड्डी व कुश्ती के दाव पेंच देखने को मिलते है और न ही गलियों में क्रिकेट खेलते बच्चे ही नजर आते है। मैदान व गलिया दिनभर सूनी रहती है। आधुनिक युग में रचे बसे बच्चे मोबाइल, कम्प्यूटर व टीवी तक ही सिमट कर रह गये है। मोबाइल व कम्प्यूटर पर गेम व टीवी पर हिसक व उत्तेजक फिल्म तथा खेल देखने से बच्चों की मानसिकता पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। रही सही कसर सोशल मीडिया फेसबुक व वाटसएप एप्प ने पूरी कर दी। इनके प्रभाव के चलते बच्चे समय से पहले ही 'बड़े' हो रहे है।

इण्टरनेट पर हिसक खेल व वीडियो देखने से बच्चों में भी हिसक प्रवृत्ति बढ़ रही है। गाहे बगाहे समाचार पत्रों व खबरिया चैनलों पर भी बच्चों द्वारा हिसक व आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने की खबरें भी पढ़ने व देखने को मिल जाती है। ये उसी का ही परिणाम है। बात देशी खेलों की करे तो वे अब गुजरे जमाने के हो गये है। उनका शरीर सुडौल होने के बजाय बेडौल हो रहा है। बच्चों में मोटापे की बीमारी भी बढ़ रही है। आँखें कमजोर होने से चश्मा भी चढ़ जाता है। देसी खेल ग्रामीण क्षेत्रों से विलुप्त हो गये तो शहरों की तो बात ही अलग है। इन दिनों बच्चों की गर्मियों की छुट्टिया चल रही हैं। ऐसे में वे भागदौड़ वाले खेलों के बजाय इनडोर गेम तक ही सीमित होकर रह गये है।

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सोशल मीडिया ने कर दिया कबाड़ा

सोशल साइट फेसबुक, वॉटसएप्प के बढ़ते चलन से खेल सर्वाधिक प्रभावित हुए है। खासतौर पर भागदौड़ करने वाले खेल खेलने के बजाय बच्चे एक कौने में बैठकर मोबाइल से चिपके रहते है। यही वजह है कि क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, बॉलीवाल, बैडमिंटन आदि खेल न के बराबर ही लोग ही खेलते है। इन खेलों में दिलचस्पी से ज्यादा वे मोबाइल, कम्प्यूटर, सोशल साइड को महत्व दे रहे हैं, जिससे उनका शारीरिक व बौद्धिक विकास प्रभावित हो रहा है। खेल भावना क्या होती है? वे नहीं जानते और न ही जानना चाहते है।

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बदहाल है कुश्ती के अखाड़े

एक जमाने में शहर के जो अखाड़े पहलवानों के कुश्ती के दाव पेंचों से गुलजार रहते थे, आज वे उजाड़ और बदहाल है। शहर के मोहल्ला तालाबपुरा, चौबयाना, खिरकापुरा, घुसयाना आदि में कुश्ती के अखाड़े हुआ करते थे, अब सब बदहाल है। जनपद के कई नामचीन पहलवानों ने कुश्ती में नाम रोशन किया। आज ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी कुश्ती से कोसों दूर है। यही वजह है कि कभी गाँव देहात का प्रमुख खेल माना जाने वाला कुश्ती आज इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गया है।

Posted By: Jagran

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